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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 439

सिरहाने से बट्टा खींच लिया। चलते समय हनुमान् ने दशकण्ठ की लट रानी की लट से बाँध दी और शाप दिया कि जब तक रानी राजा को तीन थप्पड़ न मारे तब तक लट न खुले। यह शाप रावण के माथे पर लिख दिया। बूटियों के प्रयोग से लक्ष्मण उठ गये। सबको बड़ा हर्ष हुआ। सब उपायों से थककर रावण को लाचारी से पत्नी के तीन थप्पड़ खाकर बन्धन से छुटकारा मिला। संजीवयज्ञ महारानी मण्डो पतिव्रता थी। वह मृत्यु को वश में करना जानती थी। उसने उमा की सेवा में रहकर अमृत बनाना सीखा था। अमृत बन जाने पर वह सब पुत्रों तथा सेनाओं सहित रावण को जीवित कर सकती थी और फिर राम के बाणों के लिए भी कठिनाई उत्पन्न हो सकती थी। उसने संजीवयज्ञ आरम्भ कर दिया। इससे दशकण्ठ आशावान् होकर अपने दशगिरिवन और दशगिरिधर दो पुत्रों के साथ रणक्षेत्र में आया। लक्ष्मण ने दोनों को मार भगाया। राम ने दशकण्ठ का रास्ता रोका इसी समय मण्डो का अमृत बनकर तैयार हो गया। अमृत छिड़कते ही सारी सेना जी उठी। कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्, सहस्तेज आदि सब जाग उठे। फिर जोरों से युद्ध छिड़ गया। अब युद्ध का अन्त होना बहुत कठिन हो गया। अब इसका यही उपाय था कि मण्डो का यज्ञ रोका जाय। यदि मण्डो में विषयवासना जाग्रत् हो जाय तो यह यज्ञ असफल हो सकता था, क्योंकि यज्ञ के लिए आत्मसंयम अपेक्षित था। हनुमान् ने दशकण्ठ का वेष बनाया। नीलवद् उसका हाथी बन गया, कोई महावत बन गया। वह बनावटी दशकण्ठ विजय की खुशी मनाते हुए लङ्का में जुलूस के साथ आया और वहाँ पहुँचा जहाँ तपस्विनी बनकर मण्डो अमृत बनाने में संलग्न थी। दशकण्ठ ने कहा अब अमृत की आवश्यकता नहीं है। राम और उनकी सेना के सैनिक सब मरे पड़े हैं। मण्डो हर्ष से उछल पड़ी और नकली दशकण्ठ के गले लिपट गयी। विषयवासनापूर्ण चुम्बन उसके ओठ पर दिया गया और विषयवासनापूर्ण आलिङ्गन से मण्डो की मनोवृत्ति बदल गयी। इस प्रकार हनुमान्‌जी की बुद्धिमानी से मण्डो का काम बिगड़ गया। दशकण्ठरूपी हनुमान् यह बहाना करके वहाँ से निकल गये कि अभी विभेक जीता है उसे मारकर मैं अभी आता हूँ। उधर दशकण्ठ अमृत की राह देख रहा था। पहले जिलाये हुए राक्षस मर चुके थे। उनको फिर से जिलाना था। घण्टों प्रतीक्षा के बाद भी अमृत न आया। वह मण्डो की यज्ञशाला की ओर लपका। उसको हनुमान् के छल का पता लग गया। मण्डो को ज्ञात हुआ कि उसका सतीत्व नष्ट हो गया। वह बेहोश होकर गिर पड़ी। फिर भी मण्डो एवं दशकण्ठ का प्रेम ज्यों का त्यों बना रहा। आत्मा का पिंजरा हनुमान् की करनी पर क्रुद्ध होकर दशकण्ठ युद्ध के लिए चल पड़ा। राम ने बेशुमार तीरों की वर्षा से सामना किया। दोनों ओर से तीर छूट रहे थे। आकाश में अँधेरा छा गया था। राम अद्वितीय वीरता से लड़े पर रावण पर विशेष असर नहीं हुआ। उसके सिर और भुजाएँ कटकर गिर जाती परन्तु फिर नये सिर और नयी भुजाएँ बन जाती थीं। तीव्र से तीव्र बाण उसका कुछ बिगाड़ न सके। विभेक ने बताया कि दशकण्ठ की आत्मा तो उसके गुरु गोपुत्र के पास एक पिंजड़े में सुरक्षित है। दशकण्ठ तो तभी मरेगा जब उसकी आत्मा को मार डाला जाय। हनुमान् इस काम के लिए चल पड़े, पर उन्होंने राम से कहा महाराज, इस काम को सिद्ध करने में कई चालें चलनी पड़ेंगी। मुझे शत्रुदल में शामिल देखकर मेरी भक्ति में सन्देह न कीजियेगा। इस तरह राम को सचेत कर हनुमान् गोपुत्र की कुटिया पर चले गये। गोपुत्र मूर्ख था। हनुमान् के साथ इन्द्र का पौत्र अङ्गद भी था। हनुमान् गुरु की कुटिया में पहुँच गये। वहाँ पहुँचकर हनुमान् झूठमूठ का रोना रोने लगे और बोले राम ने हमारे साथ बड़ा दुर्व्यवहार किया। हमने सदा उनकी सेवा की, पर वे बड़े कृतघ्न निकले। हम दशकण्ठ की सेना में आना