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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 438

मालीवराज बड़े न्यायकारी थे। उन्होंने सब देवी देवताओं को इकट्ठा करके राम को बुलाया। तुरन्त ही रणक्षेत्र एक न्यायालय बन गया। वहाँ मारकाट के बदले हर्षपूर्वक वार्तालाप होने लगा। राम अपने साथियों के साथ वहाँ आये। मालीवराज ने जानना चाहा कि लड़ाई का सूत्रपात कैसे हुआ? दशकण्ठ ने कहा महाराज ! सुनिये, राम ने व्यर्थ ही एक औरत के पीछे यहाँ टण्टा बढ़ा रखा है। यह इतनी बड़ी सेना लेकर मेरी राजधानी घेरे पड़ा है। बात बहुत छोटी है। मैंने एक स्त्री को जङ्गल में अकेली देखा। उस बेचारी के साथ कोई न था। मुझे उसपर दया आयी। उसे अपने नगर में ले आया। बात केवल इतनी ही है। परन्तु राम ने सब ठीक बातें बतायीं कि दशकण्ठ मेरी पत्नी सीता को चुरा कर लाया है। सीता बुलायी गयी। उसके साथ बन्दर भी थे और राक्षस भी थे जिससे सीता को सिखाने के लिए किसी को अवसर न मिले। सीता की गवाही और देवों की साक्षिता से सिद्ध हो गया कि राम का पक्ष सत्य है। दशकण्ठ का मुंह बन्द हो गया। फिर उसने यह बहाना लिया कि उसने कई बार देवताओं को पराजित किया था, अतः वे ईर्ष्या रखते हैं। उसको सताने की तरकीबें सोचते रहते हैं। परन्तु अब मालीवराज का विश्वास दशकण्ठ से उठ गया। अन्तिम बात ने तो उसको स्पष्ट ही दशकण्ठ के विरुद्ध कर दिया। उन्होंने आज्ञा दी कि दशकण्ठ सीता को वापस कर दे, युद्ध समाप्त किया जाय। पर दशकण्ठ अड़ गया। अपनी इच्छा के सामने उसने सत्य और न्याय को त्याग दिया। न्यायाधीश की बात को मानने से इनकार कर दिया। अन्त में वे यह निर्णय करके चले गये कि दशकण्ठ राम के हाथ से मारा जाय। मालीवराज के साथी देवता भी स्वर्ग चले गये।

महास्त्र कपिलवद् दशकण्ठ ने महास्त्र कपिलवद् को जाग्रत् करना चाहा। उसे ईश्वर की ओर से वरदान मिला था। इसके जाग्रत् होने पर वह देवों सहित मालीवराज को भस्मीभूत कर सकेगा। दशकण्ठ ने साधुवेश में मेरुपर्वत की तलहटी में यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित कर मिट्टी की देवमूर्तियाँ बनायी। वह वेद-मन्त्रों के पाठ से प्रज्वलित हुई अग्नि में देव- मूर्तियों को डालने लगा। देवों में खलबली मच गयी। देवों के राजा ने देखा कि वह उन सबको भस्म करना चाहता है। वे ईश्वर के पास दौड़े। सहायता माँगी। दयालु ईश्वर ने “वाली, जो दूसरा जन्म लेकर देव बन गया था, से कहा जाओ, मेरुपर्वत को आग में झोंक दो।” शान्तिपूर्वक यज्ञ करते हुए दशकण्ठ ने वाली को देखा, परन्तु वाली देव था। दशकण्ठ की उसके सामने कुछ न चली। वह निराश होकर भाग निकला। दशकण्ठ ने देखा ईश्वर ने वाली को देव बना दिया। वह राम का पक्ष लेते हैं तो उसे बहुत बुरा लगा। परन्तु मण्डो ने बहुत समझाया और कहा शायद विभंक के समझाने पर हनुमान् आया होगा। उसी ने वाली का रूप धारण कर लिया होगा। विभेक ही सब बलाओं की जड़ है। पहले उसी को मारना चाहिये। दशकण्ठ को इसपर विश्वास हो गया। दूसरे दिन महास्त्र कपिलवद् को लेकर वह विभेक को मारने चला। उसे राम, लक्ष्मण और विभेक का मुकाबला करना पड़ा। कपिलवद् विभेक का रुधिर पीने लपका। विभेक ने वेग से अपने को बचा लिया। लक्ष्मण ने महास्त्र को वापस भेजा; लक्ष्मण के तीर से महास्त्र र्का मार्ग. तिरछा हो गया, पर दशकण्ठ का तीर लक्ष्मण को लगा। वह मूर्च्छित होकर गिर पड़े। यह देखकर राम ने भयङ्कर बाण-वर्षा की। दशकण्ठ को छोड़कर कोई राक्षस जीवित न रहा। दशकण्ठ भागकर महलों में जा छिपा। अब लक्ष्मण के घाव को ठीक करने के लिए विभेक ने उपाय किया। इसकी तीन बूटियाँ थीं। तुलुवा, संकरणी एवं त्रिजवा। परन्तु ये बूटियाँ उत्तरकुरु प्रदेश के सञ्जोवसञ्जी पर्वत पर ही मिल सकती थीं। इन बूटियों को इन्द्रकाल पर्वत की गुफा स्थित ईश्वर की गाय के गोबर में मिलाना पड़ता था। वहाँ जाने की गति उसी में थी जिसके मुंह में चाँद और नक्षत्र दीखते हों। हनुमान् ही इसके योग्य थे। वे तुरन्त गये। क्षण भर में बूटियाँ ले आये, पीसने की सिल भी पाताल के राजा कालानाग के पास थी और बट्टा दशकण्ठ के पास था। हनुमान् दौड़कर पाताल से सिल लाये, बट्टा लेने दशानन के घर में घुस गये। वह उसे तकिया बनाकर सो रहा था। हनुमान् ने ४६