रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९४ रामायणमीमांसा त्रयोदश यह ठीक ही है कि अधिकांश ग्रन्थों में इन्द्र और अहल्या को ही गौतम का शाप मिला है, पर रामकियेन आदि कुछ ग्रन्थों के अनुसार गौतम ने अपनी पुत्री को भी शाप दिया है। मुनि ने भार्या की भर्त्सना की और कहा क्योंकि तुम अनवस्थित ( अव्यवस्थित, चञ्चल ) होकर पातिव्रत्य से विचलित हो गयी, अतः तुम्हारा रूप भी स्थिर नहीं रहेगा— तां तु भार्या विनिर्भर्त्स्य सोऽब्रवीत् सुमहातपाः । दुविनीते विनिध्वंस ममाश्रमसमीपतः ॥ रूपयौवनसम्पन्ना यस्मात्त्वमनवस्थिता । तस्माद्रूपवती लोके न त्वमेका भविष्यसि ॥ (वा० रा० ७।३०।३६,३७) यद्यपि अहल्या ने मुनि का प्रसाद करते हुए कहा कि मुझसे अज्ञानवशात् यह कार्य हो गया, कामकार से मैंने ऐसा नहीं किया, परन्तु बालकाण्ड के वृत्तान्त से एकवाक्यता करके या तो यही समझना चाहिये कि उसने प्रसादनार्थ ही वैसा कहा है, अथवा दोनों कथाओं को दो भिन्न कल्पों की मानकर यह मानना चाहिये कि किसी कल्प में गौतम-पत्नी ने अज्ञानपूर्वक इन्द्रसंगम किया तो किसी कल्प के अनुसार ज्ञानपूर्वक वैसा दुष्कर्म किया था । ज्ञानपूर्वक दुष्कृत पक्ष में ही शिला हो जाने का भी शाप समझना चाहिये । तुम राम का दर्शन करके पवित्र हो जाओगी । तुम्हारे दुष्कृत को मिटाकर तुम्हें पवित्र करने की शक्ति उन्हीं में है । तुम उन राम का आतिथ्यसत्कार करके पुनः वरवर्णिनी होकर मेरे पास रह सकोगी । राम ही तुम्हें पवित्र कर सकते हैं । इन कथनों से ज्ञानपूर्वक ही दुष्कृत प्रतीत होता है । महाभारत ( १२।२६६।४ ) के अनुसार गौतम और अहल्या के चिरकारी पुत्र था । उनकी पुत्री का भी उल्लेख है, जिसका विवाह उत्तङ्क से हुआ था ( म० भा० १४।५६।२४ ) । गौतम जिनके पुत्र शरद्वान् जो सरकण्डे से उत्पन्न हुए थे उन्हें अहल्यापति गौतम से भिन्न ही समझना चाहिये । वाल्मीकिरामायण तथा महावीरचरित आदि के अनुसार जनकपुरोहित शतानन्दजी गौतम और अहल्या के पुत्र थे । रामकीर्ति के अनुसार अञ्जना, वाली और सुग्रीव भी अहल्या की सन्तान हैं । चिरकारी की माता अहल्या की कथा कल्पान्तरीय कथा है । वाल्मीकिरामायण की कथा की अहल्या सदोष थी और उसके अनुसार गौतम ने इन्द्र और अहल्या दोनों को ही शाप दिया था । उसी अहल्या का राम द्वारा उद्धार हुआ । उत्तरकाण्ड के अहल्या-वृत्तान्त की बालकाण्ड के वृत्तान्त के साथ एकवाक्यता ही समझनी चाहिये, क्योंकि उत्तरकाण्ड की कथा के अनुसार इन्द्रजित् द्वारा इन्द्र के पराजित होने पर देवताओं के साथ प्रजापति ने जाकर विविध वर प्रदान कर इन्द्र को मुक्त कराया । भ्रष्ट-तेजा चिन्तापरीतात्मा इन्द्र के प्रश्न करने पर प्रजापति ने अहल्या- धर्षण का वृत्तान्त सुना कर यह बताया कि अहल्याधर्षण के कारण गौतम महर्षि के शाप से यह तुम्हारा पराभव हुआ है— “यस्मान्मे धर्षिता पत्नी त्वया वासव निर्भयात् । तस्मात् त्वं समरे शक्र शत्रुहस्तं गमिष्यसि ॥” ( वा० रा० ७।३०।३२ ) यह व्यभिचार दोष मनुष्यों में भी उत्पन्न होगा और उसमें आधा पाप पापी को होगा और आधा तुम्हें ( इन्द्र को ) मिलेगा । तुम्हारा ऐन्द्र पद भी स्थिर नहीं रहेगा । कौशिक के शाप के कारण इन्द्र का मुष्क नष्ट हो गया । फिर, मेष का वृषण धारण कर उन्हें मेषवृषण बनना पड़ा । अन्यत्र यह भी उल्लेख है कि गौतम ने इन्द्र के वृषण को छिन्न करके पृथिवी पर डाल दिया—