भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 472

अध्याय बालकाण्ड ३९५ “इन्द्रस्यापि च धर्मज्ञ च्छिन्नं तु वृषणं पुरा। ऋषिणा गौतमेनोर्व्या क्रुद्धेन विनिपातितम् ॥” ( लि० पु० २९।२७ ) इससे ज्ञात होता है कि गौतम का कौशिक नाम भी था। अतएव इन्द्र का उनका रूप बनाकर अहल्या के पास जाने के कारण कौशिक द्वारा इन्द्र के वृषणवियोग और मेषवृषण की कथा भी सङ्गत है। इन्द्र कभी कौशिक (गाधि) रूप में उत्पन्न हुए थे, इसलिए भी इन्द्र कौशिकब्राह्मण नाम से प्रख्यात थे और कौशिक (गौतम) का रूप धारण कर अहल्या के पास आये । इसलिए भी कौशिकब्राह्मणरूप से प्रख्यात थे, यह “कौशिको हि स्मैनामुपनिन्ये” के सायण भाष्य से स्पष्ट है । मुद्गलवंशीय वध्यश्व या बृहदश्व या विन्ध्याश्व ही अहल्या के पिता हैं। कल्पभेद से भी समाधान संभव है। अतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार साक्षात् ब्रह्मा द्वारा निर्मित अहल्या गौतम को प्रदान की गयी। गौतम की ब्रह्मचर्यनिष्ठा और तपःसिद्धि से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गौतम को अहल्या का प्रदान किया । ब्रह्माण्डपुराण (अ० ७) के अनुसार अर्धप्रसूतां सुरभि (गौ) तथा शिवलिङ्ग की परिक्रमा के माहात्म्य के वर्णन के प्रसंग से उसका रूपान्तर वर्णन भी असङ्गत नहीं है। एक इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट की निवृत्ति में अनेक शुभ कर्मों का उपयोग होता है। ब्रह्मचर्य व्रत से अथवा द्विमुखी गौ के परिक्रमण आदि अनेकों हेतुओं से ब्रह्मा की प्रसन्नता हो सकती है । इसके अतिरिक्त अर्थवाद वचनों का तात्पर्य स्वार्थ में न होकर विधित्सित अर्थ की स्तुति में ही होता है। पृथ्वी-परिक्रमा आदि की बात द्विमुखी गौ की परिक्रमा का अर्थवाद ही है। बुल्के ने लिखा है—पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ में अहल्या को भूल से विश्वामित्र की पत्नी कहा गया है। परन्तु इसका भी कुछ आधार भारत में मिलता है, जहाँ लिखा है— “अहल्याधर्षणनिमित्तं हि गोतमात् हरितश्म- श्रुतामिन्द्रः प्राप्तः”—अहल्या के धर्षण के कारण गौतम के शाप से इन्द्र हरितश्मश्रु हो गये थे । वहीं यह भी उल्लिखित है— “कौशिकनिमित्तं चेन्द्रो मुष्कवियोगं मेषवृषणत्वं चावाप” ( म० भा० १२।३४२।२३ ) । अहल्या के पति का नाम गौतम था यह प्रमाणसिद्धि ही है। अहल्या की वंशावली के सम्बन्ध में हरिवंश, विष्णुपुराण आदि के मतभेद का भी समन्वय कर लेना चाहिए । श्रीमद्भागवतपुराण (९।२१।३४) के अनुसार अहल्या के पिता मुद्गल थे। इसका अर्थ है कि मुद्गलवंश में अहल्या की उत्पत्ति हुई थी। अतएव हरिवंश ( १।३२।२८-३२ ) के अनुसार वध्यश्व मुद्गल से मोद्गल, उनसे इन्द्रसेन और उनसे वध्यश्व और बध्यश्व से दिवोदास तथा अहल्या की उत्पत्ति हुई थी । विष्णुपुराण (४।१९।६१ ) के बृहदश्व तथा मत्स्यपुराण ( ५०।६० ) के विन्ध्याश्व को वध्यश्व से अभिन्न ही समझना चाहिए । वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड के अनुसार ब्रह्मा ने सब प्राणियों के तथा सहस्रों सुन्दरियों के अङ्गों के सौन्दर्य को लेकर अहल्या का निर्माण किया और उसमें कुरूपता का अत्यन्त अभाव था, इसी लिए उसका नाम अहल्या हुआ । अतः अहल्या ब्रह्मा की पुत्री थी। वैसे तो सभी प्राणियों के रचयिता ब्रह्मा ही होते हैं, तथापि अहल्या को विशेषरूप से रचा गया, इसी लिए उसे ब्रह्मा की पुत्री कहा जा सकता है, किन्तु मनुष्यलोक में वह मुद्गल-वंश में उत्पन्न हुई । इसी दृष्टि से "आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब । नव्यमायुः प्रसूतिर कृधी सहस्रसामृषिम् ।” ऋक्संहिता ( १।१०।११) में इन्द्र को कौशिक कहा गया है। सायणानुसारी मन्त्रार्थ यह है— इन्द्र, तू शीघ्र ही, नः अस्मान् प्रति, हमारे पास आओ। हे कौशिक कुशिकपुत्र इन्द्र, मन्दसानः प्रसन्न हाकर सुतं सोम का पान करो। हे इन्द्र नव्य स्तुत्य कर्मानुष्ठान तत्पर प्रकृष्ट सुसुन्दर आयु बढ़ाओ । तदनन्तर मुझे