भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 473

३९६ रामायणमीमांसा त्रयोदश सहस्रों लाभों से युक्त ऋषि ( अतीन्द्रिय द्रष्टा ) कृषि बनाओ । यद्यपि विश्वामित्र कौशिक नाम से प्रसिद्ध हैं, तथापि प्रामाणिक वचनों से इन्द्र का भी कौशिक होना सिद्ध है । अनुक्रमणिका के अनुसार यह वृत्तान्त प्रसिद्ध है कि इन्द्रतुल्य पुत्र की इच्छा से कुशिक ने ब्रह्मचर्य तप किया । तब इन्द्र कुशिक के पुत्ररूप में उत्पन्न हुए थे— “कुशिकस्त्वैषी रथिरिन्द्रतुल्यं पुत्रमिच्छन् ब्रह्मचर्यं चचार । तस्येन्द्र एव गाथी पुत्रो जज्ञे”— अनु० ( ऋ० सं० ३।१ ) । पूर्वोक्त हरिवंश की कथा से इसकी संगति मिलती है। अतएव मन्त्रों की व्याख्या पुराणों में की जाती है । वेद इतने गूढ़रहस्यमय हैं कि उनका अर्थ अटकलबाजी के आधार पर नहीं किया जा सकता । सर्वज्ञ- कल्प महर्षि ही वेदार्थ निर्णय कर सकते हैं, अतः वाल्मीकि, व्यास, पराशर आदि महर्षियों ने ही पुराणेतिहासों के द्वारा स्पष्ट अर्थ बतलाया है । गौरावस्कन्दी ( स्कन्दिर गतौ ) इन्द्र कहे जाते हैं। उक्त अर्थ षड्विंशब्राह्मण में स्पष्ट है । गौतमपत्नी अहल्या के जार इन्द्र हैं—यह पुराणों में प्रसिद्ध है । कौशिकनामक ब्राह्मण के समीप में ब्राह्मणवेश से आकर इन्द्र ने उनकी स्तुति की थी, इसलिए वे 'गौतमब्रुवाण' नाम से सम्बोधित होते हैं । वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के अनुसार विश्वामित्र सहस्र वर्ष पर्यन्त तप करने के व्रत के पूर्ण होने पर जब भोजन करने को प्रस्तुत हुए तभी द्विजाति के वेष में आकर इन्द्र ने उनसे सिद्ध अन्न माँगा— “स कृत्वा निश्चयं राम तप आतिष्ठताव्ययम् । तस्य वर्षसहस्रस्य व्रते पूर्णे महाव्रतः ॥ भोक्तुमारब्धवानन्नं तस्मिन् काले रघूत्तम । इन्द्रो द्विजातिर्भूत्वा तं सिद्धमन्नमयाचत ।।” ( वा० रा० १।६५।४,५ ) हरिवंश के अनुसार आदित्य के समान तेजस्वी इन्द्र को तीनों लोकों एवं आदित्यों का राजा बनाया गया । वज्री, कवची और जिष्णु, स्मृतियुक्त, द्युतिमान् इन्द्र अदिति से उत्पन्न हुए थे, अध्वर्युवों ने उनकी स्तुति की । उत्पन्न होते ही उन्हें कुशयुक्त ब्राह्मणों ने धारण किया, अतः वे कौशिक कहलाये— “जातमात्रोऽथ भगवान् सकुशैर्ब्राह्मणैधृतः । तदाप्रभृति देवेशः कौशिकत्वमुपागतः ॥” ( हरिवं० ३।३७।३ ) कुशिक-पुत्र गाधि के रूप में इन्द्र का जन्म होने से भी इन्द्र कौशिक कहलाये, यह भी पीछे कहा गया है । “त्रयाणामपि लोकानामादित्यानां च भारत । चकार शक्रं राजानमादित्यसमतेजसम् ॥ स वज्रो कवची जिष्णुरदित्यामभिजज्ञिवान् । स्मृतेः सहायो द्युतिमान् यथा सोऽध्वर्युभिः स्तुतः ॥” ( हरिवं० ३।३७।१,२ ) उस समय इन्द्र “मैं गौतम हूँ” ऐसा कहकर गौतमरूप से व्यवह्रियमाण होकर विचरते थे, इसलिए उन्हें गौतमब्रुवाण कहा जाता है । इन्द्रागच्छ इत्यादि मन्त्र की व्याख्या शतपथ में भी की गयी है । उसमें कहा गया है—इन्द्र के जो चरण ( चरित्र ) हैं उन्हीं के द्वारा इन्द्र को प्रमुदित करना अभीष्ट है— “यान्येवास्य चरणानि तैरैवैतमेतत्प्रसुमोदयिषति” ( श० ब्रा० ३।३४।१८ ) । तैत्तिरीय आरण्यक में भी उपर्युक्त मन्त्र की व्याख्या की गयी है। उसका सायनानुसारी अर्थ यह है—हे परमेश्वर्ययुक्त इन्द्र, इस यज्ञकर्म में