भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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बना दिये । एक काक ने उसका एक भाग चुराकर कैकसी के पास पहुँचा दिया । उसे खाने के कारण कैकसी ने विभीषण को जन्म दिया । सेरीराम तथा रामकियेन में सीता के जन्म का सम्बन्ध पुत्रेष्टियज्ञ से स्थापित किया गया है । सेरीराम के अनुसार एक काक पायस का षष्ठांश चुराता है । इसपर याज्ञिक कहता है कि यह काक दशरथ-पत्नी के पुत्र द्वारा मारा जायगा तथा जो इस पायस को खायेगा उसे एक पुत्री उत्पन्न होगी, जिसका विवाह राम के साथ होगा । बाद में रावण उस पायस को खाता है । रामकियेन के अनुसार यज्ञ के उस पायस की सुगन्धि लङ्का तक पहुँच गयी । मन्दोदरी ने रावण से उसे माँगा । रावण ने काकना राक्षसी को पायस लाने का आदेश दिया । राक्षसी ने पायस का अष्टमांश चुराया । वह मन्दोदरी को दिया गया । उसी से सीता का जन्म होता है ( अ० १० ) । भुइयां माधवदासकृत विचित्ररामायण के अनुसार डाकिनियाँ आकर पुत्रेष्टियज्ञ के धूम का पान करती हैं और गर्भवती होकर वानर-सेना के २५ सेनापतियों को जन्म देती हैं । भट्टिकाव्य तथा रामायण ककविन में दशरथयज्ञ का वर्णन है, पर किसी दिव्य पुरुष द्वारा पायस प्रदान का उल्लेख नहीं है । भट्टिकाव्य के अनुसार वे हुतावशिष्ट हवि का कुछ अंश खाती हैं ( सर्ग १ ) । पद्मपुराण ( पातालखण्ड ११२।२३ और उत्तरखण्ड १८९।४७ ) के अनुसार विष्णु ही यज्ञाग्नि से प्रकट होकर पायस प्रदान करते हैं । रामरहस्य ( २।१४३ ) में भी वैसा ही उल्लेख है । वस्तुतः अग्निमुखेन विष्णु आदि सभी देवताओं का तर्पण होता है । अग्नि के अन्तर्यामी विष्णु ही हैं । बृहद्धर्मपुराण ( पूर्वखं० अ० १८ ) तथा वाल्मीकिरामायण ( १ । सर्ग १५ ) के अनुसार विष्णु देवताओं को आश्वासन देते हैं कि मैं राम के रूप में अवतार लूँगा । उसी समय शिव हनुमान् के रूप में राम को सहायता देने की प्रतिज्ञा करते हैं । अध्यात्मरामायण के अनुसार गोरूपधारिणी धरित्री देवताओं और मुनियों के साथ ब्रह्मा की शरण लेती है । ब्रह्मा सबको साथ लेकर क्षीरसमुद्र- वासी विष्णु के पास जाते हैं और स्तुति कर रावण-वध की प्रार्थना करते हैं । विष्णु कश्यप और अदिति के वर प्रदान की चर्चा करते हुए लक्ष्मी सहित अवतार लेने का आश्वासन देते हैं । ब्रह्मा देवताओं को वानरवंश में अवतरित होने का आदेश देते हैं । पद्मपुराण ( गौडीय पातालखण्ड अध्याय १४ ) में शान्ता अपने पिता दशरथ से अपने पति ऋष्यशृङ्ग की शक्ति का वर्णन करती है, दशरथ उनके द्वारा पुत्रेष्टियज्ञ कराते हैं । कृत्तिवासरामायण के अनुसार दशरथ अपने मन्त्रियों से कहते हैं कि मुझे अन्धक मुनि ने वर दिया है । ऋष्यशृङ्ग द्वारा यज्ञ कराने से पुत्र-प्राप्ति होगी । यह ऋष्यशृङ्ग कौन हैं ? इसपर वसिष्ठ ने उनकी कथा बतायी । तब दशरथ लोमपाद के यहाँ जाकर ऋष्यशृङ्ग को अयोध्या लाकर यज्ञ कराते हैं । विचित्ररामायण के अनुसार पुत्रेष्टि के समय परशुराम प्रकट होकर आदेश देते हैं जो ज्येष्ठ पुत्र हो उसका मेरा नाम रखना । काश्मीरीरामायण के अनुसार नारायण ने दशरथ को स्वप्न में कहा कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूंगा । अवतारवाद का विकास ? श्रीबुल्के यह मानते हैं कि पहले वाल्मीकिरामायण में अवतार का वर्णन नहीं था । यह पीछे का विकास है, परन्तु उनका यह मत सर्वथा अशुद्ध और निराधार है, क्योंकि मन्त्रों, ब्राह्मणों, पुराणों, महाभारत, गीता आदि में सर्वत्र अवतारवाद प्रसिद्ध है । अतः वाल्मीकिरामायण के अवतार-वर्णन को प्रक्षिप्त कहना सर्वथा निर्मूल ही है । दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार कौशल्या को पायस का आधा भाग प्राप्त हुआ । सुमित्रा को एक चतुर्थांश तथा कैकेयी को एक अष्टमांश दिया गया है । वाल्मीकिरामायण उदीच्यपाठ तथा रामचरितमानस का पायस-विभाग निम्नोक्त है—