रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 486, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ४०९ सबका निष्कर्ष यही है कि श्रीदशरथजी को अनेक तपस्याओं, यज्ञों तथा व्रतों एवं योगियों और मुनियों के अनुग्रह से ही राम, लक्ष्मण आदि जैसे दिव्य सुपुत्रों की प्राप्ति हुई । तिब्बती रामायण के अनुसार ५०० पाँच सौ कैलासवासी ऋषियों से दशरथ ने पुत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की थी । उनके दिये हुए एक फल के खाने से उनकी दो पत्नियों को राम और लक्ष्मण दो पुत्र हुए थे । असमिया बालकाण्ड के अनुसार अन्धकमुनि के दिये फल से दशरथ को पुत्र-प्राप्ति हुई । सेरीराम के अनुसार एक योगी ने सन्तान-प्राप्ति के लिए चार "वाजहर" नामक पत्थर प्रदान किये थे । एक अन्य पाठ के अनुसार दशरथ को दस हजार हाथियों के वध का परामर्श दिया गया था। देशान्तर और कालान्तर में विविध संसर्गों से रामायण की मूल कथाओं में अनेक प्रकार की विकृतियों का आ जाना स्वाभाविक ही है, अतः राम की कथाओं में वाल्मीकिरामायण मुख्य प्रमाण है। तदनुसार आर्ष रामायण एवं पुराणों, संहिताओं की कथाएँ प्रमाण हैं। अन्य कथाएँ भी पूर्वोक्त आर्ष ग्रन्थों से अविरुद्ध ही प्रमाण हैं। विरुद्ध कथाओं को विकृति ही समझना चाहिये । वाल्मीकिरामायण के अनुसार एक अश्वमेधयज्ञ एवं एक पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन मिलता है । इसी अवसर पर हविर्भाग-ग्रहणार्थ देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा परमर्षि आते हैं और ब्रह्मा से निवेदन करते हैं कि आपके वरदान से दृप्त होकर रावण हम सबको बाधित करता है । उसके वध का आप मार्ग निकालिये । ब्रह्मा कहते हैं मनुष्य के द्वारा उसका वध संभव है । उसी समय वहाँ विष्णु भगवान् का भी आगमन होता है । वह सब की प्रार्थना पर दशरथ के पुत्ररूप में प्रकट होकर रावण-वध करने का आश्वासन देते हैं। पुत्रेष्टियज्ञ की अग्नि से प्रकट होकर अग्निदेव दशरथ को पायसान्न प्रदान करते हैं । श्रीदशरथजी उसे अपनी पत्नियों में बांट देते हैं, जिससे तीनों गर्भवती होती हैं ( वा० रा० १ । सर्ग १५ और १६ ) । अनन्तर विष्णु के अवतार भूत राम की सहायता के लिए ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार देवता लोग अप्सराओं और गन्धर्वियों से वानरों के रूप में प्रकट होते हैं ( वा० रा० १ । सर्ग १७ ) । बुल्के कहते हैं, "वाल्मीकिरामायण में पहले अश्वमेध का ही वर्णन किया था; बाद में पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन जोड़ दिया गया है ।" परन्तु यह उनकी भ्रान्ति ही है। उनकी दृष्टि में तो अश्वमेध-वर्णन भी प्रक्षिप्त ही है। वही क्यों वे तो सारे बालकाण्ड को ही प्रक्षिप्त मानते हैं, जिसका कि हम पीछे खण्डन कर चुके हैं । वस्तुतः अश्वमेधयज्ञ तो श्रवणकुमार-वध आदि पापों के प्रायश्चित्तार्थ किया गया था । पुत्र के लिए पुत्रेष्टियज्ञ का ही अनुष्ठान किया गया था । अतएव पद्मपुराण, नृसिंहपुराण, रघुवंश, भट्टिकाव्य, जानकीहरण, अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस आदि में पुत्रेष्टियज्ञ का ही वर्णन है। ब्रह्मपुराण (अध्याय १२३ ) में श्रवणकुमार-वध का प्रायश्चित्त करने के लिए ही अश्वमेधयज्ञ के आयोजन का उल्लेख है । यज्ञ में आकाशवाणी भी हुई थी कि राजा अपने ज्येष्ठ पुत्र के प्रसाद से पापमुक्त हो जायेंगे । अन्य कथाओं के अनुसार पुत्रेष्टियज्ञ-वर्णन के प्रसङ्ग में ही हनुमान्, विभीषण और सीता तथा वानर- सेनापतियों के भी जन्म का निर्देश है। आनन्दरामायण के अनुसार एक गीध ने कैकेयी का पायस उसके हाथ से छीन लिया था और अञ्जनी पर्वत पर फेंक दिया था । इसपर अन्य रानियों ने पायस का कुछ अंश कैकेयी को दे दिया । भावार्थरामायण में भी ऐसी ही कथा है । अन्य रचनाओं के अनुसार दशरथ ने सर्वप्रथम कैकेयी को पायस प्रदान नहीं किया था, अतः वह मानिनी हो रही थी । इतने में चील ने उसके हाथ से पायस लेकर अञ्जनी के मुख में डाल दिया । उसी से हनुमान् की उत्पत्ति हुई । आनन्दरामायण ( १।१।९६ ), भावार्थरामायण ( १।१ ), पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ तथा दक्षिण भारतीय एक वृत्तान्त के अनुसार ऋषि ने दशरथ की पत्नियों का नाम पूछा । भूल से दशरथ के मुख से कैकसी रावण की माता का नाम निकला । इसपर ऋषि ने पायस के चार भागों के पाँच भाग ५२