भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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परन्तु उक्त कथन अर्धसत्य ही है, क्योंकि अवतार के कारणों का निरूपण तो बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण में भी है ही । विवाह के प्रसङ्ग में सूर्यवंश या इक्ष्वाकुवंश का वर्णन भी वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड में है ही ( १।७०।२१-४३ ) । दशरथ के विवाह और अन्धमुनि की कथा भी वाल्मीकिरामायण में है ही । कृष्णलीला का अनुकरण राम में संभव नहीं है, क्योंकि राम कृष्ण से प्राचीन ही हैं, यही कहना युक्त भी है । आर्ष वर्णन सभी प्रामाणिक हैं । वाल्मीकिरामायण में अनुक्त होने पर भी कोई विरोध नहीं है । वाल्मीकिरामायण से अनुक्त भी अविरुद्ध विशेष मान्य होता ही है—'अनुक्तमप्रतिषिद्धमनुमतं भवति ।' तीर्थ-यात्रा, वैराग्य आदि भी योगवासिष्ठ प्रोक्त होने से प्रामाणिक ही हैं। इसी तरह वाल्मीकिरामायण में अनुक्त भी विशेष अन्य ग्रन्थों द्वारा वर्णित होने पर मान्य ही हैं । शतकोटिप्रविस्तर रामायण में अविरुद्ध अन्य विशेषों का वर्णन संभव ही है । अवतारवाद अवतारवाद के विरुद्ध बुल्के द्वारा प्रस्तुत तर्कों का पीछे विस्तार से खण्डन किया जा चुका है । अतएव इस सम्बन्ध में अधिक वक्तव्य अपेक्षित नहीं है । श्रीबुल्के का पुत्रेष्टियज्ञ के प्रसङ्ग को प्रक्षिप्त कहना भी असङ्गत ही है । अन्यान्य अंशों में श्रीबुल्के महाभारत के रामोपाख्यान का सहारा पकड़ते हैं, पर वह इस प्रसङ्ग में यह मानते हैं कि उसमें अवतारवाद का उल्लेख है । फिर भी वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड में वर्णित अवतारवाद को प्रक्षिप्त मानने का हठ करते हैं। साथ ही यह भी आवश्यक नहीं है कि संक्षिप्त रामोपाख्यान में विस्तृत रामकथा के सर्वांश का वर्णन हो । एक प्राचीन ग्रन्थ का प्रामाण्य अर्वाचीन ग्रन्थ पर निर्भर नहीं हो सकता । बुल्के कहते हैं हरिवंशपुराण, वायुपुराण एवं भागवतपुराण में दशरथ के यज्ञ का वर्णन नहीं है; परन्तु यदि वर्णन होता तो भी जैसे उनमें वर्णित अवतारवाद उन्हें मान्य नहीं है वैसे ही उनमें वर्णित यज्ञ भी मान्य न होता या बुल्के उसे भी प्रक्षिप्त मान बैठते । “सुतार्थं तप्यमानस्य नासीद् वंशकरः सुतः ।” वाल्मीकिरामायण ( १।८ ) के अनुसार श्रीदशरथजी तप हो रहे थे, परन्तु कोई वंशकर पुत्र नहीं हुआ था अथवा 'तप्यमानस्य' का अभिप्राय यह है कि राजा दशरथ विविध प्रकार के तप कर रहे थे । जैसा कि स्कन्दपुराण के दो स्थलों में उनकी तपस्या का वर्णन है, नागरखण्ड के अनुसार दशरथ का शनैश्चर के साथ युद्ध होने के पश्चात् इन्द्र ने उनसे कहा— “अपुत्रस्य गतिर्नास्ति” अपुत्र की गति नहीं होती । इसपर राजा कार्तिकेयपुर में १०० वर्ष तक तपस्या करते हैं । अन्त में जनार्दन प्रकट होकर स्वयं चार पुत्रों के रूप में प्रकट होने का वरदान देते हैं । बाद में दशरथ को चार पुत्रों एवं एक पुत्री की प्राप्ति होती है । प्रभासखण्ड के अनुसार प्रभास में तप करने और शिवलिङ्ग- स्थापना करने की भी चर्चा आती है । वाराहपुराण के अनुसार दशरथ वसिष्ठ के परामर्श से राम-द्वादशी का व्रत करते हैं । फलस्वरूप विष्णु उनके सन्तानरूप में प्रकट हुए । वस्तुतः किसी महाफल की प्राप्ति के लिए लोग अनेक प्रकार की तपस्याएँ तथा आराधनाएँ करते ही हैं । तदनुसार दशरथ के भी अनेक तप और व्रतों की बात सङ्गत ही है । सारलादास के महाभारत के अनुसार इन्द्र के यहाँ से लौटते हुए दशरथ के द्वारा कपिला की अवज्ञा हो गयी थी, इसलिए कपिला के शाप से पुत्र-प्राप्ति में बाधा हुई; परन्तु बाद में व्याघ्र के आक्रमण से कपिला को बचाने के कारण कपिला के वरदान से उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति होती है । ग्रामगीतों के अनुसार किसी योगी के प्रसाद से उन्हें पुत्र-प्राप्ति होती है । बिहौर के अनुसार किसी ब्राह्मण को अपने ज्येष्ठ पुत्र देने की प्रतिज्ञा से दशरथ को पुत्र-प्राप्ति हुई है । संथाल जाति में प्रचलित कथा के अनुसार किसी योगी ने चार आम दिये थे । उन्हें अपनी पत्नियों को खिलाने से उन्हें पुत्र-प्राप्ति होती है ।