रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय बालकाण्ड ४०९ सबका निष्कर्ष यही है कि श्रीदशरथजी को अनेक तपस्याओं, यज्ञों तथा व्रतों एवं योगियों और मुनियों के अनुग्रह से ही राम, लक्ष्मण आदि जैसे दिव्य सुपुत्रों की प्राप्ति हुई । तिब्बती रामायण के अनुसार ५०० पाँच सौ कैलासवासी ऋषियों से दशरथ ने पुत्र-प्राप्ति की प्रार्थना की थी । उनके दिये हुए एक फल के खाने से उनकी दो पत्नियों को राम और लक्ष्मण दो पुत्र हुए थे । असमिया बालकाण्ड के अनुसार अन्धकमुनि के दिये फल से दशरथ को पुत्र-प्राप्ति हुई । सेरीराम के अनुसार एक योगी ने सन्तान-प्राप्ति के लिए चार "वाजहर" नामक पत्थर प्रदान किये थे । एक अन्य पाठ के अनुसार दशरथ को दस हजार हाथियों के वध का परामर्श दिया गया था। देशान्तर और कालान्तर में विविध संसर्गों से रामायण की मूल कथाओं में अनेक प्रकार की विकृतियों का आ जाना स्वाभाविक ही है, अतः राम की कथाओं में वाल्मीकिरामायण मुख्य प्रमाण है। तदनुसार आर्ष रामायण एवं पुराणों, संहिताओं की कथाएँ प्रमाण हैं। अन्य कथाएँ भी पूर्वोक्त आर्ष ग्रन्थों से अविरुद्ध ही प्रमाण हैं। विरुद्ध कथाओं को विकृति ही समझना चाहिये । वाल्मीकिरामायण के अनुसार एक अश्वमेधयज्ञ एवं एक पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन मिलता है । इसी अवसर पर हविर्भाग-ग्रहणार्थ देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा परमर्षि आते हैं और ब्रह्मा से निवेदन करते हैं कि आपके वरदान से दृप्त होकर रावण हम सबको बाधित करता है । उसके वध का आप मार्ग निकालिये । ब्रह्मा कहते हैं मनुष्य के द्वारा उसका वध संभव है । उसी समय वहाँ विष्णु भगवान् का भी आगमन होता है । वह सब की प्रार्थना पर दशरथ के पुत्ररूप में प्रकट होकर रावण-वध करने का आश्वासन देते हैं। पुत्रेष्टियज्ञ की अग्नि से प्रकट होकर अग्निदेव दशरथ को पायसान्न प्रदान करते हैं । श्रीदशरथजी उसे अपनी पत्नियों में बांट देते हैं, जिससे तीनों गर्भवती होती हैं ( वा० रा० १ । सर्ग १५ और १६ ) । अनन्तर विष्णु के अवतार भूत राम की सहायता के लिए ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार देवता लोग अप्सराओं और गन्धर्वियों से वानरों के रूप में प्रकट होते हैं ( वा० रा० १ । सर्ग १७ ) । बुल्के कहते हैं, "वाल्मीकिरामायण में पहले अश्वमेध का ही वर्णन किया था; बाद में पुत्रेष्टियज्ञ का वर्णन जोड़ दिया गया है ।" परन्तु यह उनकी भ्रान्ति ही है। उनकी दृष्टि में तो अश्वमेध-वर्णन भी प्रक्षिप्त ही है। वही क्यों वे तो सारे बालकाण्ड को ही प्रक्षिप्त मानते हैं, जिसका कि हम पीछे खण्डन कर चुके हैं । वस्तुतः अश्वमेधयज्ञ तो श्रवणकुमार-वध आदि पापों के प्रायश्चित्तार्थ किया गया था । पुत्र के लिए पुत्रेष्टियज्ञ का ही अनुष्ठान किया गया था । अतएव पद्मपुराण, नृसिंहपुराण, रघुवंश, भट्टिकाव्य, जानकीहरण, अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस आदि में पुत्रेष्टियज्ञ का ही वर्णन है। ब्रह्मपुराण (अध्याय १२३ ) में श्रवणकुमार-वध का प्रायश्चित्त करने के लिए ही अश्वमेधयज्ञ के आयोजन का उल्लेख है । यज्ञ में आकाशवाणी भी हुई थी कि राजा अपने ज्येष्ठ पुत्र के प्रसाद से पापमुक्त हो जायेंगे । अन्य कथाओं के अनुसार पुत्रेष्टियज्ञ-वर्णन के प्रसङ्ग में ही हनुमान्, विभीषण और सीता तथा वानर- सेनापतियों के भी जन्म का निर्देश है। आनन्दरामायण के अनुसार एक गीध ने कैकेयी का पायस उसके हाथ से छीन लिया था और अञ्जनी पर्वत पर फेंक दिया था । इसपर अन्य रानियों ने पायस का कुछ अंश कैकेयी को दे दिया । भावार्थरामायण में भी ऐसी ही कथा है । अन्य रचनाओं के अनुसार दशरथ ने सर्वप्रथम कैकेयी को पायस प्रदान नहीं किया था, अतः वह मानिनी हो रही थी । इतने में चील ने उसके हाथ से पायस लेकर अञ्जनी के मुख में डाल दिया । उसी से हनुमान् की उत्पत्ति हुई । आनन्दरामायण ( १।१।९६ ), भावार्थरामायण ( १।१ ), पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ तथा दक्षिण भारतीय एक वृत्तान्त के अनुसार ऋषि ने दशरथ की पत्नियों का नाम पूछा । भूल से दशरथ के मुख से कैकसी रावण की माता का नाम निकला । इसपर ऋषि ने पायस के चार भागों के पाँच भाग ५२
बना दिये । एक काक ने उसका एक भाग चुराकर कैकसी के पास पहुँचा दिया । उसे खाने के कारण कैकसी ने विभीषण को जन्म दिया । सेरीराम तथा रामकियेन में सीता के जन्म का सम्बन्ध पुत्रेष्टियज्ञ से स्थापित किया गया है । सेरीराम के अनुसार एक काक पायस का षष्ठांश चुराता है । इसपर याज्ञिक कहता है कि यह काक दशरथ-पत्नी के पुत्र द्वारा मारा जायगा तथा जो इस पायस को खायेगा उसे एक पुत्री उत्पन्न होगी, जिसका विवाह राम के साथ होगा । बाद में रावण उस पायस को खाता है । रामकियेन के अनुसार यज्ञ के उस पायस की सुगन्धि लङ्का तक पहुँच गयी । मन्दोदरी ने रावण से उसे माँगा । रावण ने काकना राक्षसी को पायस लाने का आदेश दिया । राक्षसी ने पायस का अष्टमांश चुराया । वह मन्दोदरी को दिया गया । उसी से सीता का जन्म होता है ( अ० १० ) । भुइयां माधवदासकृत विचित्ररामायण के अनुसार डाकिनियाँ आकर पुत्रेष्टियज्ञ के धूम का पान करती हैं और गर्भवती होकर वानर-सेना के २५ सेनापतियों को जन्म देती हैं । भट्टिकाव्य तथा रामायण ककविन में दशरथयज्ञ का वर्णन है, पर किसी दिव्य पुरुष द्वारा पायस प्रदान का उल्लेख नहीं है । भट्टिकाव्य के अनुसार वे हुतावशिष्ट हवि का कुछ अंश खाती हैं ( सर्ग १ ) । पद्मपुराण ( पातालखण्ड ११२।२३ और उत्तरखण्ड १८९।४७ ) के अनुसार विष्णु ही यज्ञाग्नि से प्रकट होकर पायस प्रदान करते हैं । रामरहस्य ( २।१४३ ) में भी वैसा ही उल्लेख है । वस्तुतः अग्निमुखेन विष्णु आदि सभी देवताओं का तर्पण होता है । अग्नि के अन्तर्यामी विष्णु ही हैं । बृहद्धर्मपुराण ( पूर्वखं० अ० १८ ) तथा वाल्मीकिरामायण ( १ । सर्ग १५ ) के अनुसार विष्णु देवताओं को आश्वासन देते हैं कि मैं राम के रूप में अवतार लूँगा । उसी समय शिव हनुमान् के रूप में राम को सहायता देने की प्रतिज्ञा करते हैं । अध्यात्मरामायण के अनुसार गोरूपधारिणी धरित्री देवताओं और मुनियों के साथ ब्रह्मा की शरण लेती है । ब्रह्मा सबको साथ लेकर क्षीरसमुद्र- वासी विष्णु के पास जाते हैं और स्तुति कर रावण-वध की प्रार्थना करते हैं । विष्णु कश्यप और अदिति के वर प्रदान की चर्चा करते हुए लक्ष्मी सहित अवतार लेने का आश्वासन देते हैं । ब्रह्मा देवताओं को वानरवंश में अवतरित होने का आदेश देते हैं । पद्मपुराण ( गौडीय पातालखण्ड अध्याय १४ ) में शान्ता अपने पिता दशरथ से अपने पति ऋष्यशृङ्ग की शक्ति का वर्णन करती है, दशरथ उनके द्वारा पुत्रेष्टियज्ञ कराते हैं । कृत्तिवासरामायण के अनुसार दशरथ अपने मन्त्रियों से कहते हैं कि मुझे अन्धक मुनि ने वर दिया है । ऋष्यशृङ्ग द्वारा यज्ञ कराने से पुत्र-प्राप्ति होगी । यह ऋष्यशृङ्ग कौन हैं ? इसपर वसिष्ठ ने उनकी कथा बतायी । तब दशरथ लोमपाद के यहाँ जाकर ऋष्यशृङ्ग को अयोध्या लाकर यज्ञ कराते हैं । विचित्ररामायण के अनुसार पुत्रेष्टि के समय परशुराम प्रकट होकर आदेश देते हैं जो ज्येष्ठ पुत्र हो उसका मेरा नाम रखना । काश्मीरीरामायण के अनुसार नारायण ने दशरथ को स्वप्न में कहा कि मैं तुम्हारा पुत्र बनूंगा । अवतारवाद का विकास ? श्रीबुल्के यह मानते हैं कि पहले वाल्मीकिरामायण में अवतार का वर्णन नहीं था । यह पीछे का विकास है, परन्तु उनका यह मत सर्वथा अशुद्ध और निराधार है, क्योंकि मन्त्रों, ब्राह्मणों, पुराणों, महाभारत, गीता आदि में सर्वत्र अवतारवाद प्रसिद्ध है । अतः वाल्मीकिरामायण के अवतार-वर्णन को प्रक्षिप्त कहना सर्वथा निर्मूल ही है । दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार कौशल्या को पायस का आधा भाग प्राप्त हुआ । सुमित्रा को एक चतुर्थांश तथा कैकेयी को एक अष्टमांश दिया गया है । वाल्मीकिरामायण उदीच्यपाठ तथा रामचरितमानस का पायस-विभाग निम्नोक्त है—
अध्याय बालकाण्ड ४११ कौशल्या को अर्धभाग, कैकेयी को एक चतुर्थांश और सुमित्रा को दो अष्टमांश । रघुवंश, आध्यात्मरामायण आदि में चारों भाई एक एक चतुर्थांश से जन्म लेते हैं। श्रीबुल्के कहते हैं, किन्तु आगे चलकर तीनों भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न एक एक चतुर्थांश से समन्वित माने जाते जाते हैं (वा० रा० १।१८।१३,१४)। यह अन्तिम रूप सबसे प्राचीन है । चारों भाई विष्णु के चतुर्थांश माने जाते हैं। हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण आदि में विष्णु का चार रूपों में प्रकट होने का उल्लेख है । “कृत्वाऽऽत्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वरः ।” ( हरिवं० १।४१।१२२ ) “कौशल्यायै नरपतिः पायसार्धं ददौ तदा । अर्धार्थं ददौ चापि सुमित्रायै नराधिपः ॥ कैकेय्यै चावशिष्टार्धं ददौ पुत्रार्थकारणात् । प्रददौ चावशिष्टार्धं पायसस्यामृतोपमम् ।। अनुचिन्त्य सुमित्रायै पुनरेव महामतिः ।” (वा० रा० १।१६।२७,२८) राजा ने कौशल्या के लिए पायस का अर्धभाग प्रदान किया, अर्ध से अर्ध अर्थात् चतुर्थांश सुमित्रा को दिया गया एवं अवशिष्टार्थ अर्थात् चतुर्थांश का अर्ध यानी अष्टमांश कैकेयी को प्रदान किया । पुनश्च अन्य अष्टमांश सुमित्रा को दिया गया । कैकेयी की अपेक्षा ज्येष्ठ और कौशल्या की अपेक्षा कनिष्ठ सुमित्रा को पादोन अर्धांश प्रदान किया गया । संभोग-पक्षपात होने पर भी धर्मविभाग कर्म में पक्षपात नहीं होता । तथा च भरत और शत्रुघ्न दोनों पाद ( चतुर्थांश ) के अर्ध-अर्ध हैं। अन्य दृष्टि से राम और भरत प्रत्येक त्र्यंश हैं । लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो अष्टमांश हैं । कौशल्या को दिये गये अर्धांश का अर्धांश (चतुर्थांश) सुमित्रा को कौशल्या द्वारा दिलाया गया अर्थात् कौशल्या के लिए दत्त भाग से अवशिष्ट भाग में दो भाग करके एक भाग सुमित्रा को दिया गया था । अवशिष्ट अन्य भाग कैकेयी को दिया गया, परन्तु उसमें से अर्धभाग पुनः कैकेयी द्वारा सुमित्रा को प्रदान किया गया । कौशल्या के लिए दिये हुए अर्धांश से अर्धावशिष्ट—अवशिष्ट अर्ध-भाग कैकेयी को प्रदान किया गया । पुनश्च उसमें से अर्धांशभाग कैकेयी के द्वारा पुनः सुमित्रा को दिलाया गया । कालिदास भी यही कहते हैं— “स तेजो वैष्णवं पत्न्योर्विभेजे चरुसंज्ञितम् । द्यावापृथिव्योः प्रत्यग्रमहर्पतिरिवातपम् ॥ अर्चिता तस्य कौशल्या प्रिया केकयवंशजा । अतः सम्भावितां ताभ्यां सुमित्रामैच्छदीश्वरः ॥ ते बहुज्ञस्य चित्तज्ञे पत्न्यौ पत्युर्महीक्षितः । चरोरर्धार्धभागाभ्यां तामयोजयतामुभे ॥ सा हि प्रणयवत्यासीत् सपत्न्योरुभयोरपि ॥” ( रघुवं० १०।५४-५७ ) जैसे अहर्पति अर्थात् सूर्य अपने अभिनव आतप (घाम) को द्युलोक और पृथिवीलोक दोनों के लिए विभक्त कर देते हैं वैसे ही राजा ने उस चरुरूप वैष्णव तेज को ज्येष्ठ होने से धर्मतः आदरणीय कौशल्या और प्रिय होने से कैकेयी के लिए बराबर विभक्त कर दिया । राजा दशरथ ने यह भी चाहा कि दोनों रानियाँ सुमित्रा को सम्मानित करें । राजा के मन की बात को जाननेवाली कौशल्या और कैकेयी ने चतुर्थांश अर्थात् अपने अर्ध से अर्ध भाग सुमित्रा को प्रदान कर दिया, क्योंकि वह दोनों ही सपत्नियों से स्नेह करती थी । इस व्याख्या के अनुसार ही
४१२ रामायणमीमांसा त्रयोदश राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न की घनिष्ठता और एकवाक्यता सिद्ध होती है। अन्यथा इसका कोई बीज नहीं सिद्ध होगा । पद्मपुराण में पायस विभाग के अनुसार ही उनकी घनिष्ठता कही गयी है— “युगं बभूवतुस्तत्र सुस्निग्धौ रामलक्ष्मणौ । तथा भरतशत्रुघ्नौ पायसांशवशात् स्वतः ॥” मल्लिनाथ के अनुसार, रघुवंश में “चरयोरर्धार्धभागाभ्याम्” का अर्थ निम्नोक्त है । “चरयोरर्धार्धभागौ समभागौ तयोर्योऽर्धभागौ तौ च तौ भागौ च ।” अर्थात् अपने भाग के अर्ध का जो अर्ध भाग है वह भाग दोनों ने सुमित्रा को प्रदान किया । मल्लिनाथ के अनुसार यह विभाग वाल्मीकिरामायण के अनुसार नहीं है, किन्तु नृसिंहपुराण के अनुसार है— “ते पिण्डप्राशने काले सुमित्रायै महीपतेः । पिण्डाभ्यामल्पमल्पन्तु स्वभगिन्यै प्रयच्छतः ॥” अर्थात् पिण्डप्राशन-काल में कौशल्या और कैकेयी ने अपने अपने पिण्ड में से थोड़ा-थोड़ा भाग अपनी भगिनी सुमित्रा को प्रदान किया । परन्तु रामाभिरामी टीका के अनुसार रामायण का भी वही अर्थ है। उनके अनुसार कौशल्या के अर्धभाग से ही अर्धार्ध सुमित्रा को दिया गया है। इस पक्ष में छः छः आना भाग से राम और भरत तथा दो-दो आना भाग से लक्ष्मण और शत्रुघ्न होते हैं । वाल्मीकिरामायण के अन्य टीकाकारों के अनुसार राजा ने ज्येष्ठ पत्नी होने से कुछ अधिक पायस का आधा अंश कौशल्या को प्रदान किया । फिर यह विचार करके कि सुमित्रा का एक पुत्र राम का अनुयायी हो और एक भरत का अनुयायी हो, कौशल्या के भाग से ही अर्ध अर्थात् कुछ न्यून अर्ध अंश राजा ने कौशल्या से सुमित्रा को दिलाया । इसी तरह कौशल्या के भाग से कुछ न्यून अवशिष्ट अर्धभाग कैकेयी को प्रदान किया । पुनश्च कैकेयी के भाग से अर्धभाग सुमित्रा को कैकेयी के द्वारा दिलाया । इनके अनुसार पायस में आठ भाग किये गये। उनमें पाँच अंश कौशल्या को दिये गये, कौशल्या के भाग से डेढ़ अंश सुमित्रा को दिया गया । कौशल्या के भाग से अवशिष्ट तीन अंश कैकेयी को दिये गये । कैकेयी के भाग से डेढ़ अंश पुनः कैकेयी के द्वारा सुमित्रा को दिया गया। साढ़े तीन अंशों को एक करके कौशल्या ने खाया, उसी से राम का प्रादुर्भाव हुआ । डेढ़ अंश कैकेयी ने खाया उससे भरत का आविर्भाव हुआ । सुमित्रा ने पहले कौशल्या दत्त डेढ़ अंश खाया उससे लक्ष्मण का आविर्भाव हुआ । पश्चात् कैकेयी द्वारा दत्त डेढ़ अंश खाया उससे शत्रुघ्न का जन्म हुआ । रामाभिरामी टीका के दृष्टिकोण से भी ‘अर्धार्धभागाभ्याम्’ रघुवंश के इस पद्यांश का अर्थ है—स्वस्वलब्धांशसम्बन्ध्य- र्धार्धभागाभ्याम् । स्वस्वलब्ध अंशसम्बन्धी अर्ध के अर्धभाग को दोनों ने सुमित्रा के लिए प्रदान किया । इससे नृसिंह- पुराण की यह उक्ति भी अपने पिण्ड से अल्पम् अल्पम् ( थोड़ा-थोड़ा ) दोनों ने सुमित्रा को दिया, अपने समान भाग नहीं दिया, सिद्ध होती है । पद्मपुराण उत्तरखण्ड के अनुसार राजा ने अपनी ज्येष्ठा और कनिष्ठा पत्नियों को देखकर दिव्य पायस प्रदान किया । इसी बीच उनकी मध्यमा पत्नी सुमित्रा आ गयी । वह भी पुत्रकामा थी, उसको देखकर कौशल्या और कैकेयी ने अपना आधा-आधा भाग सुमित्रा को प्रदान किया--- “स राजा तत्र दृष्ट्वाऽथ पत्नीं ज्येष्ठां कनीयसीम् । विभज्य पायसं दिव्यं प्रददौ सुसमाहितः ॥ एतस्मिन्नन्तरे पत्नी सुमित्रा तस्य मध्यमा । तत्समीपं प्रयाता सा पुत्रकामा सुलोचना ॥ तां दृष्ट्वा तत्र कौशल्या कैकेयी च सुमध्यमा । अर्धमर्धं प्रददतुस्ते तस्यै पायसं स्वयम् ॥” (पद्मपु० उत्तरखं० २४२।५९-६१)
अध्याय बालकाण्ड ४१३ एतावता यह भी निश्चित होता है कि सुमित्रा मध्यमा और कैकेयी कनीयसी पत्नी थी। इसी अध्याय में तीनों को क्रमिक प्रथमा, द्वितीया और तृतीया भी कहा गया है— “कोशलस्य नृपस्याथ पुत्रो सर्वाङ्गशोभना । कौशल्यां नाम तां कन्यामुपयेमे स पार्थिवः ॥ मागधस्य नृपस्याथ तनयात्र शुचिस्मिता । सुमित्रा नाम नाम्ना च द्वितीया तस्य भामिनी । तृतीया केकयस्याथ नृपतेर्दुहिता तथा । भार्याभूत् पद्मपत्राक्षी कैकेयी नाम नामतः ॥” स्कन्दपुराण (नागरखण्ड अध्याय ९८) में यह भी कहा गया है—कौशल्या नाम की विख्याता ज्येष्ठ पत्नी में प्रथम पुत्र राम उत्पन्न हुए, कनिष्ठा कैकेयी में भरत नामक पुत्र उत्पन्न हुए एवं सुमित्रा नाम्नी मध्यमा पत्नी में शत्रुघ्न और लक्ष्मण उत्पन्न हुए— “कौशल्या नाम विख्याता तस्य भार्या सुशोभना । ज्येष्ठा तस्यां सुतो जज्ञे रामाख्यः प्रथमः सुतः ॥ [साऽ]न्या कैकेयी नाम तस्य भार्या कनिष्ठिका । भरतो नाम विख्यातस्तस्याः पुत्रो भवत्यसौ ॥ सुमित्राख्या तथा अन्या पत्नी या मध्यमा स्थिता । शत्रुघ्नलक्ष्मणौ पुत्रौ तस्यां जातौ महाबलौ ॥” (स्कन्दपु० नागरखं० ९८।१९–२२) कुछ लोगों के अनुसार भरत और शत्रुघ्न कैकेयी के यमल पुत्र थे, इसके अनुसार “निज जननी के एक कुमारा” की संगति लग जाती है। “प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् । कौशल्याऽजनयद्रामं दिव्यलक्षणसंयुतम् ॥” (वा० रा० १।१८।१०) उत्तम ग्रह, नक्षत्र, लग्न आदि का उदय होने पर सर्वलोकनमस्कृत दिव्यलक्षणसम्पन्न जगदीश्वर राम को कौशल्या ने जन्म दिया । रामाभिरामी के अनुसार सर्वलोकनमस्कृत से यह सूचित किया गया है कि प्रादुर्भाव-काल में कौशल्या को भगवान् के विराट् रूप का दर्शन हुआ और उस रूप के दर्शन से विस्मित होकर कौशल्या ने उन्हें नमस्कार किया और बालरूप धारण करने की प्रार्थना की एवं भगवान् बालरूप से प्रकट हुए । “विष्णोरधं महाभागं पुत्रमैक्ष्वाकुनन्दनम् । लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तोष्ठं दुन्दुभिस्वनम् ॥” (वा० रा० १।१८।११) रामाभिरामी के अनुसार इन श्लोकों का भी पूर्वोक्त श्लोकों के साथ समन्वय ही करना चाहिये तथा शङ्ख, चक्र और अनन्त (शेष) से विशिष्ट विष्णु का अर्ध अर्थात् किञ्चित् न्यून भाग शङ्ख, चक्र और शेष हैं । शङ्खादि- रहित विष्णु रामरूप में अवतीर्ण हुए । “भरतो नाम कैकेय्यां जज्ञे सत्यपराक्रमः । साक्षाद् विष्णोश्चतुर्भागः सर्वैः समुदितो गुणैः ॥” (वा० रा० १।१८।१३)
४१४ रामायणमीमांसा त्रयोदश साक्षात् विष्णु का चतुर्भाग ( चतुर्थांश से न्यून भाग ) सर्वगुणों से युक्त सत्यपराक्रम भरत के रूप में प्रकट हुआ, क्योंकि पूर्व श्लोकों की व्याख्या के अनुसार पायस के चतुर्थांश न्यून अर्धभाग से ही भरत का जन्म हुआ है। मध्यमपदलोपी समास न समझने के कारण ही श्रीबुल्के आदि ने चतुर्भागः का चतुर्थ भाग अर्थ समझ लिया है, जो कि पूर्व व्याख्या के सर्वथा विरुद्ध है। जब एक साधारण लेख के वाक्यों में भी पूर्वापर का विरोध परिहार करके समन्वय किया जाता है, तब महान् आर्ष रामायण में समन्वय न करके विरोध व्यक्त करना अज्ञता ही है। भरत को पाञ्चजन्य का अवतार समझना चाहिये । “अथ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्राऽजनयत्सुतौ । वीरौ सर्वास्त्रकुशलो विष्णोरर्धसमन्वितौ ।” ( वा० रा० १।१८।१४ ) विष्णु के अर्ध भाग से समन्वित सर्वास्त्रकुशल लक्ष्मण और शत्रुघ्न को सुमित्रा ने उत्पन्न किया। यहाँ अर्धशब्द भाग का बोधक है, अंश का नहीं; अतः पूर्वोक्त विभाग के अनुसार पायस के दो अष्टमांशों से लक्ष्मण और शत्रुघ्न की उत्पत्ति हुई। उपर्युक्त मतभेदों का समाधान कल्पभेद से कर लेना चाहिये । श्रीतुलसीदासजो ने भी अपनी एक स्वतन्त्र परम्परा का निर्देश रामचरितमानस में किया है। उन्होंने बताया है कि श्रीभगवान् शिव ने मानस का निर्माण करके अपने मन में रखा था। उसी को उन्होंने शिवा (पार्वती) से कहा था। शिव ने ही काकभुशुण्डि को भी दिया । भुशुण्डि से याज्ञवल्क्य ने पाया। उन्होंने भरद्वाज को सुनाया। उसे मेरे गुरु ने सूकरक्षेत्र में मुझे प्रदान किया था। जिन्होंने यह कथा नहीं सुनी हो, उन्हें आश्चर्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि हरि अनन्त हैं। उनके गुण, कर्म और नाम भी अनन्त हैं। उनके विविध अवतार होते हैं, अतः किसी कल्प के अनुसार इस कथा की भी संगति लगा लेनी चाहिये । “संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा ॥ सोइ शिव काकभुसुंडिहि दीन्हा । रामभगत अधिकारी चीन्हा ॥ तेहिसन जागबलिक मुनि पावा । तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा ॥” ( रा० मा० १।२९ (ग) । २, ३ ) “मैं पुनि निज गुरुसन सुनी कथा सो सूकरखेत ।” ( रा० मा० १।३० (क) ) “जेहि यह कथा सुनी नहि होई। जनि आचरजु करै सुनि सोई ॥ राम कथा कै मिति जग नाही । असि प्रतीति तिनके मन माही ॥ नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा ॥ कलप भेद हरि चरित सुहाये । भाँति अनेक मुनीसन गाये ॥” ( रा० मा० १।३२।२-४ ) रामकथा की इयत्ता नहीं है। राम के अवतार अनेक प्रकार के होते हैं। रामायण शतकोटिप्रविस्तर है । कल्पभेद से मुनीशों ने अनेक प्रकार के चरित्रों का वर्णन किया है। यद्यपि तुलसीदास अपने रामचरितमानस को नानापुराणनिगमागमसम्मत मानते हैं तथापि क्वचिदन्यतोऽपि से परम्पराप्राप्त अन्यान्य वस्तुओं का प्रवेश भी उन्हें मान्य प्रतीत होता है। इसी दृष्टि से रामचरितमानस का चरु-विभाग वाल्मीकि आदि से विलक्षण प्रतीत होता है। उसके अनुसार पायस का अर्ध भाग कौशल्या को प्रदान किया गया। उससे राम का आविर्भाव हुआ। आधे में दो भाग करके एक भाग कैकेयी को प्रदान किया गया, जिससे भरत का जन्म हुआ। अवशिष्ट अर्ध में दो विभाग कर एक-एक भाग कौशल्या और कैकेयी के हाथ से सुमित्रा को दिया गया। उनमें से कौशल्यादत्त भाग से रामानुज लक्ष्मण का प्रादुर्भाव एवं कैकेयीदत्त चरुभाग से भरतानुज शत्रुघ्न का आविर्भाव हुआ। टीकानिरपेक्ष मूल वाल्मीकि के ( १।१६।
अध्याय बालकाण्ड ४१५ २७) और (१८।११) के अनुसार भी चरु के अर्ध भाग से राम का आविर्भाव स्पष्टतया सिद्ध है। किन्तु अन्य भागों में वाल्मीकिरामायण रामचरितमानस में भिन्नता है। शङ्ख, चक्र और शेष सहित विष्णु की अपेक्षा केवल विष्णु अर्ध समझे जा सकते हैं, अर्ध भाग में शङ्ख, चक्र और शेष समझे जा सकते हैं। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध की दृष्टि से क्रमेण राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का आविर्भाव समझना चाहिये । माण्डूक्य उपनिषद् की दृष्टि से राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को क्रमशः तुरीय ब्रह्म, आनन्दमय, हिरण्यगर्भ और विराद् समझना चाहिये । नृसिंहतापनीय उपनिषद् की दृष्टि से ओत अर्थात् विराट् तुरीय को शत्रुघ्न, अनुज्ञाता हिरण्यगर्भ तुर्य को लक्ष्मण, अनुज्ञा आनन्दमय (अव्याकृत) तुरीय को भरत और अविकल्प तुर्य तुरीय को राम समझना चाहिये । “क्वेषानुज्ञेत्येष एवात्मेति होवाच । ते होचुर्नमस्तुभ्यं वयं त इति ह प्रजापतिर्देवाननुशशासेति । ओतमोतेन जानीयादनुज्ञातारमान्तरम् । अनुज्ञामद्वयं लब्ध्वा उपद्रष्टारमाव्रजेदित्युपद्रष्टारमाव्रजेदिति । ( नृसिंहोत्तरतापनीय खण्ड ९ ) “अथ तुरीयेण ओतश्च प्रोतश्च ह्यायमात्मा नृसिंहोऽस्मिन् सर्वमयं सर्वात्मार्यं हि सर्वं नैवौतोऽद्वयो ह्यायमात्मकल एवाविकल्पः । नहि वस्तु सदयं ह्योत इय सद्धनोऽयं चिद्धनः····। अनुज्ञाता ह्यायमात्मैष ह्यस्य सर्वस्य स्वात्मानमनुजानाति । ओमिति ह्यानुजानाति···················································· अनुज्ञैकरसो ह्यायमात्मा··········································· न ह्ययमोतो नानुज्ञाता············································· अनुज्ञैकरसो ह्ययमोङ्कारः···························ओङ्कारकश्चिदेवानुज्ञा । “अविकल्पो ह्ययमोङ्कारः····परमेश्वर एवैकमेव तद्भवत्यविकल्पोऽपि नात्र काचन भिदास्ति नैव तत्र काचन हि भिदास्त्यत्र भिदामिव मन्यमानः शतधा सहस्रधा भिन्नो मृत्योर्मृत्युमाप्नोति ।” ( नृ० उ० ता० खण्ड ८ ) “अनुज्ञाया निर्विकल्पस्य चान्तरत्वमवगन्तव्यम् ।” ( शां० भा० ) रामतापनीय की दृष्टि से अकाराक्षरसंभूत लक्ष्मण विश्व या विराट् हैं, उकाराक्षरसंभूत शत्रुघ्न तैजस या हिरण्यगर्भ हैं, मकाराक्षरसंभूत भरत अव्याकृत या प्राज्ञ हैं एवं अर्धमात्रासंभूत राम तुरीय ब्रह्म हैं— “अकाराक्षरसंभूतः सौमित्रिर्विश्वभावनः । उकाराक्षरसंभूतः शत्रुघ्नस्तैजसात्मकः ॥ प्राज्ञात्मकस्तु भरतो मकाराक्षरसंभवः । अर्धमात्रात्मको रामः ब्रह्मानन्दैकविग्रहः ॥ विश्वभावनो विरड्रूपः जाग्रदभिमानी संकर्षणः । तैजसात्मकः स्वप्नाभिमानी शत्रुघ्नः प्रद्युम्नः । प्राज्ञात्मकः सुषुप्ताभिमानी भरतः । “रामस्तुरीयावस्थं ब्रह्म वासुदेवात्परम् श्रीरामसान्निध्यवशाज्जगदानन्ददायिनी । उत्पत्ति- स्थितिसंहारकारिणी सर्वदेहिनाम् ।। सा सीता भवति ज्ञेया मूलप्रकृतिसंज्ञिता । ( बिन्द्वीशवाच्या कार्योन्मुखी नादांशवाच्या शक्तिशान्तारूपे अप्प्रवस्थे अस्या एव । ) प्रणवत्वात् प्रकृतिरिति वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥”
वस्तुतः रामतापनीय के सौमित्रि शब्द का शत्रुघ्न अर्थ करना चाहिये और शत्रुघ्न शब्द का यौगिक अर्थ शत्रुहन्ता लक्ष्मण करना अभीष्ट है। जिस प्रकार गीता में-- "भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥” (गी० ७।४) । इस श्लोक में मन का अर्थ अहङ्कार, बुद्धि का अर्थ महत्तत्त्व और अहङ्कार का अर्थ अव्यक्त तत्त्व करके अष्ट प्रकृतियों की गणना की जाती है। प्रकृत में भी वैसा ही समझना चाहिये। इस दृष्टि से पायस को निर्विशेष तथा सविशेष उभयविध सम्पूर्ण ब्रह्म समझना चाहिये। (एको विष्णोर्महद्भूतम् ) पायस का प्रथम अर्धभाग अर्धमात्रालक्ष्य निर्विशेष ब्रह्म का प्रतीक है। उसी से राम का प्रादुर्भाव है। द्वितीय अर्धभाग को स्थूल-सूक्ष्म कार्यब्रह्म और कारण- ब्रह्मरूप सविशेष ब्रह्म का प्रतीक समझना चाहिये। सविशेष के प्रथम दो विभाग हुए कारण और कार्य विभाग। कारण विभाग के प्रतीकरूप प्रथम भाग से भरत का आविर्भाव है और द्वितीय भाग के सूक्ष्म और स्थूल कार्य के भेद से पुनः दो विभाग हुए । सूक्ष्म कार्यब्रह्म का लक्ष्मण और स्थूल कार्यब्रह्म का शत्रुघ्न के रूप में आविर्भाव हुआ। कार्य में स्पष्टता होने के कारण लक्ष्मण और शत्रुघ्न का गौर रूप है। कारण एवं कारणातीत निर्विशेष ब्रह्म में अव्यक्तता के कारण नीलाम्बुजश्यामलता है। निराकार आकाश की श्यामलता के समान ही निराकार कारण और तुरीय ब्रह्म को श्यामल समझा जा सकता है। परन्तु एक दृष्टि से लक्ष्मण को ही शेष, अनन्त या अव्याकृत कहा गया है। अव्याकृतब्रह्म अक्षरब्रह्म को ही व्यापी वैकुण्ठ एवं भगवान् का आसन शेष (अनन्त) या सिंहासन माना जाता है। शेष शब्द अव्याकृत या कारणब्रह्म है, क्योंकि प्रपञ्च-प्रलय के बाद वही अवशिष्ट रहता है। "शिष्यते यः स शेषः" जो बाकी बचता है वही शेष है। "नष्टे लोके द्विपरार्द्धावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः ॥” (भा० पु० १०।३।२५) प्रलयकाल में सब लोकों के नष्ट होने पर सब भूत, भूतादि अहङ्कार में लीन हो जाते हैं। व्यक्त अहङ्कार, महान् आदि भी अव्यक्त में प्रलीन हो जाते हैं। तब केवल आप ही रह जाते हैं, अतः आपकी शेषसंज्ञा होती है। अकार-प्रश्लेष से अशेष संसार की संज्ञा (शान्त) आप में होती है। इस दृष्टि से शेष ही संकर्षण या कारणब्रह्म होते हैं और वे अनन्यभक्ति से सर्वशेषी भगवान् का अपने को शेष (अङ्ग) बना देते हैं। अपने आपको ही भगवान् की शय्या, सिंहासन, पादुका आदि बनाकर अपने आप को ही पहरेदार या अङ्गरक्षक बना देते हैं, इसलिए भी वे शेष हैं। जो अपने आपको मुख्य भगवान् का अङ्ग बना देता है वही अशेष अर्थात् सब कुछ होता है। इसी दृष्टि से वाल्मीकिरामायण में अवशिष्ट पायस के अर्धांश सविशेष ब्रह्म का अर्धांश कारण ब्रह्मांश सुमित्रा को दिया गया है और उससे लक्ष्मण का आविर्भाव हुआ। शेष अर्ध अर्थात् कार्यब्रह्म में दो विभाग किये गये एक सूक्ष्म कार्यब्रह्म और अन्य स्थूल कार्यब्रह्म दोनों ही कैकेयी को प्रदान किये गये। उनमें से एक भाग स्थूल कार्य ब्रह्मरूप पुनः सुमित्रा को दिया गया। उसीसे शत्रुघ्न की उत्पत्ति हुई। सूक्ष्म कार्यब्रह्म का कैकेयी से भरत के रूप में प्रादुर्भाव हुआ। उन दोनों भागों को शङ्ख और चक्र रूप भी कहा जा सकता है। श्रीराम के अनन्त यशःसौरभ तथा विजय के ज्ञापक पाञ्चजन्य शङ्खरूप भरत हैं। "रघुपतिकीरति विमल पतका। दण्ड समान भयो जस जाका ॥” ( रा० मा० १।१६।३ ) दैत्यादि शत्रुओं का सूदन करनेवाला चक्र ही श्रीरिपुदमन शत्रुघ्न के रूप में प्रकट हुआ। इस तरह दोनों ही पक्षों का कल्पभेद एवं अभिप्रायभेद से समन्वय है। नृसिंहपुराण, पद्मपुराण, रघुवंश आदि के अनुसार कारण
एवं कारणातीत अव्यक्त होने से पायस का जो प्रथमार्ध भाग है, वह कौशल्या को प्रदान किया गया। उसी में से कारणांश अर्ध या अल्पांश सुमित्रा को दिया गया जिससे लक्ष्मण की उत्पत्ति हुई। कारणातीत ब्रह्मांश से कौशल्या ने राम को जन्म दिया। सूक्ष्म और स्थूल उभय कार्यब्रह्मामय पायसार्द्ध कैकेयी को प्रदान किया गया। उसी में से कैकेयी ने अर्ध या अल्प स्थूल कार्यब्रह्मात्मक अंश सुमित्रा को प्रदान किया। उसीसे शत्रुघ्न की उत्पत्ति हुई। शेष सूक्ष्म कार्यब्रह्मात्मक भाग से कैकेयी में भरत का आविर्भाव हुआ। यहाँ भी सूक्ष्म व्यापक ब्रह्म की अपेक्षा स्थूल ब्रह्म व्याप्य एवं अल्प ही होता है। पृथिवी, जल, वायु आदि में पृथिव्यादि कार्यों की अपेक्षा जलादि कारणों में उत्तरोत्तर व्यापकता, सूक्ष्मता तथा स्वच्छता श्रुति, स्मृति एवं युक्तियों से भी सिद्ध ही है। इस तरह इन पक्षों में विरोध की कल्पना न कर समन्वय ही समझना चाहिये। साङ्गोपाङ्ग सविशेष अथवा निर्विशेष विष्णु ही चार रूपों में विभक्त होकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के रूप में प्रकट हुए, अतः हरिवंश आदि के श्लोकों की भी संगति लग जाती है। "कृत्वात्मानं महाबाहुश्चतुर्धा प्रभुरीश्वरः ।” इस वचन में यह नहीं कहा गया है कि चारों भाग बराबर ही थे। यदि वैसा कहा भी हो तो भी पूर्ण के सब अंश पूर्ण ही होते हैं, इस दृष्टि से साम्यकथन भी सङ्गत हो सकेगा। वासुदेव, संकर्षण आदि का राम आदि के रूप में प्रादुर्भाव हुआ है, यह पक्ष भी विष्णुधर्मोत्तर (अ० २१२) तथा नारदपुराण (उत्तरखण्ड अ० ७५) के अनुसार ठीक ही है । ये पुराण भी आस्तिकों की दृष्टि से परम प्रमाण हैं। इनमें बुद्धि, चित्त, अहङ्कार एवं अन्तर्यामी का ही क्रमेण राम आदि के रूप में प्रादुर्भाव समझना चाहिये । श्रीबुल्के का बाद की अधिकांश कथाओं में राम विष्णु के पूर्ण अवतार माने गये हैं, यह कहना असङ्गत है, क्योंकि वस्तुतः सभी कथाओं में राम का पूर्णावतार ही माना गया है। जहाँ कहीं "अंशेनावततार" कहा गया है। उसका समन्वय करके अंशेन भरतादिना अथवा ज्ञानैश्वर्यादिना अर्थात् भरतादि अंशों के साथ अथवा दिव्य ज्ञान, ऐश्वर्य आदि के साथ पूर्णतम भगवान् अवतीर्ण हुए यही अर्थ समझना चाहिये, क्योंकि वाल्मीकिरामायण में भगवान् की स्तुति करते हुए ब्रह्मादि देवता स्पष्ट कहते हैं कि आप आदिकर्ता स्वयंप्रभु नारायण हैं। “त्रयाणामपि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः ।” (वा० रा० ६।११७।७ ) “भवान्नारायणो देवः श्रीमांश्चक्रायुधः प्रभुः ।” (वा० रा० ६।११७।१३) इसी तरह "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्” ( भाग० पु० १।३।२८) में भी कृष्ण को स्वयं भगवान् माना गया है, अंश नहीं। तिब्बती रामायण में विष्णु एवं विष्णु के पुत्र का राम और लक्ष्मण के रूप में अवतार वर्णन है। किन्तु उसपर अनीश्वरवादी बौद्धों का प्रभाव होने से वह वाल्मीकिरामायण के तुल्य प्रमाण नहीं है। नृसिंहपुराण (अ० ४७), देवीपुराण (१।३०) आदि में तथा जावा के सेरतकाण्ड में लक्ष्मण को शेषावतार कहा गया है, यह ठीक है। नृसिंहपुराण को परवर्ती कहना अनभिज्ञता ही है। रघुवंश के टीकाकार मल्लिनाथ ने तो रघुवंश के चरुविभाग का आधार ही नृसिंहपुराण को माना है। इसी तरह "भरतशत्रुघ्नौ शङ्खचक्रे” अध्यात्मरामायण (१।४।१८) तथा "शङ्खचक्रे द्वे भरतं सानुजम्” ( ३।२।१६ ) । "शङ्खो बभूव भरतः श्रीविष्णोः सव्यसत्करे । वामे करे बभूवास्य शत्रुघ्नश्च सुदर्शनम् ।” (अ० रा० ९।६।१६ ) ५३
पद्मपुराण (उत्तरखण्ड १६९।९३-९५), रामरहस्य (अ० ३) आदि में भी इसी तरह का प्रतिपादन है। रामरहस्य आदि को अर्वाचीन कहना भी असङ्गत है। इसी तरह आनन्दरामायण (३।९।४७) में “बभूवस्तुश्चक्रदरो कैकेयीसूनुलंक्षणान्तकश्च।।” में भरत को चक्र और शत्रुघ्न को शङ्ख कहा गया है। उदारराघव (सर्ग २), तत्त्वसंग्रहरामायण (१।१४) तथा काश्मीरीरामायण (२।१३) में भी भरत और शत्रुघ्न को क्रमशः चक्र और शङ्ख का अवतार माना गया है। इस परिवर्तन को कल्पान्तरीय ही मानना उचित है। इसी तरह लिङ्गपुराण (२।५।१४७, १४८) तथा अद्भुतरामायण (४।६६, ६७) में भरत और शत्रुघ्न को विष्णु की दाईं और बाईं बाहुओं का अवतार माना गया है। इसका अभिप्राय यही है कि वे दोनों राम की दाईं और बाईं भुजाओं के तुल्य सहायक एवं प्रिय हैं। जैसा कि वाल्मीकिरामायण में लक्ष्मण के सम्बन्ध में कहा गया है कि वे राम के बहिर्श्वर प्राण ही थे—“नित्यं प्राणो बहिश्चरः ।'” पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ का यह कथन कि चक्र भरत हैं और शङ्ख लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न दोनों के रूप अवतीर्ण हुए हैं, प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि भारत की ही सुनी सुनायी बातों का पाश्चात्यों ने विकृतरूप में वर्णन किया है । रामकियेन (अ० २) के अनुसार भरत को चक्र और शत्रुघ्न को गदा मानना भी वैसा ही है । सारला- दास के उड़ियामहाभारत वनपर्व (पृ० २२८) में विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र तथा महादेव राम, शत्रुघ्न, भरत तथा लक्ष्मण के रूप में प्रकट हुए, इस कथन का आधार उपनिषद् ही हैं। रामतापनीय उपनिषद् आदि के अनुसार विराट् ब्रह्मा का शत्रुघ्न रूप स्वीकृत है। राम को शुद्ध ब्रह्म, विष्णु या इन्द्र को भरत और अव्याकृत महादेव को लक्ष्मण कहा जा सकता है। तारसार उपनिषद् के अनुसार शिव का हनुमान् के रूप में, विष्णु का सुग्रीव के रूप में तथा ब्रह्मा का जाम्बवान् के रूप में एवं नाद, बिन्दु, कला, कलातीत तथा परतत्त्व तत्त्वों का शत्रुघ्न, भरत, लक्ष्मण, सीता और राम के रूप में प्रादुर्भाव माना गया है । (देखिये उपनिषद्ब्रा० में) बुल्के का यह कहना अशुद्ध है कि अवतारवाद का विकास हुआ है । रामतापनीय उपनिषद्, जो सनातनी जगत् की दृष्टि में वेद है, उसमें राम को परब्रह्म का अवतार माना गया है, अतएव राम को अवतार मानना विकास नहीं है, किन्तु स्वाभाविक वस्तु का वर्णन है। बुल्के साहब के परम प्रमाण युद्धकाण्ड में भी राम को ऋत ब्रह्म स्वरूप ही माना गया है ! “अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव ।” (वा० रा० ६।११७।१४) “त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः । ........त्वमोङ्कारः परात्परः ॥” (६।११७।१८, १९) । पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ४६) में राम का शिव से यह कहना ठीक है कि हममें और तुममें अन्तर (भेद) समझनेवाले अज्ञ हैं, ऐसे लोगों को नरक की यातना भोगनी पड़ेगी । बुल्के ऐसी बातों से परस्पर शास्त्रवचनों का विरोध दिखाकर अवतारवाद को अर्वाचीन कल्पनामात्र कहना चाहते हैं। परन्तु वे समन्वय की पद्धति न जानने के कारण ही ऐसी भ्रान्तियों से ग्रस्त हुए हैं । “ममासि हृदये शर्व भवतो हृदयं त्वहम् । आवयोरन्तरं नास्ति मूढाः पश्यन्ति दुर्धियः ॥ ये भेदं विदधत्यद्धा आवयोरेकरूपयोः । कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते नराः कल्पसहस्रकम् ॥” (पद्मपु० पातालखं० ४६।२०, २१) यह ठीक ही है। कृत्तिवासरामायण के अनुसार दुर्गा का यह कहना भी ठीक ही है कि राम शिव के गुरु हैं, उनमें भेद नहीं है। रामचरितमानस में भी शिव एवं राम को अभिन्न कहा गया है । वहाँ तो शिवजी को
अध्याय बालकाण्ड ४१९ राम का सेवक, स्वामी और सखा भी कहा गया है— “सेवक स्वामि सखा सियपिय के ।” ( रा० मा०, १।१४।२ ) जो शिवभक्त नहीं है वह राम को कभी भी नहीं सुहाता है— “सिवपद कमल जिन्हहि रति नाहीं । रामहिं ते सपनेहु न सोहाहीं ॥” ( रा० मा० १।१०३।३ ) । इसी तरह आनन्दरामायण ( मनोहरखण्ड ७।१२ ), रामलिङ्गामृत ( सर्ग १० ) तथा धर्मखण्ड ( अध्याय २९ ) में राम और शिव का अभेद कहना भी उचित ही है । “त्वं विष्णुर्जानकी लक्ष्मीः शिवस्त्वं जानकी शिवा । ब्रह्मा त्वं जानकी वाणी सूर्यस्त्वं जानकी प्रभा ॥” ( अ० रा० २।१।१३ ) हे राम आप विष्णु हैं एवं जानकी लक्ष्मी हैं। इसी तरह आप दोनों ही शिव एवं पार्वती, ब्रह्मा और वाणी, सूर्य तथा प्रभा हैं। इतना ही क्यों अध्यात्मरामायण में यह भी कहा गया है कि लोक में जितने पुरुष हैं सब आप हैं और सभी स्त्रियां जानकी हैं । आनन्दरामायण के अनुसार—“राम एवात्र कृष्णः स कृष्ण एवात्र राघवः । उभयोर्नान्तरम्” ( १।११४ ) । राम ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राम हैं। दोनों में अन्तर नहीं है । वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में भी राम को कृष्ण कहा गया है “कृष्णश्चैव बृहद्बलः ।” ( वा० रा० ६।११७।१५ ) । कृष्णोपनिषद् के अनुसार राम ही कृष्ण हुए हैं । तत्त्वसंग्रहरामायण आदि के अनुसार शिव, ब्रह्मा और हरि त्रिमूति सच्चिदानन्द ब्रह्म के अवतार राम हैं । बलरामदासरामायण के अनुसार विष्णु ही राम आदि चारों भाइयों के रूप में अवतरित होते हैं और लक्ष्मी ही सीता के रूप में प्रकट होती हैं । आरण्यकाण्ड के मङ्गलाचरण और दण्डकारण्य के वृत्तान्त में उड़िया के लोकप्रिय देवताओं को भी राम से अभिन्न कहा गया है । तदनुसार राम, सीता और लक्ष्मण को क्रमशः जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलभद्र से अभिन्न माना जाता है। इसमें भी कोई असङ्गति नहीं है । बौद्धों के ग्रन्थों में राम को बोधिसत्त्व माना गया है । कहीं-कहीं बुद्ध को भी राम का अवतार माना गया है । “यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥” ( गी० १०।४१ ) के अनुसार सभी उत्कृष्ट विभूतियाँ भगवान् के ही अंश हैं । इस दृष्टि से बुद्ध भी भगवान् के ही तेजोंश से उद्भूत हों यह स्वाभाविक है । जैन कथाओं में राम आदि के पूर्वजन्म की कथा का विशेष वर्णन किया गया है। उसमें उनका उद्देश्य राम का अनीश्वरत्व वर्णन ही है, क्योंकि जैन अनीश्वरवादी होते हैं। राम का ईश्वरत्व तथा वैदिक मार्गरक्षकत्व आदि उनके धर्म के विरुद्ध हैं। इसी लिए जैनों ने वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों की प्रसिद्ध राम-कथाओं को विकृत कर अपने ग्रन्थ निर्मित किये। श्रीबुल्के ने भी यह स्वीकार- किया है कि जैन राम-कथा वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप है ।
४२० रामायणमीमांसा त्रयोदश सीता के लक्ष्मीत्व तथा राम के विष्णुत्व का विकास मानना भी बुल्के की भूल है। अन्यत्र सीता के लक्ष्मीत्व के उल्लेख को वाल्मीकिरामायण में अर्वाचीन कहना भी निराधार है, यह पीछे विस्तृतरूप से कहा जा चुका है। राम की कृष्ण से अभिन्नता के प्रतिपादक वाल्मीकिरामायण "कृष्णश्चैव बृहद्बलः" (६।११७।१५) इस अध्याय को प्रक्षेप कहना भी निराधार ही है। यह कहना भी निरर्थक ही है कि वायुपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, विष्णुपुराण जैसे प्राचीन महापुराणों तथा रघुवंश में सीता तथा लक्ष्मी का अभेदनिर्देश नहीं है। यद्यपि इन रचनाओं में राम को विष्णु कहा गया है, क्योंकि उक्त महापुराणों में राम को विष्णु कहा गया है, जब उसे ही बुल्के स्वीकार नहीं करते हैं तो सीता का लक्ष्मीत्व उन पुराणों में वर्णित होता तो भी उन्हें मानना नहीं था। वस्तुतः सभी पुराणों का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। श्रीभागवतपुराण एवं रामतापनीय उपनिषद् में सीता की लक्ष्मी या प्रकृतिरूपता उक्त है तथा सीतोपनिषद् में भी वह प्रतिपादित है। इससे समझ लेना चाहिये कि पुराणों, महापुराणों को औपनिषद मत मानने में कोई आपत्ति है ही नहीं। अध्यात्मरामायण आदि इन्हीं वचनों के आधार पर सीता को लक्ष्मी, योगमाया तथा मूलप्रकृति आदि मानते हैं। "पार्वत्यंशसमुद्भूता। जनकेन पुरा गौरी तपसा तोषिता यतः ॥" (सौ० पु० ३०।४१) तथा भागवत में भी सीता एवं लक्ष्मी की अभिन्नता प्रतिपादित है— "जित्वाऽनुरूपगुणशीलवयोऽङ्गरूपां सीताभिधां श्रियमुरस्यभिलब्धमानाम्।" (भा० पु० ९।१०।७) श्रीबुल्के का यह कथन भी निःसार है कि महाभागवतपुराण में सीता को लक्ष्मी कहा गया है, परन्तु लक्ष्मी की देवी के अंश से उत्पत्ति मानी गयी है (महा० भा० पु० अ० ३६), क्योंकि अंश-अंशिभाव अव्यवस्थित होता है, अतएव अनेक स्थानों में पार्वती आदि को भी सीता का अंश ही कहा गया है। महारामायण में कहा गया है— "श्रीर्भूलीला तथोत्कृष्टा कृपा भोगोन्नती तथा । शान्तापू्र्वी तथा।सत्या : कथिता चाप्यनुग्रहा ॥ ईशाना चैव कीर्तिश्च विद्येला कान्तिलम्बिनी । चन्द्रिकाऽपि तथा क्रूरा कान्ता वै भीषणी तथा ॥ क्षान्ता च नन्दिनी शोका शान्ता च विमला तथा । शुभदा शोभना पुण्या कला चाप्यथ मालिनी ॥ महोदया ह्लादिनी च शक्तिरेकादशत्रिका । पश्यन्ति भृकुटि तस्या जानक्या नित्यमेव च ॥ जानक्यंशादिसंभूताऽनेकब्रह्माण्डकारणम् । सा मूलप्रकृतिर्जेया महामाया स्वरूपिणी ॥" (सर्ग ५) । इत्यादि महारामायण के वचनों में सीता से ही श्री, भू, लीला ईशाना आदि अनेक शक्तियाँ आविर्भूत होती हैं। सीतोपनिषद से भी उक्त सिद्धान्त का समर्थन होता है। इतना ही नहीं ईशाना, त्रिपुरा आदि तत्त्व का विश्लेषण करने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि भगवती केवल शक्ति या मूलप्रकृतिरूप ही नहीं हैं, किन्तु वह सच्चिदानन्दरूपिणी हैं। नवार्ण आदि मन्त्रों में सच्चिदानन्दरूपिणी भगवती की आराधना निर्दिष्ट है। इसी दृष्टि से उसे 'चितिरूपेण संस्थिता' माना गया है। शरीरत्रयरूप त्रिपुर की साक्षिणी ही त्रिपुरसुन्दरी है। उसी का विस्तृत विवेचन आद्य शङ्कराचार्य ने अपने सौन्दर्यलहरी आदि ग्रन्थों में किया है। इस दृष्टि से सीता सच्चिद्ब्रह्मरूपिणी ही है। एक ही ब्रह्मज्योति दो रूपों में प्रकट है—
अध्याये बालकाण्ड ४२१ ‘एकं ज्योतिरभूद् द्वेधा राधामाधवरूपकम्।’ वेद भी ‘त्वं कुमारः’ के समान ही ‘उत वा कुमारी’ कहकर ब्रह्म को कुमार और कुमारी दोनों ही कहता है। उससे भी बढ़कर यह कहना चाहिये कि जैसे गङ्गा का ही अंश तरङ्ग है उसी तरह ब्रह्म का ही अंश सीता है। इतना ही नहीं, गङ्गाजल में तरङ्ग से भी अन्तरङ्ग शीतलता, मधुरता और पवित्रता होती है, अमृतसिन्धु में मधुरिमा होती है उसी तरह आनन्दसिन्धु सुखराशि राम में माधुर्यसार- सर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी सीता है। अभेद होने में भी विशेष विवक्षा की जाय तो सौन्दर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता है तथा प्रेमसार-सर्वस्व के अधिष्ठाता देवता राम हैं। इस तरह राम के विष्णुत्व या परब्रह्मत्व से सीता की तद्रूपता सुतरां सिद्ध है। संमोहनतन्त्र का निम्नोक्त वचन प्रकृत प्रसङ्ग में भी लागू है— “गौरतेजः परित्यज्य इय!मतेजः समर्चयेत् । जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत्पातकी शिवे ॥” जो गौर तेज के बिना केवल श्याम तेज को
४२२ रामायणमीमांसा त्रयोदश होइ अनीति जाइ नहि बरनी। सीदहिं विप्र धेनु सुर धरनी ॥ तब तब हरि धरि विविध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जनपीरा ॥' (रा० मा० १।१२०।३,४) "असुर मारि थापहिं सुरन्ह पालहिं निज श्रुतिसेतु" ॥ (रा० मा० १.१२१) यह भी कहना असङ्गत है कि "रामभक्ति पल्लवित होने के बाद इसका भी प्रायः उल्लेख मिलता है कि भक्तों को भवसागर पार करने के लिए और अपना सगुण रूप दिखलाने के लिए ही निर्गुण ब्रह्म राम के रूप में प्रकट होते हैं," क्योंकि सिद्धान्तानुसार तो कलियुग में रामभक्ति का पल्लवन नहीं, किन्तु ह्रास ही हुआ है। अतः प्राचीन युग से ही यह निश्चित सिद्धान्त है कि भक्तानुग्रहार्थ निर्गुण ब्रह्म सगुण ब्रह्म के रूप में प्रकट होते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रों के भक्तियोग का विधान कर उनको परमहंस से श्रीपरमहंस बनाने के उद्देश्य से निर्गुण ब्रह्म का सगुण ब्रह्म होना कहा गया है— 'तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥' (भा० पु० १।८।२०) नैष्कर्म्य ज्ञान भी भक्ति के बिना शोभित नहीं होता फिर भक्तिविहीन कर्म कैसे शोभित हो सकेगा— “नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ॥” (भा० पु० १।५।१२) । भगवद्भक्ति से ही परमहंस होता है। आत्माऽनात्मविवेकी हंस सांख्यनिष्ठ हैं, अनात्मबाधपूर्वक अनन्तब्रह्मा- त्मनिष्ठ परमहंस होता है और ब्रह्मात्मनिष्ठ होकर भक्तिनिष्ठ होने से श्रीपरमहंस की प्राप्ति होती है। फिर भी जैसे अग्निहोत्रादि के लिए अरणिमन्थनपूर्वक अग्नि प्रकट होने पर उसी से भोजनादि निर्माण कार्य भी सम्पन्न होता है वैसे ही भक्तिविधानार्थ उत्पन्न भगवान् से भी धर्मग्लानि तथा अधर्म की निवृत्ति, धर्म-संस्थापन तथा साधुपरित्राण, दुष्कृतिविनाश आदि कार्य भी सम्पन्न होते हैं। अथवा यों भी समझा जा सकता है कि यद्यपि सत्यसङ्कल्प भगवान् अपने सङ्कल्प से ही सब कार्य कर सकते हैं तथापि पूर्वोक्त भक्तियोग विधानरूप कार्य तो भजनीय स्वरूप के उपस्थान के बिना हो ही नहीं सकता था, अतः ध्येय या भजनीय रूप का आविर्भाव अनिवार्य ही है। इसी प्रकार श्रीगोपाङ्गना जैसे साधुओं के परित्राणार्थ उनका आविर्भाव होता है। गोविन्ददर्शन के बिना अन्य मार्ग से उनका रक्षण संभव ही नहीं था, इसलिए भगवान् का अवतार अनिवार्य था। उन्हीं दुष्कृतियों के लिए जो भगवान् की युद्धक्रीडिषा की पूर्ति के लिए ही स्वेच्छापूर्वक दुष्कृती हो स्वयं प्रतिभट होकर उपस्थित हुए थे, उनका विनाश अन्य लोगों से अभीष्ट भी नहीं था और संभव भी नहीं था, इस प्रकार गीता का पद्य भी विशेषार्थ में पर्यवसित होता है। जय और विजय के लिए भगवान् का आविर्भाव हुआ है, यह भी श्रीमद्भागवत तथा विष्णुपुराण के अनुसार ही है। इसी का उल्लेख रामचरितमानस में किया गया है— "मुकुत न भये हुते भगवाना । तीनि जन्म द्विजवचन प्रमाना ॥" (रा० मा० १।१२२।१) एक साधारण व्यक्ति भी जानता है कि एक ग्रन्थ में या एक लेखक के अनेक ग्रंथों में अथवा एक सिद्धान्त- निष्क विभिन्न व्यक्तियों के भी ग्रन्थों में परस्पर विरोध अभीष्ट नहीं होता। किसी संविधान की विभिन्न धाराएँ यदि विरुद्धसी प्रतीत होती हैं तो उनका भी समन्वय करके पूर्वापरविरोध का परिहार किया जाता है। इसपर विचार करने के लिए ही सर्वोच्च न्यायालयों, न्यायाधीशों तथा न्यायवादियों की अपेक्षा होती है। अतः वेदों तथा वैदिक पुराणों एवं महाभारत, वाल्मीकिरामायण आदि में विरोधाभास मिटा कर समन्वय किया जाता है। परन्तु बुल्के उक्त ग्रन्थों में विरोध ही विरोध खोजने में व्यस्त दिखायी देते हैं। वे कहते हैं, "कश्यप और अदिति का सम्बन्ध पहले-पहल
अध्याय बालकाण्ड ४२३ वामनावतार से जोड़ा जाता था। बाद में कृष्ण और राम की कथाओं में भी उनका उल्लेख मिलता है।" वे इसे विकास समझते हैं, अर्थात् सत्य न मानकर उन्हें पीछे की कल्पना या प्रक्षिप्त मानते हैं। वे समझते हैं कि वामनावतार की प्राचीनतम कथाओं में कश्यप और अदिति की चर्चा नहीं है। किन्तु महाभारत (आदि पर्व १।२७) में कश्यप तथा विनता की तपस्या का वर्णन किया गया है, जिसके फलस्वरूप उनको अरुण तथा गरुड़ दो पुत्र प्राप्त हुए। महाभारत के अन्य स्थलों में अदिति की आराधना ( ३।१३५।३) तथा तपस्या (१३।८३।२६,२७) का उल्लेख मिलता है, जिससे वह विष्णु की माँ बन सकीं। हरिवंश (अध्याय ३।६७।६९) तथा मत्स्यपुराण (अध्याय २४३।९) में देवता, कश्यप तथा अदिति सब मिलकर १००० वर्ष तक तपस्या करते हैं और अन्त में विष्णु से यह वरदान प्राप्त करते हैं कि विष्णु वामन के रूप में अदिति से जन्म लेकर बलि को परास्त करें। वाल्मीकिरामायण (दाक्षिणात्य पाठ १।२९।१०-१७) तथा वामनपुराण (अ० २४-२८) में कश्यप तथा अदिति की तपस्या एवं वरप्राप्ति का वर्णन है। यदि वेद या ब्राह्मणों में वामन का नाम या कर्ममात्र श्रुत हैं, तो भी उनके कोई माता-पिता होंगे ही; फिर जब वेदों के व्याख्यानभूत आर्ष पुराण वामन के माता और पिता का वर्णन करते हैं तो उन्हें ही वेदोक्त वामन की माता क्यों न माना जाय । विशेषतः पूर्वोक्त १४१ अनुच्छेद का उत्तर पीछे दिया जा चुका है। कश्यप और अदिति वेदों के अनुसार भी विशिष्ट दम्पति हैं। पुराणों के अनुसार देवता, दैत्य आदि सब उन्हीं की सन्तान हैं; अतः अरुण और गरुड़ की प्राप्ति के लिए भी उनकी तपस्या सङ्गत है। दिति और अदिति के समान ही कद्रू और विनता भी उन्हीं की पत्नियां थीं। उन कश्यप और अदिति का विष्णु या वामन की प्राप्ति के लिए भी तपस्या करना सङ्गत ही है। अतः इन अंशो को विकास या प्रक्षिप्त कहना साहस ही है। महाभारत के शान्तिपर्व में विष्णु के विषय में "अदित्यां सप्तधा विष्णुः पुराणे गर्भतां गतः ।" या "अदित्याः सप्तरात्रं तु पुराणे गर्भतां गतः ।" (१२।४३।६) का उल्लेख तभी महत्त्वपूर्ण हो सकता है। यदि बुल्के उसका प्रामाण्य मानते हों। वे तो केवल विरोध दिखाने के लिए ही विभिन्न ग्रन्थों के वचनों का उल्लेख करते हैं। श्लोक में सप्तधा पाठ अधिक संगत है। क्यों ? पुराणों के साथ उसकी सङ्गति बैठ जाती है। अदिति के गर्भ से अनेकों बार विष्णु का वामन, राम, कृष्ण आदि रूप में आविर्भाव हुआ है। मत्स्यपुराण (४७।९), ब्रह्माण्डपुराण ( २।७१।२०० और २३८), ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड अ० ७) आदि में कश्यप और अदिति को वसुदेव तथा देवकी से अभिन्न माना गया है। भागवत के अनुसार सुतपा तथा पृश्नि ने स्वायम्भुव मन्वन्तर में १२००० वर्ष तक तपस्या कर भगवान् से वर प्राप्त किया था कि वह तीन बार उनके पुत्र बने । फलतः विष्णु पृश्निगर्भ के रूप से सुतपा के पुत्र हुए, उपेन्द्र या वामनरूप से कश्यप- पुत्र हुए तथा कृष्णरूप से वसुदेव के पुत्र हुए (भा० पु० १०।३।३२-४५)। अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस, काश्मीरीरामायण आदि में कश्यप और अदिति का दशरथ और कौशल्या के रूप में भी आविर्भाव मान्य है। आदि- पुराण में वर्णित एक स्वप्न के अनुसार नन्द पूर्वजन्म में दशरथ थे ( अ० १६) । कृत्तिवासरामायण के अनुसार विष्णु कश्यप और अदिति की ओर निर्देश करते हुए देवताओं से कहते हैं कि दशरथ तथा कौशल्या ने मेरी सेवा की है और मैं उनको वर दे चुका हूँ कि मैं तुम्हारे घर में जन्म लूँगा (बालकाण्ड अ० ३९)। ब्रह्मा के पुत्र मनु की तपस्या का प्रथम उल्लेख (श० ब्रा० १।८।१।७) में है। प्रजा की कामना से प्रेरित होकर वह आराधना तथा तपस्या में प्रवृत्त हुए, "प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत" (प्र० उ० १।४) तथा विष्णुपुराण (१ अ० ७) में स्वायम्भुव की सृष्टि, उसकी तपश्चर्या, शतरूपा की प्राप्ति तथा इन दोनों की सन्तति का वर्णन है । भागवत में स्वायम्भुव के विरक्त होने, राज्य छोड़ने और पत्नी के साथ वन में तपस्या करने की कथा वर्णित है ( भा० पु० ८।१) । देवीभागवत के अनुसार स्वायम्भुव मनु ने १०० वर्ष तक तपस्या तथा देवी की
४२४ रामायणमीमांसा त्रयोदश आराधना की और अन्त में उनसे यह वर माँगा “सर्गेकार्ये विघ्ना नश्यन्तु मे" मेरे सृष्टि के कार्य में सब विघ्न नष्ट हों । देवी ने उन्हें अकण्टक राज्य तथा पुत्रों की प्राप्ति का वर प्रदान किया था- “राज्यं निष्कण्टकं तेऽस्तु पुत्रा वंशकरा अपि ।” ( दे० भा० १०।२।३ ) । बुल्के कहते हैं, “परन्तु उक्त कथाओं में किसी अवतार का उल्लेख नहीं है । सम्भवतः वैवस्वत मनु की कथा के प्रभाव के कारण अर्वाचीन रचनाओं में स्वायम्भुव मनु की तपस्या तथा अवतार का सम्बन्ध जोड़ा गया है ।” बस यही पाश्चात्यों की दुर्भावना का नमूना है । किसी अंग्रेज सज्जन ने सिक्ख धर्म स्वीकार कर लिया । केश, कङ्घी, कच्छ आदि पञ्च ककार धारण कर ग्रन्थ साहब का अध्ययन किया तथा उसका एक उत्तम संस्करण निकाल कर उसपर टिप्पणी करते हुए लिखा कि "गुरुओं ने कहीं ग्रन्थसाहब में अपने को हिन्दू नहीं लिखा और कहीं गौमांस का निषेध नहीं किया ।” यही जहर का बीज बोकर वे सज्जन अपने देश चले गये और जो थे वही पुनः हो गये । उसी का दुष्परिणाम है कि आज सिक्ख अपने को हिन्दू कहने में लज्जित होता है, परन्तु वस्तुस्थिति ठीक इसके विपरीत थी । दशम गुरु ने स्पष्ट शब्दों में कहा है- "जगे धर्म हिन्दू सभी भण्ड भागै ।” इसी तरह जिन ग्रन्थों में स्पष्टरूप से स्वायम्भुव मनु और शतरूपा का तप वर्णित है उन्हें वे अर्वाचीन बना कर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि “प्राचीन शतपथ- ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में स्वायम्भुव के तप आदि का वर्णन तो है, परन्तु उनसे किसी अवतार विशेष का सम्बन्ध नहीं है; किन्तु वैवस्वत मनु की तपस्या के प्रभाव से हुए मत्स्यावतार का वर्णन देखकर अर्वाचीन लोगों ने स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की तपस्या और विष्णु के अवतार की कल्पना कर ली है; अवतारवाद केवल कल्पना है, बाद का है; अतएव मूल वाल्मीकिरामायण में वह नहीं था । प्रचलित वाल्मीकिरामायण में अवतारवाद की सब बातें प्रक्षिप्त हैं ।” बुल्के साहब की यह कल्पना निराधार, निष्प्रमाण एवं अशुद्ध है, क्योंकि पद्मपुराण के उत्तरखण्ड के अनुसार स्वायम्भुव मनु ने १००० वर्ष तक तपस्या कर विष्णु से यह वर प्राप्त किया था कि विष्णु तीन जन्मों में उनके पुत्र बनें । तदनुसार स्वायम्भुव मनु और शतरूपा क्रमशः दशरथ-कौशल्या, वसुदेव-देवकी तथा कलियुग में शम्भलग्रामवासी ब्राह्मण विष्णुयश या हरिगुप्त तथा उसकी पत्नी देवप्रभा के रूप में प्रकट होते हैं पद्मपुराण ( उत्तरखं० अ० २६९ ), रामरहस्य ( सर्ग १ ) तथा तत्त्वसंग्रहरामायण ( १।१३ ) । रामरहस्य में हरिगुप्त के स्थान में हरिग्रत नाम का उल्लेख है । रामचरितमानस ( १।४१ ) तथा पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३ में मनु-शतरूपा तथा दशरथ-कौशल्या की अभिन्नता का उल्लेख है । पद्मपुराण व्यावनिर्मित है, अतः व्यावनिर्मित अन्य पुराणों के साथ उसका समन्वय अनिवार्य है । अतएव कल्पना, प्रक्षेप या आधुनिक कल्पना कहना दुरभिसन्धिमात्र है । स्कन्दपुराण ( वैष्णवखण्ड अध्याय २४ ), पद्मपुराण ( उत्तरखं० अ० १०९ ) तथा आनन्दरामायण ( १।४।११७-१७० ) के अनुसार विष्णुभक्त धर्मदत्त और कलहा की कथा का समन्वय भी करना उचित है । मनु-शतरूपा बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार हिरण्यगर्भ एवं महाविराट् प्रजापति से अभिन्न हैं । सृष्टि-क्रम में प्रजापति इच्छा एवं आलोचन रूप तप से स्वयं ही पति और पत्नी दो रूपों में हो गये थे । जैसे एक चणक या मुद्ग ( चना या मूंग ) आदि के दो दल हो जाते हैं वैसे ही प्रजापति ही मनु और शतरूपा हो गये । शतरूपा का अर्थ है अनन्तरूपा । प्रजापति मनु से लज्जित होकर वह गौ, बडवा, अजा आदि अनेक रूप धारण करती गयी । तदनुसार ही मनु भी वृषभ, अश्व, अज आदि रूप धारण करते गये । इसी आधार पर संसार में अपरगणित प्रकार के प्राणी उत्पन्न हुए हैं । वे मनु-शतरूपा एक प्रकार से सम्पूर्ण प्राणियों के ही माता-पिता हैं। उनकी दीर्घकाल की आयु है। उसमें अनेक बार तपस्याएँ तथा विविध प्रकार के कार्य हुए हैं। मन्त्रों, ब्राह्मणों तथा पुराणों में भी सबका उल्लेख सम्भव नहीं है, फिर भी उनकी महत्त्वपूर्ण तपस्याओं एवं कार्यों का उल्लेख हुआ है । अतः पद्मपुराण के अनुसार उनकी तपस्या और उनका दशरथ और कौशल्या के रूप में परब्रह्म राम को पुत्ररूप में प्राप्त करना आदि सर्वथा सङ्गत है । रामचरितमानस में मनु-शतरूपा का पूरा परिचय दिया गया है-
अध्याय बालकाण्ड ४३५ "स्वायम्भू मनु अरु सतरूपा । जिन्हते भइ नर सृष्टि अनूपा ॥ दम्पति धरम आचरन नीका । अजहुं गाव श्रुति जिन्हके लीका ॥ नृप उत्तानपाद सुत तासू । ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू ॥ लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही । बेद पुराण प्रसंसहिं जाही ॥ देवहूति पुनि तासु कुमारी । जो मुनि कर्दम के प्रिय नारी ॥ आदि देव प्रभु दीन दयाला । जठर घरेउ जेहिं कपिल कृपाला ॥ सांख्य शास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना । तत्त्वबिचार निपुन भगवाना ॥ ( रा० मा० १।१४१।१-४) इन मनु का जीवनवृत्त श्रीभागवत में भी इसी प्रकार वर्णित है— "ब्रह्मावर्तं योऽधिवसन् शास्ति सप्तार्णवां महीम् ।” ( भा० पु० ३।२१।२५ ) जो ब्रह्मावर्त में निवास करते हुए सप्तार्णवा मेदिनी का शासन करते थे। "मनुर्वे यत्किञ्चावदत्तद् भेषजं भेषजतायै" ( ताण्ड्यम० ब्रा० १३।१६।७ ), "यद्वै किञ्च मनुरवदत् तद् भेषजम् ।” ( तै० सं० २।२।१०।२ ) मनु ने जो भी धर्म मनुस्मृति में कहा है वह भेषजवत् परमकल्याणकारी है। भागवतपुराण के अनुसार इन्हीं के वंश में भगवान् राम का अवतार हुआ है एवं इन्हीं की पुत्री में कपिल का अवतार हुआ था, अतः पद्मपुराण आदि पुराणों के अनुसार भगवान् राम को पुत्ररूप में प्राप्त करने के लिए मनु की तपस्या का वर्णन अत्यन्त सङ्गत है । अनु० ३७० वें में शाप पर विचार किया गया है। श्रीबुल्के कहते हैं, “भृगु-शाप की कथा के प्राचीनतम रूप में किसी अवतार विशेष का उल्लेख नहीं किया गया है;" परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि मत्स्यपुराण भी प्राचीनतम ही है। उसमें भृगुपत्नी का वध करने के कारण भृगु ने विष्णु को सात बार मनुष्यों में अवतार लेने का शाप दिया है— "तस्मात् त्वं सप्त कृत्वेह मानुषेषूपपत्स्यसे ।” (म० पु० ४७।१०६) । लिङ्गपुराण के अनुसार भी भृगुशाप से विष्णु का दस बार अवतार लेना सिद्ध होता है— "भृगोरपि च शापेन विष्णुः परमवीर्यवान् । प्रादुर्भावान् दश प्राप्तो दुःखितश्च सदा कृतः ।। (लि० पु० २९।२६ ) वायुपुराण ( अ० ९७ ), ब्रह्माण्डपुराण ( २ । अ० ७२ ) एवं देवीभागवत ( ४।अ० १२) में भी उक्त कथा का समर्थन मिलता ही है । वाल्मीकिरामायण ( ७।५१।१३-१५ ) के अनुसार तथा वह्निपुराण ( ५।१७ ) के अनुसार भी भृगुशाप के कारण राम को पत्नी-वियोग का कष्ट होना प्रमाणित है । योगवासिष्ठ ( वै० प्र० १।६१ ) । योगवासिष्ठ में दो अन्य कथाओं का भी उल्लेख है : ब्रह्मलोक में विष्णु के गमन पर सबने स्वागत किया, किन्तु सनत्कुमार ने उनका अभ्युत्थान नहीं किया, इस कारण विष्णु ने उन्हें कामातुर होने का शाप दिया । उसके प्रत्युत्तर में सनत्कुमार ने भी विष्णु को अशान्त बन जाने का शाप दिया ( यो० वा० १।१।५९,६० ) । वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में राम का वचन है— “आत्मानं मानुषं मन्ये जातं दशरथात्मजम् ।” ( ६।११७।११ ) अर्थात् मैं अपने को दशरथ-पुत्र तथा मनुष्य समझता हूँ । यही अशान्त होने का प्रमाण है। योगवासिष्ठ ( १।१।६३,६४ ) के अनुसार विष्णु ने नृसिंहकूप से देवशर्मा की पत्नी को डराया था, जिससे वह मर गयी । तब देवशर्मा ने विष्णु को पत्नीवियोगजनित दुःख भोगने का शाप दिया । एक कार्य में अनेक हेतु हो ही सकते हैं। इसी तरह स्कन्दपुराण (वैष्णव खं० कात्तिकमाहात्म्य अ० २०।१ ), शिवपुराण ( रुद्रसंहिता उ० ख० अ० ५४
२३), योगवासिष्ठ, आनन्दरामायण तथा लोमशरामायण के अनुसार वृन्दा-शाप के कारण भी विष्णु का रामरूप में प्रकट होना समन्वित है। विष्णु ने जय और विजय की सहायता से जलन्धर के पराजयार्थ वृन्दा का प्रधर्षण किया था, अतः वृन्दा ने जय और विजय को राक्षस बनने का शाप दिया एवं विष्णु को यह शाप दिया कि तुम मनुष्य बनोगे। ये राक्षस ही तुम्हारी पत्नी का अपहरण करेंगे। अतएव तत्त्वसंग्रहरामायण ने वृन्दा-शाप को ही सीता- हरण का कारण कहा है (त० सं० रा० ३।१६)। स्कन्दपुराण (अ० २१।२८) में कहा गया है— “यौ त्वया मायया द्वाःस्थौ स्वकीयौ दर्शितौ मम। तावेव राक्षसौ भूत्वा भार्या तव हरिष्यतः॥” पद्मपुराण में कहा गया है— “अहं मोहं यथा नीता त्वया मायातपस्विना। तथा तव वधूं मायातपस्वी कोऽपि नेष्यति॥” जैसे तुमने मायामय तपस्वी बनकर मुझे मोहित किया है वैसे ही कोई मायामय तुम्हारी पत्नी को ले जायगा। बुल्के कहते हैं, यह शाप का रूप बदल गया है। परन्तु उनका यह कथन असङ्गत है, क्योंकि पूर्वोक्त कथा से इसकी भी सङ्गति कर लेना उचित है। रामचरितमानस में भी मनमानी कल्पना नहीं की गयी है, किन्तु नाना- पुराणनिगमागमसम्मत अर्थ का ही उल्लेख किया है। “छल करि टारेउ तासु व्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह। जब तेहि जानेउ मरम तब शाप कोप करि दीन्ह॥ (रा० मा० १।१२३) तासु शाप हरि कीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥ (रा० मा० १।१२३।१) इन कथनों में सब कथाओं का ही सार-संकलित है। इस प्रसङ्ग में व्रत का अर्थ पातिव्रत्य है, उसको भगवान् ने छल कर अर्थात् जलन्धर का वेष धारण कर टाल दिया और जलन्धर को मार कर देवकार्य किया। अगणित पातिव्रत्य नष्ट करनेवाला जलन्धर अपनी पतिव्रता स्त्री वृन्दा के पातिव्रत्य के कारण अजेय एवं अवध्य था। उसका वध करना अनिवार्य था। इसी लिए कौतुकनिधि भगवान् विष्णु ने अपरिगणित पतिव्रताओं के पातिव्रत्य-रक्षण के लिए जलन्धर के वधार्थ उसकी पत्नी का व्रत छल से भङ्ग किया। तुलसीदास की शिव, काकभुशुण्डि, याज्ञवल्क्य तथा भरद्वाज की परम्परा में यह भी कथा थी कि जलन्धर ने ही रावण बनकर रामपत्नी सीता का हरण किया। इसी लिए राम ने उसका वध कर उसे निजधाम दिया— “तहाँ जलन्धर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥” (रा० मा० १।१२३।१) विष्णु ईश्वर हैं। ईश्वर 'कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्' समर्थ होता है एवं निर्लेप होता है। ईश्वर की उपासना तथा ईश्वरतत्त्व के साक्षात्कार से सम्पन्न जीव भी पुण्य और पाप से निर्लेप होते हैं। फिर ईश्वर के लिए तो कर्मलेप का प्रसङ्ग ही नहीं आ सकता। विशेषतः परोपकारार्थ, अपरिगणित पतिव्रताओं के पातिव्रत्य रक्षणार्थ एवं देवताओं के कार्यार्थ विष्णु के उक्त कार्य में दूषण का प्रश्न ही नहीं उठता, तथापि कौतुकनिधि भगवान् ने शाप अङ्गीकार करके पातिव्रत्य धर्म का लोकोत्तर महत्त्व सूचित किया। स्वयं वृन्दा के शाप से पाषाण (शालग्राम) हो गये। पातिव्रत्य सर्वोत्कृष्ट व्रत है जिसके प्रभाव से अन्यायी अत्याचारी पति का भी नाश करना शिव, विष्णु आदि के लिए भी दुष्कर
है। साथ ही पतिव्रता विष्णु ( ईश्वर ) को भी अपने शाप से पाषाण बना सकती है, अतः उसके साथ छल करना महान् पाप है। जब विष्णु भी छल से पत्थर हो सकते हैं तब अन्य जीवों की तो बात ही क्या है ? उन्हें तो उससे भी कितना भीषण और अधिक दुःख भोगना पड़ेगा । बुल्के नारद-शाप को भी अर्वाचीन बनाने का साहस करते हुए कहते हैं—‘‘नारद के मोह तथा विष्णु के प्रति उनके शाप की कथा अर्वाचीन है’’, किन्तु उक्त कथा के तत्त्व प्राचीन साहित्य में मिलते हैं। महाभारत में नारद और पर्वत का अनेक स्थलों में उल्लेख है। नारद और पर्वत परस्पर मातुल और भागिनेय हैं ( म० भा० १२।३०।५) । शान्तिपर्व में दोनों सृञ्जय के यहाँ पहुँचते हैं। उसकी पुत्री के सम्बन्ध से दोनों एक दूसरे को शाप देते हैं। नारद पर्वत की स्वर्गगति रोक देते हैं एवं पर्वत के शापानुसार नारद सृञ्जय की पुत्री से विवाह कर वानर मुखवाले हो जाते हैं, किन्तु बाद में दोनों मिलकर एक दूसरे को शापमुक्त करते हैं ( म० भा० १२।३०,३१) । समन्वय की दृष्टि से उक्त कथाओं के प्रसिद्ध नारद भागवत के अनुसार विष्णु के सूर्य-वंश में राम के रूप में जन्म
४२८ रामायणमीमांसा त्रयोदश नहीं है। लोक में कोई व्यक्ति पुत्र-प्राप्ति के लिए अनेक महात्माओं और अनेक देवताओं की सेवा करता है, अनेक व्रत और अनेक तपस्याएँ भी करता है सभी की कृपा का फल एक हो सकता है। इसी प्रकार जलन्धर रावण हुआ या हरगण रावण और कुम्भकर्ण हुए या जय और विजय रावण-कुम्भकर्ण हुए, इस सम्बन्ध में कल्पभेद से समाधान सम्भव है। रामचरितमानस का भानुप्रताप भी कल्पभेद से रावण हुआ था। शापवश जय और विजय के तीन जन्म होने प्रसिद्ध हैं। जैसे अनेक सात्त्विकी शक्तियों का विष्णु एवं सीता में सायुज्य सम्भव है वैसे ही अनेक राजस और तामस शक्तियों का रावण में भी सायुज्य सम्भव ही है अर्थात् जब जय-विजय रावण-कुम्भकर्ण हुए तब उन्हीं में जलन्धर, भानुप्रताप और उनके साथियों का सम्मिलितरूप से अवतार मानना श्रुतार्थापत्ति प्रमाण सम्मत ही है। “पीनोऽयं देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते” यहाँ दिवा भोजन न करके भी दृष्ट पीनता की उपपत्ति के लिए जैसे अर्थापत्ति द्वारा रात्रिभोजन की कल्पना होती है वैसे ही प्रामाणिक श्रुत अर्थ की उपपत्ति के लिए भी उपपादक की कल्पना की जाती है। उक्त पुराणादि भारतीय परम्परा में परम प्रामाणिक हैं ही। उनके लेखक व्यास सर्वज्ञकल्प थे, अतः उनकी रचनाओं में भविष्य वृत्तों का वर्णन भी हुआ है। किसी अर्वाचीन घटना के वर्णनमात्र से पुराणों की अर्वाचीनता नहीं सिद्ध हो जाती है। अद्भुतरामायण के अनुसार लक्ष्मी की परिचारिकाओं द्वारा नारद का अपमान हुआ था, अतः नारद के शाप के अनुसार राक्षसों के यहाँ लक्ष्मी के जन्म लेने की कथा का भी समन्वय हो जाता है, क्योंकि सीता की अन्य शक्तियों के समान ही लक्ष्मी का भी अभेद है। नारद श्रीबुल्के के अनुसार “प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में नारद का उल्लेख नहीं था, किन्तु परवर्ती प्रचलित रामायण से लेकर परवर्ती राम-कथाओं की यह विशेषता है कि उनमें नारद का महत्त्व बढ़ता गया है।” परन्तु यह उनका नितान्त विभ्रम है। उनका प्रामाणिक रामायण ही वस्तुतः अप्रामाणिक है, क्योंकि उसका नाम निशान आज तक दुनियाँ में कहीं नहीं है। वर्तमान परम्पराप्राप्त वाल्मीकिरामायण ही प्रामाणिक रामायण है। इसी पर तीर्थ, कतक, भूषण, रामाभिरामी आदि प्रामाणिक टीकाएँ हैं। आस्तिक लोग इसी का पाठ करते हैं। बुल्के के सभी तर्क निःसार हैं। उनके अनुसार बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड दोनों ही अप्रामाणिक रामायण हैं। पाँच काण्डों में भी अवतारवर्णन तथा सीता को लक्ष्मी बतलानेवाले सब अंश प्रक्षेप ही हैं। उनकी प्रामाणिक रामायण उनके सिवा किसी भी आस्तिक को मान्य नहीं है। वर्तमान रामायण का प्रथम सर्ग मूलरामायण के नाम से प्रसिद्ध है। वह वाल्मीकि-नारद-संवादरूप है। बुल्के की भ्रान्त दृष्टि में वह सब प्रक्षेप ही है। उत्तरकाण्ड की नारद-सम्बन्धित कथाओं को भी प्रक्षेप कहना भ्रान्ति ही है। (वा० रा० ७ । सर्ग २०,२१) के अनुसार नारद ने रावण को यम पर आक्रमण करने को उकसाया नहीं, किन्तु मनुष्यलोक को बाधित नहीं करना चाहिए। देव, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व तथा राक्षसों द्वारा तुम अवध्य हो, तुम्हें मनुष्य-लोक को क्लेश नहीं पहुँचाना चाहिए। सदा ही श्रेयःप्राप्ति में संमूढ़, नाना प्रकार के बड़े-बड़े दुःखों तथा बुढ़ापा एवं विविध व्याधियों से पीड़ित, सदा ही अनिष्टों से पूर्ण, क्षुधा-पिपासा से एवं विषाद-शोक से व्याप्त मनुष्यलोक को मत सताओ। यदि तुम्हें लड़ना ही है तो यम पर आक्रमण करो, क्योंकि अन्त में सबको ही यम के वश में होना पड़ता है। यम के जीत लेने से सबपर विजय अपने आप हो जायगी। “किमर्थं वध्यते तात त्वयाऽवध्येन दैवतैः । हत एव ह्ययं लोको यदा मृत्युवशं गतः ॥ देवदानवदैत्यानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । अवध्येन त्वया लोकः क्लेष्टुं योग्यो न मानुषः ॥ नित्यं श्रेयसि संमूढं महद्भिर्व्यसनैर्वृतम् । हन्यात् कस्तादृशं लोकं जराव्याधिशतैर्युतम् ॥” (वा० रा० ७।२०।७-९) ।