भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 490, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 490

अध्याय बालकाण्ड ४१३ एतावता यह भी निश्चित होता है कि सुमित्रा मध्यमा और कैकेयी कनीयसी पत्नी थी। इसी अध्याय में तीनों को क्रमिक प्रथमा, द्वितीया और तृतीया भी कहा गया है— “कोशलस्य नृपस्याथ पुत्रो सर्वाङ्गशोभना । कौशल्यां नाम तां कन्यामुपयेमे स पार्थिवः ॥ मागधस्य नृपस्याथ तनयात्र शुचिस्मिता । सुमित्रा नाम नाम्ना च द्वितीया तस्य भामिनी । तृतीया केकयस्याथ नृपतेर्दुहिता तथा । भार्याभूत् पद्मपत्राक्षी कैकेयी नाम नामतः ॥” स्कन्दपुराण (नागरखण्ड अध्याय ९८) में यह भी कहा गया है—कौशल्या नाम की विख्याता ज्येष्ठ पत्नी में प्रथम पुत्र राम उत्पन्न हुए, कनिष्ठा कैकेयी में भरत नामक पुत्र उत्पन्न हुए एवं सुमित्रा नाम्नी मध्यमा पत्नी में शत्रुघ्न और लक्ष्मण उत्पन्न हुए— “कौशल्या नाम विख्याता तस्य भार्या सुशोभना । ज्येष्ठा तस्यां सुतो जज्ञे रामाख्यः प्रथमः सुतः ॥ [साऽ]न्या कैकेयी नाम तस्य भार्या कनिष्ठिका । भरतो नाम विख्यातस्तस्याः पुत्रो भवत्यसौ ॥ सुमित्राख्या तथा अन्या पत्नी या मध्यमा स्थिता । शत्रुघ्नलक्ष्मणौ पुत्रौ तस्यां जातौ महाबलौ ॥” (स्कन्दपु० नागरखं० ९८।१९–२२) कुछ लोगों के अनुसार भरत और शत्रुघ्न कैकेयी के यमल पुत्र थे, इसके अनुसार “निज जननी के एक कुमारा” की संगति लग जाती है। “प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् । कौशल्याऽजनयद्रामं दिव्यलक्षणसंयुतम् ॥” (वा० रा० १।१८।१०) उत्तम ग्रह, नक्षत्र, लग्न आदि का उदय होने पर सर्वलोकनमस्कृत दिव्यलक्षणसम्पन्न जगदीश्वर राम को कौशल्या ने जन्म दिया । रामाभिरामी के अनुसार सर्वलोकनमस्कृत से यह सूचित किया गया है कि प्रादुर्भाव-काल में कौशल्या को भगवान् के विराट् रूप का दर्शन हुआ और उस रूप के दर्शन से विस्मित होकर कौशल्या ने उन्हें नमस्कार किया और बालरूप धारण करने की प्रार्थना की एवं भगवान् बालरूप से प्रकट हुए । “विष्णोरधं महाभागं पुत्रमैक्ष्वाकुनन्दनम् । लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तोष्ठं दुन्दुभिस्वनम् ॥” (वा० रा० १।१८।११) रामाभिरामी के अनुसार इन श्लोकों का भी पूर्वोक्त श्लोकों के साथ समन्वय ही करना चाहिये तथा शङ्ख, चक्र और अनन्त (शेष) से विशिष्ट विष्णु का अर्ध अर्थात् किञ्चित् न्यून भाग शङ्ख, चक्र और शेष हैं । शङ्खादि- रहित विष्णु रामरूप में अवतीर्ण हुए । “भरतो नाम कैकेय्यां जज्ञे सत्यपराक्रमः । साक्षाद् विष्णोश्चतुर्भागः सर्वैः समुदितो गुणैः ॥” (वा० रा० १।१८।१३)

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