भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 491

४१४ रामायणमीमांसा त्रयोदश साक्षात् विष्णु का चतुर्भाग ( चतुर्थांश से न्यून भाग ) सर्वगुणों से युक्त सत्यपराक्रम भरत के रूप में प्रकट हुआ, क्योंकि पूर्व श्लोकों की व्याख्या के अनुसार पायस के चतुर्थांश न्यून अर्धभाग से ही भरत का जन्म हुआ है। मध्यमपदलोपी समास न समझने के कारण ही श्रीबुल्के आदि ने चतुर्भागः का चतुर्थ भाग अर्थ समझ लिया है, जो कि पूर्व व्याख्या के सर्वथा विरुद्ध है। जब एक साधारण लेख के वाक्यों में भी पूर्वापर का विरोध परिहार करके समन्वय किया जाता है, तब महान् आर्ष रामायण में समन्वय न करके विरोध व्यक्त करना अज्ञता ही है। भरत को पाञ्चजन्य का अवतार समझना चाहिये । “अथ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ सुमित्राऽजनयत्सुतौ । वीरौ सर्वास्त्रकुशलो विष्णोरर्धसमन्वितौ ।” ( वा० रा० १।१८।१४ ) विष्णु के अर्ध भाग से समन्वित सर्वास्त्रकुशल लक्ष्मण और शत्रुघ्न को सुमित्रा ने उत्पन्न किया। यहाँ अर्धशब्द भाग का बोधक है, अंश का नहीं; अतः पूर्वोक्त विभाग के अनुसार पायस के दो अष्टमांशों से लक्ष्मण और शत्रुघ्न की उत्पत्ति हुई। उपर्युक्त मतभेदों का समाधान कल्पभेद से कर लेना चाहिये । श्रीतुलसीदासजो ने भी अपनी एक स्वतन्त्र परम्परा का निर्देश रामचरितमानस में किया है। उन्होंने बताया है कि श्रीभगवान् शिव ने मानस का निर्माण करके अपने मन में रखा था। उसी को उन्होंने शिवा (पार्वती) से कहा था। शिव ने ही काकभुशुण्डि को भी दिया । भुशुण्डि से याज्ञवल्क्य ने पाया। उन्होंने भरद्वाज को सुनाया। उसे मेरे गुरु ने सूकरक्षेत्र में मुझे प्रदान किया था। जिन्होंने यह कथा नहीं सुनी हो, उन्हें आश्चर्य नहीं करना चाहिये, क्योंकि हरि अनन्त हैं। उनके गुण, कर्म और नाम भी अनन्त हैं। उनके विविध अवतार होते हैं, अतः किसी कल्प के अनुसार इस कथा की भी संगति लगा लेनी चाहिये । “संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा ॥ सोइ शिव काकभुसुंडिहि दीन्हा । रामभगत अधिकारी चीन्हा ॥ तेहिसन जागबलिक मुनि पावा । तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा ॥” ( रा० मा० १।२९ (ग) । २, ३ ) “मैं पुनि निज गुरुसन सुनी कथा सो सूकरखेत ।” ( रा० मा० १।३० (क) ) “जेहि यह कथा सुनी नहि होई। जनि आचरजु करै सुनि सोई ॥ राम कथा कै मिति जग नाही । असि प्रतीति तिनके मन माही ॥ नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा ॥ कलप भेद हरि चरित सुहाये । भाँति अनेक मुनीसन गाये ॥” ( रा० मा० १।३२।२-४ ) रामकथा की इयत्ता नहीं है। राम के अवतार अनेक प्रकार के होते हैं। रामायण शतकोटिप्रविस्तर है । कल्पभेद से मुनीशों ने अनेक प्रकार के चरित्रों का वर्णन किया है। यद्यपि तुलसीदास अपने रामचरितमानस को नानापुराणनिगमागमसम्मत मानते हैं तथापि क्वचिदन्यतोऽपि से परम्पराप्राप्त अन्यान्य वस्तुओं का प्रवेश भी उन्हें मान्य प्रतीत होता है। इसी दृष्टि से रामचरितमानस का चरु-विभाग वाल्मीकि आदि से विलक्षण प्रतीत होता है। उसके अनुसार पायस का अर्ध भाग कौशल्या को प्रदान किया गया। उससे राम का आविर्भाव हुआ। आधे में दो भाग करके एक भाग कैकेयी को प्रदान किया गया, जिससे भरत का जन्म हुआ। अवशिष्ट अर्ध में दो विभाग कर एक-एक भाग कौशल्या और कैकेयी के हाथ से सुमित्रा को दिया गया। उनमें से कौशल्यादत्त भाग से रामानुज लक्ष्मण का प्रादुर्भाव एवं कैकेयीदत्त चरुभाग से भरतानुज शत्रुघ्न का आविर्भाव हुआ। टीकानिरपेक्ष मूल वाल्मीकि के ( १।१६।