भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय बालकाण्ड ४१५ २७) और (१८।११) के अनुसार भी चरु के अर्ध भाग से राम का आविर्भाव स्पष्टतया सिद्ध है। किन्तु अन्य भागों में वाल्मीकिरामायण रामचरितमानस में भिन्नता है। शङ्ख, चक्र और शेष सहित विष्णु की अपेक्षा केवल विष्णु अर्ध समझे जा सकते हैं, अर्ध भाग में शङ्ख, चक्र और शेष समझे जा सकते हैं। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध की दृष्टि से क्रमेण राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का आविर्भाव समझना चाहिये । माण्डूक्य उपनिषद् की दृष्टि से राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को क्रमशः तुरीय ब्रह्म, आनन्दमय, हिरण्यगर्भ और विराद् समझना चाहिये । नृसिंहतापनीय उपनिषद् की दृष्टि से ओत अर्थात् विराट् तुरीय को शत्रुघ्न, अनुज्ञाता हिरण्यगर्भ तुर्य को लक्ष्मण, अनुज्ञा आनन्दमय (अव्याकृत) तुरीय को भरत और अविकल्प तुर्य तुरीय को राम समझना चाहिये । “क्वेषानुज्ञेत्येष एवात्मेति होवाच । ते होचुर्नमस्तुभ्यं वयं त इति ह प्रजापतिर्देवाननुशशासेति । ओतमोतेन जानीयादनुज्ञातारमान्तरम् । अनुज्ञामद्वयं लब्ध्वा उपद्रष्टारमाव्रजेदित्युपद्रष्टारमाव्रजेदिति । ( नृसिंहोत्तरतापनीय खण्ड ९ ) “अथ तुरीयेण ओतश्च प्रोतश्च ह्यायमात्मा नृसिंहोऽस्मिन् सर्वमयं सर्वात्मार्यं हि सर्वं नैवौतोऽद्वयो ह्यायमात्मकल एवाविकल्पः । नहि वस्तु सदयं ह्योत इय सद्धनोऽयं चिद्धनः····। अनुज्ञाता ह्यायमात्मैष ह्यस्य सर्वस्य स्वात्मानमनुजानाति । ओमिति ह्यानुजानाति···················································· अनुज्ञैकरसो ह्यायमात्मा··········································· न ह्ययमोतो नानुज्ञाता············································· अनुज्ञैकरसो ह्ययमोङ्कारः···························ओङ्कारकश्चिदेवानुज्ञा । “अविकल्पो ह्ययमोङ्कारः····परमेश्वर एवैकमेव तद्भवत्यविकल्पोऽपि नात्र काचन भिदास्ति नैव तत्र काचन हि भिदास्त्यत्र भिदामिव मन्यमानः शतधा सहस्रधा भिन्नो मृत्योर्मृत्युमाप्नोति ।” ( नृ० उ० ता० खण्ड ८ ) “अनुज्ञाया निर्विकल्पस्य चान्तरत्वमवगन्तव्यम् ।” ( शां० भा० ) रामतापनीय की दृष्टि से अकाराक्षरसंभूत लक्ष्मण विश्व या विराट् हैं, उकाराक्षरसंभूत शत्रुघ्न तैजस या हिरण्यगर्भ हैं, मकाराक्षरसंभूत भरत अव्याकृत या प्राज्ञ हैं एवं अर्धमात्रासंभूत राम तुरीय ब्रह्म हैं— “अकाराक्षरसंभूतः सौमित्रिर्विश्वभावनः । उकाराक्षरसंभूतः शत्रुघ्नस्तैजसात्मकः ॥ प्राज्ञात्मकस्तु भरतो मकाराक्षरसंभवः । अर्धमात्रात्मको रामः ब्रह्मानन्दैकविग्रहः ॥ विश्वभावनो विरड्रूपः जाग्रदभिमानी संकर्षणः । तैजसात्मकः स्वप्नाभिमानी शत्रुघ्नः प्रद्युम्नः । प्राज्ञात्मकः सुषुप्ताभिमानी भरतः । “रामस्तुरीयावस्थं ब्रह्म वासुदेवात्परम् श्रीरामसान्निध्यवशाज्जगदानन्ददायिनी । उत्पत्ति- स्थितिसंहारकारिणी सर्वदेहिनाम् ।। सा सीता भवति ज्ञेया मूलप्रकृतिसंज्ञिता । ( बिन्द्वीशवाच्या कार्योन्मुखी नादांशवाच्या शक्तिशान्तारूपे अप्प्रवस्थे अस्या एव । ) प्रणवत्वात् प्रकृतिरिति वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥”