भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 493, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 493

वस्तुतः रामतापनीय के सौमित्रि शब्द का शत्रुघ्न अर्थ करना चाहिये और शत्रुघ्न शब्द का यौगिक अर्थ शत्रुहन्ता लक्ष्मण करना अभीष्ट है। जिस प्रकार गीता में-- "भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥” (गी० ७।४) । इस श्लोक में मन का अर्थ अहङ्कार, बुद्धि का अर्थ महत्तत्त्व और अहङ्कार का अर्थ अव्यक्त तत्त्व करके अष्ट प्रकृतियों की गणना की जाती है। प्रकृत में भी वैसा ही समझना चाहिये। इस दृष्टि से पायस को निर्विशेष तथा सविशेष उभयविध सम्पूर्ण ब्रह्म समझना चाहिये। (एको विष्णोर्महद्भूतम् ) पायस का प्रथम अर्धभाग अर्धमात्रालक्ष्य निर्विशेष ब्रह्म का प्रतीक है। उसी से राम का प्रादुर्भाव है। द्वितीय अर्धभाग को स्थूल-सूक्ष्म कार्यब्रह्म और कारण- ब्रह्मरूप सविशेष ब्रह्म का प्रतीक समझना चाहिये। सविशेष के प्रथम दो विभाग हुए कारण और कार्य विभाग। कारण विभाग के प्रतीकरूप प्रथम भाग से भरत का आविर्भाव है और द्वितीय भाग के सूक्ष्म और स्थूल कार्य के भेद से पुनः दो विभाग हुए । सूक्ष्म कार्यब्रह्म का लक्ष्मण और स्थूल कार्यब्रह्म का शत्रुघ्न के रूप में आविर्भाव हुआ। कार्य में स्पष्टता होने के कारण लक्ष्मण और शत्रुघ्न का गौर रूप है। कारण एवं कारणातीत निर्विशेष ब्रह्म में अव्यक्तता के कारण नीलाम्बुजश्यामलता है। निराकार आकाश की श्यामलता के समान ही निराकार कारण और तुरीय ब्रह्म को श्यामल समझा जा सकता है। परन्तु एक दृष्टि से लक्ष्मण को ही शेष, अनन्त या अव्याकृत कहा गया है। अव्याकृतब्रह्म अक्षरब्रह्म को ही व्यापी वैकुण्ठ एवं भगवान् का आसन शेष (अनन्त) या सिंहासन माना जाता है। शेष शब्द अव्याकृत या कारणब्रह्म है, क्योंकि प्रपञ्च-प्रलय के बाद वही अवशिष्ट रहता है। "शिष्यते यः स शेषः" जो बाकी बचता है वही शेष है। "नष्टे लोके द्विपरार्द्धावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः ॥” (भा० पु० १०।३।२५) प्रलयकाल में सब लोकों के नष्ट होने पर सब भूत, भूतादि अहङ्कार में लीन हो जाते हैं। व्यक्त अहङ्कार, महान् आदि भी अव्यक्त में प्रलीन हो जाते हैं। तब केवल आप ही रह जाते हैं, अतः आपकी शेषसंज्ञा होती है। अकार-प्रश्लेष से अशेष संसार की संज्ञा (शान्त) आप में होती है। इस दृष्टि से शेष ही संकर्षण या कारणब्रह्म होते हैं और वे अनन्यभक्ति से सर्वशेषी भगवान् का अपने को शेष (अङ्ग) बना देते हैं। अपने आपको ही भगवान् की शय्या, सिंहासन, पादुका आदि बनाकर अपने आप को ही पहरेदार या अङ्गरक्षक बना देते हैं, इसलिए भी वे शेष हैं। जो अपने आपको मुख्य भगवान् का अङ्ग बना देता है वही अशेष अर्थात् सब कुछ होता है। इसी दृष्टि से वाल्मीकिरामायण में अवशिष्ट पायस के अर्धांश सविशेष ब्रह्म का अर्धांश कारण ब्रह्मांश सुमित्रा को दिया गया है और उससे लक्ष्मण का आविर्भाव हुआ। शेष अर्ध अर्थात् कार्यब्रह्म में दो विभाग किये गये एक सूक्ष्म कार्यब्रह्म और अन्य स्थूल कार्यब्रह्म दोनों ही कैकेयी को प्रदान किये गये। उनमें से एक भाग स्थूल कार्य ब्रह्मरूप पुनः सुमित्रा को दिया गया। उसीसे शत्रुघ्न की उत्पत्ति हुई। सूक्ष्म कार्यब्रह्म का कैकेयी से भरत के रूप में प्रादुर्भाव हुआ। उन दोनों भागों को शङ्ख और चक्र रूप भी कहा जा सकता है। श्रीराम के अनन्त यशःसौरभ तथा विजय के ज्ञापक पाञ्चजन्य शङ्खरूप भरत हैं। "रघुपतिकीरति विमल पतका। दण्ड समान भयो जस जाका ॥” ( रा० मा० १।१६।३ ) दैत्यादि शत्रुओं का सूदन करनेवाला चक्र ही श्रीरिपुदमन शत्रुघ्न के रूप में प्रकट हुआ। इस तरह दोनों ही पक्षों का कल्पभेद एवं अभिप्रायभेद से समन्वय है। नृसिंहपुराण, पद्मपुराण, रघुवंश आदि के अनुसार कारण