रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 497, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें४२० रामायणमीमांसा त्रयोदश सीता के लक्ष्मीत्व तथा राम के विष्णुत्व का विकास मानना भी बुल्के की भूल है। अन्यत्र सीता के लक्ष्मीत्व के उल्लेख को वाल्मीकिरामायण में अर्वाचीन कहना भी निराधार है, यह पीछे विस्तृतरूप से कहा जा चुका है। राम की कृष्ण से अभिन्नता के प्रतिपादक वाल्मीकिरामायण "कृष्णश्चैव बृहद्बलः" (६।११७।१५) इस अध्याय को प्रक्षेप कहना भी निराधार ही है। यह कहना भी निरर्थक ही है कि वायुपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, विष्णुपुराण जैसे प्राचीन महापुराणों तथा रघुवंश में सीता तथा लक्ष्मी का अभेदनिर्देश नहीं है। यद्यपि इन रचनाओं में राम को विष्णु कहा गया है, क्योंकि उक्त महापुराणों में राम को विष्णु कहा गया है, जब उसे ही बुल्के स्वीकार नहीं करते हैं तो सीता का लक्ष्मीत्व उन पुराणों में वर्णित होता तो भी उन्हें मानना नहीं था। वस्तुतः सभी पुराणों का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। श्रीभागवतपुराण एवं रामतापनीय उपनिषद् में सीता की लक्ष्मी या प्रकृतिरूपता उक्त है तथा सीतोपनिषद् में भी वह प्रतिपादित है। इससे समझ लेना चाहिये कि पुराणों, महापुराणों को औपनिषद मत मानने में कोई आपत्ति है ही नहीं। अध्यात्मरामायण आदि इन्हीं वचनों के आधार पर सीता को लक्ष्मी, योगमाया तथा मूलप्रकृति आदि मानते हैं। "पार्वत्यंशसमुद्भूता। जनकेन पुरा गौरी तपसा तोषिता यतः ॥" (सौ० पु० ३०।४१) तथा भागवत में भी सीता एवं लक्ष्मी की अभिन्नता प्रतिपादित है— "जित्वाऽनुरूपगुणशीलवयोऽङ्गरूपां सीताभिधां श्रियमुरस्यभिलब्धमानाम्।" (भा० पु० ९।१०।७) श्रीबुल्के का यह कथन भी निःसार है कि महाभागवतपुराण में सीता को लक्ष्मी कहा गया है, परन्तु लक्ष्मी की देवी के अंश से उत्पत्ति मानी गयी है (महा० भा० पु० अ० ३६), क्योंकि अंश-अंशिभाव अव्यवस्थित होता है, अतएव अनेक स्थानों में पार्वती आदि को भी सीता का अंश ही कहा गया है। महारामायण में कहा गया है— "श्रीर्भूलीला तथोत्कृष्टा कृपा भोगोन्नती तथा । शान्तापू्र्वी तथा।सत्या : कथिता चाप्यनुग्रहा ॥ ईशाना चैव कीर्तिश्च विद्येला कान्तिलम्बिनी । चन्द्रिकाऽपि तथा क्रूरा कान्ता वै भीषणी तथा ॥ क्षान्ता च नन्दिनी शोका शान्ता च विमला तथा । शुभदा शोभना पुण्या कला चाप्यथ मालिनी ॥ महोदया ह्लादिनी च शक्तिरेकादशत्रिका । पश्यन्ति भृकुटि तस्या जानक्या नित्यमेव च ॥ जानक्यंशादिसंभूताऽनेकब्रह्माण्डकारणम् । सा मूलप्रकृतिर्जेया महामाया स्वरूपिणी ॥" (सर्ग ५) । इत्यादि महारामायण के वचनों में सीता से ही श्री, भू, लीला ईशाना आदि अनेक शक्तियाँ आविर्भूत होती हैं। सीतोपनिषद से भी उक्त सिद्धान्त का समर्थन होता है। इतना ही नहीं ईशाना, त्रिपुरा आदि तत्त्व का विश्लेषण करने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि भगवती केवल शक्ति या मूलप्रकृतिरूप ही नहीं हैं, किन्तु वह सच्चिदानन्दरूपिणी हैं। नवार्ण आदि मन्त्रों में सच्चिदानन्दरूपिणी भगवती की आराधना निर्दिष्ट है। इसी दृष्टि से उसे 'चितिरूपेण संस्थिता' माना गया है। शरीरत्रयरूप त्रिपुर की साक्षिणी ही त्रिपुरसुन्दरी है। उसी का विस्तृत विवेचन आद्य शङ्कराचार्य ने अपने सौन्दर्यलहरी आदि ग्रन्थों में किया है। इस दृष्टि से सीता सच्चिद्ब्रह्मरूपिणी ही है। एक ही ब्रह्मज्योति दो रूपों में प्रकट है—