रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याये बालकाण्ड ४२१ ‘एकं ज्योतिरभूद् द्वेधा राधामाधवरूपकम्।’ वेद भी ‘त्वं कुमारः’ के समान ही ‘उत वा कुमारी’ कहकर ब्रह्म को कुमार और कुमारी दोनों ही कहता है। उससे भी बढ़कर यह कहना चाहिये कि जैसे गङ्गा का ही अंश तरङ्ग है उसी तरह ब्रह्म का ही अंश सीता है। इतना ही नहीं, गङ्गाजल में तरङ्ग से भी अन्तरङ्ग शीतलता, मधुरता और पवित्रता होती है, अमृतसिन्धु में मधुरिमा होती है उसी तरह आनन्दसिन्धु सुखराशि राम में माधुर्यसार- सर्वस्व की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी सीता है। अभेद होने में भी विशेष विवक्षा की जाय तो सौन्दर्यसार-सर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता है तथा प्रेमसार-सर्वस्व के अधिष्ठाता देवता राम हैं। इस तरह राम के विष्णुत्व या परब्रह्मत्व से सीता की तद्रूपता सुतरां सिद्ध है। संमोहनतन्त्र का निम्नोक्त वचन प्रकृत प्रसङ्ग में भी लागू है— “गौरतेजः परित्यज्य इय!मतेजः समर्चयेत् । जपेद्वा ध्यायते वापि स भवेत्पातकी शिवे ॥” जो गौर तेज के बिना केवल श्याम तेज को