रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 499, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें४२२ रामायणमीमांसा त्रयोदश होइ अनीति जाइ नहि बरनी। सीदहिं विप्र धेनु सुर धरनी ॥ तब तब हरि धरि विविध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जनपीरा ॥' (रा० मा० १।१२०।३,४) "असुर मारि थापहिं सुरन्ह पालहिं निज श्रुतिसेतु" ॥ (रा० मा० १.१२१) यह भी कहना असङ्गत है कि "रामभक्ति पल्लवित होने के बाद इसका भी प्रायः उल्लेख मिलता है कि भक्तों को भवसागर पार करने के लिए और अपना सगुण रूप दिखलाने के लिए ही निर्गुण ब्रह्म राम के रूप में प्रकट होते हैं," क्योंकि सिद्धान्तानुसार तो कलियुग में रामभक्ति का पल्लवन नहीं, किन्तु ह्रास ही हुआ है। अतः प्राचीन युग से ही यह निश्चित सिद्धान्त है कि भक्तानुग्रहार्थ निर्गुण ब्रह्म सगुण ब्रह्म के रूप में प्रकट होते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार अमलात्मा परमहंस महामुनीन्द्रों के भक्तियोग का विधान कर उनको परमहंस से श्रीपरमहंस बनाने के उद्देश्य से निर्गुण ब्रह्म का सगुण ब्रह्म होना कहा गया है— 'तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥' (भा० पु० १।८।२०) नैष्कर्म्य ज्ञान भी भक्ति के बिना शोभित नहीं होता फिर भक्तिविहीन कर्म कैसे शोभित हो सकेगा— “नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ॥” (भा० पु० १।५।१२) । भगवद्भक्ति से ही परमहंस होता है। आत्माऽनात्मविवेकी हंस सांख्यनिष्ठ हैं, अनात्मबाधपूर्वक अनन्तब्रह्मा- त्मनिष्ठ परमहंस होता है और ब्रह्मात्मनिष्ठ होकर भक्तिनिष्ठ होने से श्रीपरमहंस की प्राप्ति होती है। फिर भी जैसे अग्निहोत्रादि के लिए अरणिमन्थनपूर्वक अग्नि प्रकट होने पर उसी से भोजनादि निर्माण कार्य भी सम्पन्न होता है वैसे ही भक्तिविधानार्थ उत्पन्न भगवान् से भी धर्मग्लानि तथा अधर्म की निवृत्ति, धर्म-संस्थापन तथा साधुपरित्राण, दुष्कृतिविनाश आदि कार्य भी सम्पन्न होते हैं। अथवा यों भी समझा जा सकता है कि यद्यपि सत्यसङ्कल्प भगवान् अपने सङ्कल्प से ही सब कार्य कर सकते हैं तथापि पूर्वोक्त भक्तियोग विधानरूप कार्य तो भजनीय स्वरूप के उपस्थान के बिना हो ही नहीं सकता था, अतः ध्येय या भजनीय रूप का आविर्भाव अनिवार्य ही है। इसी प्रकार श्रीगोपाङ्गना जैसे साधुओं के परित्राणार्थ उनका आविर्भाव होता है। गोविन्ददर्शन के बिना अन्य मार्ग से उनका रक्षण संभव ही नहीं था, इसलिए भगवान् का अवतार अनिवार्य था। उन्हीं दुष्कृतियों के लिए जो भगवान् की युद्धक्रीडिषा की पूर्ति के लिए ही स्वेच्छापूर्वक दुष्कृती हो स्वयं प्रतिभट होकर उपस्थित हुए थे, उनका विनाश अन्य लोगों से अभीष्ट भी नहीं था और संभव भी नहीं था, इस प्रकार गीता का पद्य भी विशेषार्थ में पर्यवसित होता है। जय और विजय के लिए भगवान् का आविर्भाव हुआ है, यह भी श्रीमद्भागवत तथा विष्णुपुराण के अनुसार ही है। इसी का उल्लेख रामचरितमानस में किया गया है— "मुकुत न भये हुते भगवाना । तीनि जन्म द्विजवचन प्रमाना ॥" (रा० मा० १।१२२।१) एक साधारण व्यक्ति भी जानता है कि एक ग्रन्थ में या एक लेखक के अनेक ग्रंथों में अथवा एक सिद्धान्त- निष्क विभिन्न व्यक्तियों के भी ग्रन्थों में परस्पर विरोध अभीष्ट नहीं होता। किसी संविधान की विभिन्न धाराएँ यदि विरुद्धसी प्रतीत होती हैं तो उनका भी समन्वय करके पूर्वापरविरोध का परिहार किया जाता है। इसपर विचार करने के लिए ही सर्वोच्च न्यायालयों, न्यायाधीशों तथा न्यायवादियों की अपेक्षा होती है। अतः वेदों तथा वैदिक पुराणों एवं महाभारत, वाल्मीकिरामायण आदि में विरोधाभास मिटा कर समन्वय किया जाता है। परन्तु बुल्के उक्त ग्रन्थों में विरोध ही विरोध खोजने में व्यस्त दिखायी देते हैं। वे कहते हैं, "कश्यप और अदिति का सम्बन्ध पहले-पहल