भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 502

अध्याय बालकाण्ड ४३५ "स्वायम्भू मनु अरु सतरूपा । जिन्हते भइ नर सृष्टि अनूपा ॥ दम्पति धरम आचरन नीका । अजहुं गाव श्रुति जिन्हके लीका ॥ नृप उत्तानपाद सुत तासू । ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू ॥ लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही । बेद पुराण प्रसंसहिं जाही ॥ देवहूति पुनि तासु कुमारी । जो मुनि कर्दम के प्रिय नारी ॥ आदि देव प्रभु दीन दयाला । जठर घरेउ जेहिं कपिल कृपाला ॥ सांख्य शास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना । तत्त्वबिचार निपुन भगवाना ॥ ( रा० मा० १।१४१।१-४) इन मनु का जीवनवृत्त श्रीभागवत में भी इसी प्रकार वर्णित है— "ब्रह्मावर्तं योऽधिवसन् शास्ति सप्तार्णवां महीम् ।” ( भा० पु० ३।२१।२५ ) जो ब्रह्मावर्त में निवास करते हुए सप्तार्णवा मेदिनी का शासन करते थे। "मनुर्वे यत्किञ्चावदत्तद् भेषजं भेषजतायै" ( ताण्ड्यम० ब्रा० १३।१६।७ ), "यद्वै किञ्च मनुरवदत् तद् भेषजम् ।” ( तै० सं० २।२।१०।२ ) मनु ने जो भी धर्म मनुस्मृति में कहा है वह भेषजवत् परमकल्याणकारी है। भागवतपुराण के अनुसार इन्हीं के वंश में भगवान् राम का अवतार हुआ है एवं इन्हीं की पुत्री में कपिल का अवतार हुआ था, अतः पद्मपुराण आदि पुराणों के अनुसार भगवान् राम को पुत्ररूप में प्राप्त करने के लिए मनु की तपस्या का वर्णन अत्यन्त सङ्गत है । अनु० ३७० वें में शाप पर विचार किया गया है। श्रीबुल्के कहते हैं, “भृगु-शाप की कथा के प्राचीनतम रूप में किसी अवतार विशेष का उल्लेख नहीं किया गया है;" परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि मत्स्यपुराण भी प्राचीनतम ही है। उसमें भृगुपत्नी का वध करने के कारण भृगु ने विष्णु को सात बार मनुष्यों में अवतार लेने का शाप दिया है— "तस्मात् त्वं सप्त कृत्वेह मानुषेषूपपत्स्यसे ।” (म० पु० ४७।१०६) । लिङ्गपुराण के अनुसार भी भृगुशाप से विष्णु का दस बार अवतार लेना सिद्ध होता है— "भृगोरपि च शापेन विष्णुः परमवीर्यवान् । प्रादुर्भावान् दश प्राप्तो दुःखितश्च सदा कृतः ।। (लि० पु० २९।२६ ) वायुपुराण ( अ० ९७ ), ब्रह्माण्डपुराण ( २ । अ० ७२ ) एवं देवीभागवत ( ४।अ० १२) में भी उक्त कथा का समर्थन मिलता ही है । वाल्मीकिरामायण ( ७।५१।१३-१५ ) के अनुसार तथा वह्निपुराण ( ५।१७ ) के अनुसार भी भृगुशाप के कारण राम को पत्नी-वियोग का कष्ट होना प्रमाणित है । योगवासिष्ठ ( वै० प्र० १।६१ ) । योगवासिष्ठ में दो अन्य कथाओं का भी उल्लेख है : ब्रह्मलोक में विष्णु के गमन पर सबने स्वागत किया, किन्तु सनत्कुमार ने उनका अभ्युत्थान नहीं किया, इस कारण विष्णु ने उन्हें कामातुर होने का शाप दिया । उसके प्रत्युत्तर में सनत्कुमार ने भी विष्णु को अशान्त बन जाने का शाप दिया ( यो० वा० १।१।५९,६० ) । वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में राम का वचन है— “आत्मानं मानुषं मन्ये जातं दशरथात्मजम् ।” ( ६।११७।११ ) अर्थात् मैं अपने को दशरथ-पुत्र तथा मनुष्य समझता हूँ । यही अशान्त होने का प्रमाण है। योगवासिष्ठ ( १।१।६३,६४ ) के अनुसार विष्णु ने नृसिंहकूप से देवशर्मा की पत्नी को डराया था, जिससे वह मर गयी । तब देवशर्मा ने विष्णु को पत्नीवियोगजनित दुःख भोगने का शाप दिया । एक कार्य में अनेक हेतु हो ही सकते हैं। इसी तरह स्कन्दपुराण (वैष्णव खं० कात्तिकमाहात्म्य अ० २०।१ ), शिवपुराण ( रुद्रसंहिता उ० ख० अ० ५४