रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ रामायणमीमांसा त्रयोदश आराधना की और अन्त में उनसे यह वर माँगा “सर्गेकार्ये विघ्ना नश्यन्तु मे" मेरे सृष्टि के कार्य में सब विघ्न नष्ट हों । देवी ने उन्हें अकण्टक राज्य तथा पुत्रों की प्राप्ति का वर प्रदान किया था- “राज्यं निष्कण्टकं तेऽस्तु पुत्रा वंशकरा अपि ।” ( दे० भा० १०।२।३ ) । बुल्के कहते हैं, “परन्तु उक्त कथाओं में किसी अवतार का उल्लेख नहीं है । सम्भवतः वैवस्वत मनु की कथा के प्रभाव के कारण अर्वाचीन रचनाओं में स्वायम्भुव मनु की तपस्या तथा अवतार का सम्बन्ध जोड़ा गया है ।” बस यही पाश्चात्यों की दुर्भावना का नमूना है । किसी अंग्रेज सज्जन ने सिक्ख धर्म स्वीकार कर लिया । केश, कङ्घी, कच्छ आदि पञ्च ककार धारण कर ग्रन्थ साहब का अध्ययन किया तथा उसका एक उत्तम संस्करण निकाल कर उसपर टिप्पणी करते हुए लिखा कि "गुरुओं ने कहीं ग्रन्थसाहब में अपने को हिन्दू नहीं लिखा और कहीं गौमांस का निषेध नहीं किया ।” यही जहर का बीज बोकर वे सज्जन अपने देश चले गये और जो थे वही पुनः हो गये । उसी का दुष्परिणाम है कि आज सिक्ख अपने को हिन्दू कहने में लज्जित होता है, परन्तु वस्तुस्थिति ठीक इसके विपरीत थी । दशम गुरु ने स्पष्ट शब्दों में कहा है- "जगे धर्म हिन्दू सभी भण्ड भागै ।” इसी तरह जिन ग्रन्थों में स्पष्टरूप से स्वायम्भुव मनु और शतरूपा का तप वर्णित है उन्हें वे अर्वाचीन बना कर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि “प्राचीन शतपथ- ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में स्वायम्भुव के तप आदि का वर्णन तो है, परन्तु उनसे किसी अवतार विशेष का सम्बन्ध नहीं है; किन्तु वैवस्वत मनु की तपस्या के प्रभाव से हुए मत्स्यावतार का वर्णन देखकर अर्वाचीन लोगों ने स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की तपस्या और विष्णु के अवतार की कल्पना कर ली है; अवतारवाद केवल कल्पना है, बाद का है; अतएव मूल वाल्मीकिरामायण में वह नहीं था । प्रचलित वाल्मीकिरामायण में अवतारवाद की सब बातें प्रक्षिप्त हैं ।” बुल्के साहब की यह कल्पना निराधार, निष्प्रमाण एवं अशुद्ध है, क्योंकि पद्मपुराण के उत्तरखण्ड के अनुसार स्वायम्भुव मनु ने १००० वर्ष तक तपस्या कर विष्णु से यह वर प्राप्त किया था कि विष्णु तीन जन्मों में उनके पुत्र बनें । तदनुसार स्वायम्भुव मनु और शतरूपा क्रमशः दशरथ-कौशल्या, वसुदेव-देवकी तथा कलियुग में शम्भलग्रामवासी ब्राह्मण विष्णुयश या हरिगुप्त तथा उसकी पत्नी देवप्रभा के रूप में प्रकट होते हैं पद्मपुराण ( उत्तरखं० अ० २६९ ), रामरहस्य ( सर्ग १ ) तथा तत्त्वसंग्रहरामायण ( १।१३ ) । रामरहस्य में हरिगुप्त के स्थान में हरिग्रत नाम का उल्लेख है । रामचरितमानस ( १।४१ ) तथा पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३ में मनु-शतरूपा तथा दशरथ-कौशल्या की अभिन्नता का उल्लेख है । पद्मपुराण व्यावनिर्मित है, अतः व्यावनिर्मित अन्य पुराणों के साथ उसका समन्वय अनिवार्य है । अतएव कल्पना, प्रक्षेप या आधुनिक कल्पना कहना दुरभिसन्धिमात्र है । स्कन्दपुराण ( वैष्णवखण्ड अध्याय २४ ), पद्मपुराण ( उत्तरखं० अ० १०९ ) तथा आनन्दरामायण ( १।४।११७-१७० ) के अनुसार विष्णुभक्त धर्मदत्त और कलहा की कथा का समन्वय भी करना उचित है । मनु-शतरूपा बृहदारण्यक उपनिषद् के अनुसार हिरण्यगर्भ एवं महाविराट् प्रजापति से अभिन्न हैं । सृष्टि-क्रम में प्रजापति इच्छा एवं आलोचन रूप तप से स्वयं ही पति और पत्नी दो रूपों में हो गये थे । जैसे एक चणक या मुद्ग ( चना या मूंग ) आदि के दो दल हो जाते हैं वैसे ही प्रजापति ही मनु और शतरूपा हो गये । शतरूपा का अर्थ है अनन्तरूपा । प्रजापति मनु से लज्जित होकर वह गौ, बडवा, अजा आदि अनेक रूप धारण करती गयी । तदनुसार ही मनु भी वृषभ, अश्व, अज आदि रूप धारण करते गये । इसी आधार पर संसार में अपरगणित प्रकार के प्राणी उत्पन्न हुए हैं । वे मनु-शतरूपा एक प्रकार से सम्पूर्ण प्राणियों के ही माता-पिता हैं। उनकी दीर्घकाल की आयु है। उसमें अनेक बार तपस्याएँ तथा विविध प्रकार के कार्य हुए हैं। मन्त्रों, ब्राह्मणों तथा पुराणों में भी सबका उल्लेख सम्भव नहीं है, फिर भी उनकी महत्त्वपूर्ण तपस्याओं एवं कार्यों का उल्लेख हुआ है । अतः पद्मपुराण के अनुसार उनकी तपस्या और उनका दशरथ और कौशल्या के रूप में परब्रह्म राम को पुत्ररूप में प्राप्त करना आदि सर्वथा सङ्गत है । रामचरितमानस में मनु-शतरूपा का पूरा परिचय दिया गया है-