भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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२३), योगवासिष्ठ, आनन्दरामायण तथा लोमशरामायण के अनुसार वृन्दा-शाप के कारण भी विष्णु का रामरूप में प्रकट होना समन्वित है। विष्णु ने जय और विजय की सहायता से जलन्धर के पराजयार्थ वृन्दा का प्रधर्षण किया था, अतः वृन्दा ने जय और विजय को राक्षस बनने का शाप दिया एवं विष्णु को यह शाप दिया कि तुम मनुष्य बनोगे। ये राक्षस ही तुम्हारी पत्नी का अपहरण करेंगे। अतएव तत्त्वसंग्रहरामायण ने वृन्दा-शाप को ही सीता- हरण का कारण कहा है (त० सं० रा० ३।१६)। स्कन्दपुराण (अ० २१।२८) में कहा गया है— “यौ त्वया मायया द्वाःस्थौ स्वकीयौ दर्शितौ मम। तावेव राक्षसौ भूत्वा भार्या तव हरिष्यतः॥” पद्मपुराण में कहा गया है— “अहं मोहं यथा नीता त्वया मायातपस्विना। तथा तव वधूं मायातपस्वी कोऽपि नेष्यति॥” जैसे तुमने मायामय तपस्वी बनकर मुझे मोहित किया है वैसे ही कोई मायामय तुम्हारी पत्नी को ले जायगा। बुल्के कहते हैं, यह शाप का रूप बदल गया है। परन्तु उनका यह कथन असङ्गत है, क्योंकि पूर्वोक्त कथा से इसकी भी सङ्गति कर लेना उचित है। रामचरितमानस में भी मनमानी कल्पना नहीं की गयी है, किन्तु नाना- पुराणनिगमागमसम्मत अर्थ का ही उल्लेख किया है। “छल करि टारेउ तासु व्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह। जब तेहि जानेउ मरम तब शाप कोप करि दीन्ह॥ (रा० मा० १।१२३) तासु शाप हरि कीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥ (रा० मा० १।१२३।१) इन कथनों में सब कथाओं का ही सार-संकलित है। इस प्रसङ्ग में व्रत का अर्थ पातिव्रत्य है, उसको भगवान् ने छल कर अर्थात् जलन्धर का वेष धारण कर टाल दिया और जलन्धर को मार कर देवकार्य किया। अगणित पातिव्रत्य नष्ट करनेवाला जलन्धर अपनी पतिव्रता स्त्री वृन्दा के पातिव्रत्य के कारण अजेय एवं अवध्य था। उसका वध करना अनिवार्य था। इसी लिए कौतुकनिधि भगवान् विष्णु ने अपरिगणित पतिव्रताओं के पातिव्रत्य-रक्षण के लिए जलन्धर के वधार्थ उसकी पत्नी का व्रत छल से भङ्ग किया। तुलसीदास की शिव, काकभुशुण्डि, याज्ञवल्क्य तथा भरद्वाज की परम्परा में यह भी कथा थी कि जलन्धर ने ही रावण बनकर रामपत्नी सीता का हरण किया। इसी लिए राम ने उसका वध कर उसे निजधाम दिया— “तहाँ जलन्धर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥” (रा० मा० १।१२३।१) विष्णु ईश्वर हैं। ईश्वर 'कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्' समर्थ होता है एवं निर्लेप होता है। ईश्वर की उपासना तथा ईश्वरतत्त्व के साक्षात्कार से सम्पन्न जीव भी पुण्य और पाप से निर्लेप होते हैं। फिर ईश्वर के लिए तो कर्मलेप का प्रसङ्ग ही नहीं आ सकता। विशेषतः परोपकारार्थ, अपरिगणित पतिव्रताओं के पातिव्रत्य रक्षणार्थ एवं देवताओं के कार्यार्थ विष्णु के उक्त कार्य में दूषण का प्रश्न ही नहीं उठता, तथापि कौतुकनिधि भगवान् ने शाप अङ्गीकार करके पातिव्रत्य धर्म का लोकोत्तर महत्त्व सूचित किया। स्वयं वृन्दा के शाप से पाषाण (शालग्राम) हो गये। पातिव्रत्य सर्वोत्कृष्ट व्रत है जिसके प्रभाव से अन्यायी अत्याचारी पति का भी नाश करना शिव, विष्णु आदि के लिए भी दुष्कर