रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ४२९ ब्राह्मण-पुत्र की अकाल मृत्यु का रहस्योद्घाटन (सर्ग ७४) भी ठीक ही है। वाल्मीकिरामायण पश्चिमो- त्तरीय पाठ (६।२७।७-४१) के अनुसार नारद द्वारा राम को उनके नारायणत्व का स्मरण दिलाकर गरुड़ को बुलाने का परामर्श देना तथा वाल्मीकिरामायण (गो० पा० ६।६० पश्चिमो० पा० ६।४१) के अनुसार कुम्भकर्ण द्वारा यह कहा जाना कि नारद ने मुझे विष्णु अवतार द्वारा रावण-वध की योजना बतायी थी और दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार नारद के द्वारा प्रेषित रावण श्वेतद्वीप जाकर वहाँ की स्त्रियों द्वारा पराजित होता है इत्यादि सभी नारद- सम्बन्धी घटनाएँ ऋषि-स्वरूप के अनुरूप तथा प्रामाणिक एवं पुराणों के संगत भी हैं। बुल्के भारतीय शास्त्रों एवं पुराणों से अपरिचित हैं। इसी लिए उन्हें विविध कार्यों में नारद का हस्तक्षेप अस्वाभाविक्स प्रतीत होता है। परन्तु भारतीय दृष्टिकोण से नारद वसिष्ठ के समान ही एक महान् आधिकारिक पुरुष हैं। जगत्कल्याणार्थ विविध क्षेत्रों में इसी लिए उनकी प्रख्याति उपलब्ध होती है। अतएव वे वाल्मीकि के हृदयपरिवर्त्तन के भी कारण बनते हैं। जयन्त को राम के पास भेजना सन्त-हृदय के अनुकूल ही था। “नारद देखा विकल जयंता । लागि दया कोमलचित्त संता ॥” (रा० मा० ३।१।५) नारद द्वारा रावण को सीता-हरण के लिए उकसाना भी देव-कार्य के लिए उपयोगी था। श्रीमद्भागवत में भी कंस को कृष्ण-जन्म का भेद बतलाकर नारद ने उसे मृत्यु की ओर बढ़ने की ही प्रेरणा दी है। अतएव तुलसीदास ने उन्हें एक आदर्श सन्त और रामभक्त के रूप में ही चित्रित किया है और वे बार-बार अयोध्या आया करते थे। “बार-बार नारद मुनि आवहिं । चरित पुनीत राम कर गावहिं ॥” (रा० मा० ७।४१।२) अतः बुल्के का यह निष्कर्ष भी अशुद्ध है कि "प्रामाणिक रामायण में भले ही नारद का नाम तक न आया हो, किन्तु परवर्ती कथाओं में हमें पग-पग पर नारद का दर्शन होता है", क्योंकि वस्तुतः प्रामाणिक रामायण का सूत्रपात ही नारद के द्वारा ही होता है। इसी लिए उसका प्रसिद्ध नाम ही मूलरामायण है। राम का बाल-चरित ३७५ वें अनुच्छेद में बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ के अर्वाचीन प्रक्षेप के अनुसार राम तथा उनके भाइयों की जन्मतिथि चैत्र शुक्ल नवमी बतायी गयी है", परन्तु क्या वे अपनी तथाकथित प्रामाणिक रामायण के अनुसार कोई तिथि बतला सकते हैं ? अथवा क्या प्रामाणिक रामायण के राम का जन्म ही नहीं हुआ ? सामान्य चरितनायक की भी जन्मतिथि का वर्णन आवश्यक होता है तब क्या महर्षि वाल्मीकि जिन राम का विस्तृत चरित्र वर्णन करने जा रहे हैं, उनके जन्म और जन्मकाल का वर्णन न करते, यह संभव है। वस्तुतः बुल्के भ्रान्ति एवं दुरभिसन्धि से ही रामजन्म के काल-वर्णन को प्रक्षेप कहते हैं। अतः वाल्मीकिरामायण ( १।१८।८-१५) श्लोकों में राम एवं उनके भाइयों के जन्म का वर्णन है और उन श्लोकों पर सभी टीकाकारों ने टीकाएँ की हैं। वे टीकाकार भी प्रामाणिक ही हैं। अध्यात्मरामायण ( १।३), पद्मपुराण (उत्तरखण्ड अ० २६९), कृत्तिवासीय रामायण (१।४२), रामचरितमानस (१।१९१), भावार्थरामायण आदि में वही राम आदि के जन्म का समय वर्णित है। राम-जन्म के समय अलौकिक घटनाओं का होना भी स्वाभाविक ही है। अतएव पउमचरियं के अनुसार भी राम की माता ने सिंह, सूर्य और चन्द्रमा को देखा था एवं सुमित्रा ने कमळधारिणी लक्ष्मी को देखा था। कालिदास ने रघुवंश (१०।६०-६४) में लिखा है कि रामादि के जन्म के पूर्व दशरथ की रानियों को ऐसे स्वप्न दिखाई देते थे कि कमल, खड्ग, गदा, धनुष और चक्र लिए कोई बौना-सा पुरुष हमारी रक्षा कर रहा है; गरुड़ हमें आकाश में उड़ा- कर ले जा रहे हैं, लक्ष्मी हाथ में कमल का पङ्खा लेकर हमारी सेवा कर रही हैं एवं सप्तर्षिगण वेदपाठ करते हुए