भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 507

४३० रामायणमीमांसा त्रयोदश हमारी उपासना कर रहे हैं। अपनी रानियों से इन स्वप्नों को सुनकर दशरथ प्रसन्न हुए और समझ गये कि मैं जगद्गुरु का पिता बनने जा रहा हूँ । बुल्के का यह कहना कि कालिदास ने पउमचरियं से प्रभावित होकर ऐसा लिखा है अशुद्ध है, क्योंकि महाकवि कालिदास विक्रम की सभा के विद्वान् थे । वे पउमचरियं के निर्माण से प्राचीनकालिक हैं। दूसरे वे वैदिक विद्वान् थे । वे वेद, रामायण, महाभारत, पुराणों और उपपुराणों के आधार पर ही रघुवंश महाकाव्य लिखने में प्रवृत्त हुए थे । वेद, ईश्वर तथा वैदिक धर्म-कर्मविरोधी जैनों और बौद्धों का अनुसरण करना उन्हें कदापि अभीष्ट नहीं था । महाकवि के अनुसार बालक के तेज से सूतिका-गृह के दीपकों की ज्योति मन्द पड़ गयी तथा उस समय संसार के सारे दोष भाग गये, चारों और गुण ही गुण फैल गये । मानो भगवान् विष्णु का अनुसरण करता हुआ स्वर्ग भी पृथ्वी पर उतर आया हो— “अन्वगादिव हि स्वर्गो गां गतं पुरुषोत्तमम्” ( रघुवंश १०।७२ ) । उसी समय लङ्का में अपशकुन होने लगे । रावण के मुकुटों से कुछ मणियाँ पृथिवी पर गिर पड़ीं मानो राक्षसों की लक्ष्मी अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहा रही हो । ठीक ही है राम परब्रह्म थे, ज्योतियों के भी ज्योति थे—‘ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः ।", "सूर्यास्यापि भवेत् सूर्यः ।" फिर उनके उदय होने पर दीपक आदि की ज्योतियों का मन्द पड़ जाना उचित ही था । जैसे सूर्य के उदय से तमिस्रा रात्रि एवं उसके दोष भाग जाते हैं वैसे ही सकलगुणधाम राम के प्राकट्य से दोषों का पलायन करना भी उचित ही था । देवताओं की सौभाग्यलक्ष्मी के प्रकट होने पर रावणादि की सौभाग्यलक्ष्मी का अश्रुनिर्मोचन भी ठीक ही था । कृत्तिवासीय रामायण के अनुसार रावण का मुकुट भूमि पर गिर पड़ा । आकाशवाणी से रावण को यह विदित हो गया कि विष्णु का अवतार हो गया है और रावण ने उन्हें मारने के लिए शुक और सारण को भेजा । वे शिशु को प्रणाम करते हैं ओर भक्ति का वरदान पाकर लङ्का लौट जाते हैं । मूलप्रोक्त सामान्य के अविरुद्ध विशेष को स्वीकार करने में कोई बाधा न होने से ऐसे अन्य अंश भी मान्य हो हैं । अध्यात्मरामायण के अनुसार कौशल्या राम को विष्णु के ही रूप में देखती हैं— “नीलोत्पलदलश्यामः पीतवासाश्चतुर्भुजः ।” और उनकी स्तुति करती है इसपर राम अपनी माता को उनके पूर्वजन्म की तपस्या तथा वरप्राप्ति का स्मरण दिलाकर बालक का रूप धारण कर लेते हैं । बुल्के कहते हैं, "अध्यात्मरामायण में श्रीमद्भागवत के अनुकरण पर यह उल्लेख है। अध्यात्मरामायण के अनुसार अन्य ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख हुआ है", परन्तु उनका यह कथन भी अशुद्ध है । वस्तुतः “प्रीयमाने जगन्नाथं सर्वलोकनस्कृतम् । कौशल्याऽजनयद्रामं दिव्यलक्षणसंयुक्तम् ।।" ( वा० रा० १।१८।१० ) इस श्लोक के द्वारा भी यह सब सूचित ही किया गया है, इसलिए रामाभिरामी तिलक टीका में स्पष्ट कहा गया है— 'तेनादौ प्रादुर्भावसमये मायाविराड्रूपस्य दर्शनमेव ततस्तद्रूपदर्शनविस्मयात्तया नमस्कृतः सन्मायया बालभावं दधाविति सूचितम् ।" अर्थात् 'जगन्नाथं सर्वलोकनस्कृतम्' इससे ही यह सूचित होता है कि श्रीराम जगन्नाथ हैं, सर्वलोकनस्कृत हैं । कौशल्या ने विराट्रूप में उन्हें देखा और नमस्कार किया एवं प्रार्थना की कि आप शिशुरूप में ही प्रकट हों । इसपर राम बालकरूप में प्रकट हुए । इसी सूचित अर्थ का पद्मपुराण ( उत्तरखण्ड- २६९।८० ) में वर्णन है । पद्मपुराण भी आर्ष ग्रन्थ ही है । अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, रामचरितमानस, तत्त्वसंग्रहरामायण आदि में सब ने इन्हीं आर्ष प्रमाणों पर वैसा उल्लेख किया है । रामचरितमानस के अनुसार काकभुशुण्डि और शिव दोनों मनुष्य का रूप धारण कर रामजन्म-महोत्सव के समय अयोध्या आये थे, यह ठीक ही