रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ४३१ है। शिव, भुशुण्डि, याज्ञवल्क्य तथा भरद्वाज की परम्परा के अनुसार ही रामचरित का आविर्भाव हुआ है। कृष्ण भगवान् ने विराट् रूप अर्जुन को दिखलाया था (गी० अ० ११) । यशोदा को कृष्ण ने अपने मुख में ब्रह्माण्ड दिखाया था, रामकथाओं में भी वैसा उल्लेख है। बुल्के इसे भी अनुकरण और प्रक्षिप्त मानते हैं। इन सब बातों का एक ही मूल कारण है कि वे पद्मपुराण आदि को आधुनिक और काल्पनिक मानते हैं; परन्तु यह उनका नितान्त भ्रम है। रामलिङ्गामृत और रामचरितमानस में ही नहीं पद्मपुराण (उत्तरखण्ड १६९।८) के अनुसार भी राम ने अपने को विष्णुरूप में प्रकट करते हुए अपने विश्वरूप का भी दर्शन कराया था; अतएव नानापुराणनिगमागमानुगामी तुलसी- दास ने भी उसका उल्लेख किया है— "लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुज चारी।" (रा० मा० १।१९१।१) "दिखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड । रोम रोम प्रति राजहि कोटि-कोटि ब्रह्मांड ।।" (रा० मा० १।२०१) इसी तरह परशुराम, हनुमान् तथा भुशुण्डि को भी भगवान् का दिव्य रूप दिखाना सङ्गत है। भगवान् राम की बाल-लीला या अन्य लीलाओं पर कृष्ण-लीलाओं का प्रभाव मानने का अर्थ यह होता है कि वैसी वस्तुस्थिति नहीं है, किन्तु भक्तों ने वैसी कल्पना कर ली है, परन्तु यह अनुकरणशील (नकलची) कवियों के सम्बन्ध में भले ही कहा जा सके, किन्तु व्यासादि कवियों तथा तुलसीदासादि सन्तों के सम्बन्ध में ऐसा कहना साहसपूर्ण पाप ही है। धीरोदात्त राम में भी अवस्थानुरूप चापल्य संभव ही है। राक्षसों का आक्रमण भी अस्वाभाविक नहीं है, अतः संहिताओं में वैसा वर्णन स्वतन्त्र ही समझना चाहिये। किंबहुना बहुत सी बातें तो प्राकृत बालकों में भी कृष्ण जैसी ही मिलती है "बबन्ध प्राकृतं यथा।" फिर, राम में वैसी बात न हुई होगी यह कैसे कहा जा सकता है। ३७७ वें अनु० में वाल्मीकिरामायण में वसिष्ठ द्वारा नामकरण के अवसर पर राम तथा लक्ष्मण के विषय में कहा गया है— "रामस्य लोकरामस्य" (वा० रा० १।१८।२९) लोक को रमण करानेवाले राम हैं। "लक्ष्मणो लक्ष्मिवर्धनः" (वा० रा० १।१८।२८) "लक्ष्मणो लक्ष्मिसंपन्नः" (वा० रा० १।१८।३०)। लक्ष्मीवर्धन या लक्ष्मीसम्पन्न ही लक्ष्मण हुए हैं। अध्यात्मरामायण में भरत और शत्रुघ्न के भी सम्बन्ध में लिखकर न्यूनता की पूर्ति ही की गयी है— "रमणाद्राम इत्यपि । भरणाद्भरतो नाम लक्ष्मणं लक्षणान्वितम् । शत्रुघ्नं शत्रुहन्तारमेवं गुरुरभाषत ।। (अध्या० रा० १।३।४०,४१) पद्मपुराण में त्रिभुवनाभिरामता राम शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त कहा गया गया है और रूपशौर्यादि लक्ष्मी की योग्यता को लक्ष्मण शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त कहा गया है। दूसरे भाइयों के सम्बन्ध में भी कहा गया है— "भवं भारात्तारयतीति भरतः । शत्रून् हन्तीति शत्रुघ्नः ।।" (पद्मपु० पातालखं० ११२।३३,३४) । अर्थात् संसार को भार से तारनेवाले भरत हैं और शत्रुहनन करनेवाले शत्रुघ्न हैं। पद्मपुराण (उ० खं० अ० २६९) में वसिष्ठ द्वारा राम का जातकर्म सम्पन्न होता है। केवल राम, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के नाम का कारण बताया गया है। "श्रियः कमलवासिन्या रमणोऽयं महाप्रभुः । तस्माच्छ्रीराम इत्यस्य नाम सिद्धं पुरातनम् ॥७४॥"