रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३२ रामायणमीमांसा त्रयोदश कमलवासिनी श्री के यह रमण ( पति ) हैं अतएव श्रीराम इनका पुरातन नाम है। लक्ष्मण को 'शुभलक्षण' और शत्रुघ्न को देवशत्रुतापक कहा गया है। बुल्के को इनमें परस्पर विरोध दिखता है; परन्तु तुलसीदास तो सबका समन्वय और सार संकलन करते हुए कहते हैं— “सो सुखधाम राम अस नामा । अखिल लोक दायक विश्रामा ॥ विश्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई ॥ जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन वेद प्रकासा ॥” ( रा० मा० १।१९६।३,४) । “लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार । गुरु वसिष्ठ तेहि राखा लछिमन नाम उदार ॥” ( रा० मा० १।१९७ ) । बुल्के ३९७ वें अनु० में कहते हैं “अध्यात्मरामायण में राम की नटखटी, माखनचोरी, बरतनों का फोड़ना आदि स्पष्टतः भागवतपुराण पर निर्भर है,” परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि बालस्वभावसुलभ ऐसी अनेक लीलाएँ राम में भी संभव ही हैं। ईसा की बहुत सी घटनाएँ बुद्ध जैसी हैं तो क्या बुल्के यह मानते हैं कि वे सब बुद्धचरित्र पर ही निर्भर हैं ? इसी तरह पद्मपुराण ( पातालखण्ड ११२।३९-४६ ) के अनुसार एक ब्रह्मराक्षस वात्या का रूप धारण कर आता है और राम को गिरा कर मूच्छित कर देता है। वसिष्ठ मन्त्र पढ़कर राक्षस को शापमुक्त करते हैं। ब्रह्मराक्षस बतलाता है कि मैं पूर्वजन्म में वेदगर्वित ब्राह्मण था । परधन हथियाने के कारण ब्रह्मराक्षस बन गया। पद्मपुराण ( गौड़ीय पातालखण्ड अ० १५ ) के अनुसार बालक राम एक पुष्वनिर्मित धनुष से एक राक्षस को, जो मृग के रूप में आया था, मार डालते हैं। भुशुण्डिरामायण में भी रावण द्वारा राम को मारने के लिए भेजे गये अनेक राक्षसों को राम मार डालते हैं। दशरथ राम को गुप्त स्थान पर भेज देते हैं। सरयूपार गोपप्रदेश में गोपेन्द्र सुखित एवं उनकी स्त्री माङ्गल्या राम का पालन-पोषण करते हैं। कृत्तिवासरामायण में अनेक राक्षस रामभक्त बन जाते हैं। बुल्के की भ्रान्त दृष्टि में यह सब भागवत या कृष्ण-कथा का ही प्रभाव है, परन्तु यही बात वे ईसा के सम्बन्ध में मानने को तैयार न होंगे। भुशुण्डि ३८१ वें अनु० में भुशुण्डि के सम्बन्ध में बुल्के योगवासिष्ठ के अनुसार यह तो मानते हैं कि पिता के कहने से वे सुमेरु पर्वत पर निर्विकार एवं चिरजीवी होकर रहे (निर्वा० प्रकरण १४।२४ ) । परन्तु वे कहते हैं वहां उनके पूर्वजन्म की कथा तथा रामभक्ति का उल्लेख नहीं है। वस्तुतः यह कहना बुल्के का ठीक नहीं, क्योंकि यह आवश्यक नहीं होता कि किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में एक ही स्थान में सब कथाएँ वर्णित की जायँ । रामचरितमानस में अपनी परम्परा के अनुसार वे पूर्व काल में अयोध्यावासी शूद्र थे । गुरु का सत्कार न करने से वह शिव-शाप से सर्प हो गये । बाद में वह गुरु एवं शिव की कृपा से सगुण राम के उपासक बन गये । लोमश ऋषि आदि के शाप से उन्हें काक-योनि की प्राप्ति हुई । इतना ही क्यों काकभुशुण्डि ने शिवजी के सङ्ग राम-जन्म के उत्सव में अयोध्या जाकर भगवान् की लीलाओं का रसास्वादन किया । सत्योपाख्यान में ही नहीं रामचरितमानस में भी राम को शष्कुली खाते देखकर काकभुशुण्डि को राम के नारायण होने में सन्देह होता है और वे परीक्षार्थ राम के हाथ से शष्कुली लेकर भागते हैं, परन्तु राम की भुजा उनका पीछा करती है । रामचरितमानस के अनुसार वे ब्रह्माण्ड के ससावरण का भी भेद कर भागे परन्तु वे राम की भुजा को अपने पास ही देखते रहे ।