भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय बालकाण्ड ४३३ “सप्तावरन भेद करि जहां लगे गति मोरि । गयउ तहां प्रभु निरखि व्याकुल भयउ बहोरि ॥” (रा० मा० ७।७९ ) भयभीत होकर उन्होंने आँखें बन्द कर लीं और अपने को अयोध्या में पाया । राम उनके सामने हँसते हुए खड़े रहे । भुशुण्डि ने मुख में प्रविष्ट होकर भीतर बहुत से ब्रह्माण्ड देखे । इस तरह उनका मोह दूर हुआ । उक्त कथा चतुविंशत्साहस्रीसंहितारूप रामायण में यद्यपि नहीं मिलती है तो भी इसे मिथ्या या कल्पनामात्र नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह विशेष कथा सामान्य कथा से अविरुद्ध ही है। इसी प्रकार बालक राम से हनुमान् की मित्रता का उल्लेख भी रामचरितमानस के क्षेपकों तथा विश्रामसागर के २० वें संस्करण सन् १९५९ ई० पृ० ४१८ में वर्णित है । शिवजी मदारी बनकर हनुमान् बन्दर को लेकर अयोध्या आते हैं । राम बन्दर को देखकर उसपर मुग्ध हो जाते हैं । मदारी बन्दर को अयोध्या में ही छोड़ जाता है । हनुमान् राम के साथ रहकर उनकी सेवा और मनोरञ्जन करते हैं और बाद में राम उन्हें किष्किन्धा भेज देते हैं । वस्तुतः सनातनधर्मी आस्तिकों की प्रामाणिक दृष्टि के अनुसार ईश्वर अनादि, अनन्त तथा सर्वशक्तिमान् है । उसी का अवतार श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि के रूप में होता है । ईश्वर की सभी लीलाएँ नित्य हैं । उपासकों को उन लीलाओं का उपासना के प्रभाव से साक्षात्कार होता है । उसी दृष्टि से कई अपूर्व लीलाओं की भी अनुभूति होती है । इसी दृष्टि से श्रीभागवत में अनुक्त भी अनेक लीलाओं का वर्णन सूरदास, हरिदास, हरिवंश, ध्रुवदास आदि भक्तों ने किया है । इसी तरह रामसम्बन्धी भी अनेक लीलाओं का वर्णन समझना चाहिये । प्रारम्भिक कृत्य वाल्मीकिरामायण ( १।१८।३१ ) के अनुसार राम मृगया खेलने जाते थे तो लक्ष्मण धनुष लेकर उनके साथ जाते थे— “यदा हि हयमारूढो मृगयां याति राघवः । अथैनं पृष्ठतोऽभ्येति सधनुः परिपालयन् ॥” ( वा० रा० १।१८।३१, ३२ ) इस सामान्य वर्णन का विशेष अध्यात्मरामायण आदि से समझना चाहिये । अध्यात्मरामायण ( १।३। ६२, ६३ ) के अनुसार राम और लक्ष्मण नित्य प्रति दुष्ट पशुओं का शिकार करते थे । मानस ने यह भी विशेष बताया कि— “जो मृग राम बान के मारे । ते तनु तजि सुर लोक सिधारे ॥” ( रा० मा० १।२०४।२ ) । सत्योपाख्यान के अनुसार वे पशु दिव्य रूप धारण कर अपना परिचय भी देते थे । इस तरह राम का आखेट भी मुक्तिप्रद कहा गया है । “निर्वाणदायक क्रोध जाकर” ( रा० मा० ३।२५ छन्द ) । “क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः” ( भागवत ? ) । सत्योपाख्यान के अनुसार किसी दिन राम एक नराकृति वल्मीक देखते हैं । उनके स्पर्शमात्र से वह दिव्य देह धारण कर अपना परिचय देता है कि वह एक किरात था । ऋषियों के उपदेश से तपस्या करने लगा । वह रामावतार का रहस्य जानता है तथा राम द्वारा रावण-वध की भविष्यवाणी करता है । अन्त में राम उसे वैकुण्ठवास का वरदान देते हैं ( अ० ४२ ) । कृत्तिवासरामायण के अनुसार मृगया में ही राम ने मारीच को देखा था। ब्रह्मा ने मृगया के कारण राम की थकावट मिटाने के लिए इन्द्र को इसलिए भेजा कि वे उस मृणाल में अमृत भर दें, जिसे राम और लक्ष्मण दोनों खानेवाले हैं। वृहत्कौशलखण्ड के अनुसार दशरथ ने राम को शम्बरासुर ५५