भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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के वधार्थ भेजा था ( अ० ४) । पउमचरियं के अनुसार राम-लक्ष्मण ने उन म्लेच्छों को हरा दिया था जो जनक के राज्य पर आक्रमण की तैयारियां कर रहे थे ( पर्व २७) । वाल्मीकिरामायण में गुह को राम का सखा कहा गया है— "तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसमः सखा ।" ( २।५०।३३ ) । उसी का विशेष विवरण सत्योपाख्यान में किया गया है । वनवास से पूर्व राम गुह से मृगया की शिक्षा प्राप्त करते हैं ( पूर्वार्ध अ० ४३ ) । अन्यत्र इसका और भी विस्तृत वर्णन है । कृत्तिवासरामायण के अनुसार किसी दिन दशरथ अपने पुत्रों के साथ गङ्गास्नान करने गये थे । वहाँ गुहक अपने तीन करोड़ सैनिकों द्वारा दशरथ की सेना को रोक लेता है तथा राम को देखने की इच्छा प्रकट करता है, पर दशरथ राम को रथ में छिपा कर उससे युद्ध करके उसे हराकर और बाँधकर रथपर रखवा देते हैं । इसपर गुहक पैर के अंगूठे से बाण मारता है । राम यह कौतुक देखने आते हैं। वह राम का दर्शन कर अपने पूर्वजन्म की कथा सुनाता है कि मैं पूर्वजन्म में वसिष्ठ-पुत्र वामदेव था । दशरथ अन्ध मुनि के पुत्रवध का प्रायश्चित्त पूछने गये थे । उस दिन वसिष्ठ घर पर नहीं थे । मैंने ही दशरथ को तीन बार राम-नाम जपने का परामर्श दिया था । पिताजी के आने पर जब मैंने वह प्रसङ्ग सुनाया तब उन्होंने क्रुद्ध होकर मुझे चण्डाल बन जाने का शाप दिया । उन्होंने कहा एक ही बार के रामनाम के उच्चारण से सब पाप कट जाते हैं, फिर तीन बार रामनाम जपने का उपदेश तुमने क्यों किया ? वसिष्ठ ने मुझसे कहा जब दशरथ के घर राम-जन्म होगा तब उनका चरण-स्पर्श कर तुम मुक्त होओगे । राम ने दशरथ की अनुमति से उसे बन्धनमुक्त किया और उससे मैत्री की (१।५३) । असमीया बालकाण्ड के अनुसार गङ्गास्नान के समय वहीं गुहक भी स्नान करने का साहस करता है । अनुचरों ने उसे पकड़कर राजा के सम्मुख उपस्थित किया । राम भी वहाँ थे । राम का दर्शन करने पर उसे अपने पूर्वजन्म का स्मरण हो आया । उसने कहा मैं ब्राह्मण था, पर गङ्गा की उपेक्षा करने के कारण गङ्गा ने मुझे चण्डाल बनने का शाप दिया । बाद में कहा राम का दर्शन करके मुक्त होओगे । ये सब कथाएँ भी शिष्टसंमत हैं एवं सामान्य से अविरुद्ध हैं, अतः आदरणीय हैं । विश्वामित्र के आगमन के पूर्व राम की तीर्थयात्राओं का वर्णन योगवासिष्ठ वैराग्यप्रकरण ३ में वर्णित है । वह भावार्थरामायण ( १।७ ) से मिलता है । सत्योपाख्यान में विवाह के बाद तीर्थयात्राओं का उल्लेख है, अन्य रचनाओं में रावण-वध के बाद तीर्थयात्राओं का वर्णन मिलता है । परन्तु इन वर्णनों में कोई विरोध नहीं है । तीर्थ-यात्रा तीन बार भी हो ही सकती है । वैराग्य-काल में राम ने वैयक्तिक रूप से तीर्थयात्रा की, विवाह के बाद सपत्नीक राम ने तीर्थयात्रा की एवं रावण-वध के अनन्तर प्रायश्चित्त के रूप में तीर्थ-यात्रा की । इनमें बुल्के जी को किस दर्पण में विरोध दिखा । सेरीराम के अनुसार राम और लक्ष्मण विवाह के पूर्व तीन महीने नीलपूर्व नामक मुनि के यहाँ रहकर तपस्या करते हैं तथा उनसे जादू सीखते हैं । नीलपूर्व उनको एक धनुष तथा नागस्कन्द पतीक देव नामक तपस्वी उनको तीन बाण प्रदान करते हैं । योगवासिष्ठ के राम १६ वर्ष की अवस्था में विरक्त होकर वसिष्ठ के उपदेशानुसार कर्तव्य-पालन में तत्पर होते हैं । भावार्थरामायण में भी इसका वर्णन है । रामलिङ्गामृत के अनुसार तथा बृहत्कोशलखण्ड के अनुसार बाल-क्रीडा के अनन्तर ही उनकी रास-क्रीडा भी प्रारम्भ होती है । बुल्के इसे कृष्णलीला का अनुकरणमात्र मानते हैं' । यह उनका भ्रम है, क्योंकि राम को ईश्वर का अवतार माननेवाले भक्त अपनी भावना के अनुसार उनकी रास-लीला का भी अनुभव कर ही सकते हैं । वाल्मीकिरामायण ( १।१९ ) के अनुसार विश्वामित्र मारीच तथा सुबाहु के उपद्रवों से यज्ञरक्षार्थ राम की सहायता माँगने आते हैं । सत्योपाख्यान के अनुसार वे शिव की प्रेरणा से आते हैं । कृत्तिवासरामायण के अनुसार राक्षसों के उत्पात से मिथिलाप्रदेश को यज्ञहीन देखकर जनक विश्वामित्र को प्रेषित करते हैं । रामकेर्ति के अनुसार काकनासुर के वधार्थ विश्वामित्र राम को लेने के लिए अयोध्या आते हैं । रामकियेन के अनुसार सुबाहु और मारीच दोनों काकनासुर के पुत्र माने जाते हैं ।