रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 512, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ४३५ बुल्के कहते हैं, "कृत्तिवासरामायण के अनुसार दशरथ ने राम और लक्ष्मण के स्थान पर भरत और शत्रुघ्न को विश्वामित्र के साथ भेज दिया था।" सरयूतट पर जाकर विश्वामित्र ने राजकुमारों से कहा- "यहाँ से दो पथ हैं। पहले पथ से जाने में तीन दिन लगेंगे और दूसरे पथ से तीसरे पहर पहुँच जायेंगे। किन्तु इस पथ पर ताड़का राक्षसी का भय है।" भरत ने कहा- "दूसरे पथ से हमें क्या प्रयोजन है।" यह सुनकर विश्वामित्र समझ गये कि दशरथ ने हमें धोखा दिया है और वे अयोध्या जाकर राम को माँग लाते हैं। यह कथा पूर्व भारत में उत्पन्न होकर हिन्दोनेशिया तक फैल गयी। एक आदिवासी कथा के अनुसार विश्वामित्र का प्रस्ताव था कि पहला मार्ग सुगम है और सुन्दर नगर की ओर ले जाता है; दूसरा भयङ्कर वन की ओर ले जाता है जहाँ व्याघ्र, ऋक्ष आदि हिंसक पशु रहते हैं। वस्तुतः दशरथ का राम में प्रेमातिशय दिखाने के उद्देश्य से अन्य कल्पना अर्थवादरूप ही है। उसका स्वार्थ में तात्पर्य न समझकर प्रेम-स्तुति में ही तात्पर्य समझना चाहिये। सेरीराम के अनुसार महारीसी कली सीता के पोषक पिता (पोष्य नहीं) दशरथ से निवेदन करते हैं कि उनके पुत्र स्वयंवर में भाग लें। दशरथ भरत और शत्रुघ्न को भेजते हैं। कली उनसे १७।२०।२५ और ४० दिनों में तय होने वाले मार्गों में से एक मार्ग चुनने को कहते हैं। वे अन्तिम मार्ग को निरापद तथा अन्य मार्गों में क्रमशः राक्षसी, गैंडे और नागिन का भय बताते हैं। भरत और शत्रुघ्न, ४० दिन का लम्बा मार्ग चुनने के कारण, अयोग्य ठहरते हैं। कली (विश्वामित्र) लौटकर दूसरी बार राम और लक्ष्मण को साथ में ले जाते हैं। वस्तुतः भरत और शत्रुघ्न विष्णु के ही अंश और शङ्ख और चक्र के अवतार हैं। उनकी अयोग्यता की बात अप्रामाणिक है। निरापद मार्ग चुनना बुद्धिमानी है। वह अयोग्यता का परिचायक नहीं कहा जा सकता, अतः उक्त कल्पना दशरथ के सर्वाधिक रामप्रेम वर्णन में ही पर्यवसित है। ३८९ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "वाल्मीकिरामायण में विश्वामित्र के साथ राम तथा लक्ष्मण के प्रस्थान से लेकर मिथिला पहुँचने तक का वृत्तान्त ३४ सर्गों में वर्णित है। इसकी अधिकांश सामग्री पौराणिक कथाएँ हैं, जिनका प्रायः उस प्रदेश से सम्बन्ध है, जिसे विश्वामित्र पार कर रहे हैं। यात्रा के पूर्वार्ध में काम-दहन (सर्ग २३), ताड़का (सर्ग २४) तथा वामनावतार (सर्ग २९) की कथाएँ और मिथिला के रास्ते में विश्वामित्रवंश, गङ्गा का स्वर्गा- रोहण, शिव-उमाविवाह, गङ्गावतरण, समुद्रमथन तथा अहल्या की कथा (सर्ग ३१-४८) सुनाते हैं। मिथिला में शतानन्द ने विश्वामित्र के ब्राह्मण बनने का वृत्तान्त (सर्ग ५९-६५) सुनाया है। इन कथाओं में केवल अहल्या की कथा का राम से सीधा सम्बन्ध है, अतः यह सब विकास या प्रक्षेप ही है।" पर बुल्के की उपर्युक्त दलील कितनी लचर है, इसे कोई भी समझ सकता है। विश्वामित्र चक्रवर्ती नरेश दशरथ के प्रिय पुत्र राम तथा लक्ष्मण को अपने यज्ञ के रक्षार्थ लाये हैं। पदयात्रा करनी है। तो क्या यह समझना चाहिए कि वे सब गुमसुम मौन ही चलते रहे ? परन्तु यह समझना असङ्गत है। यहाँ तो उचित यही था कि वे जिस-जिस प्रदेश से होकर जा रहे थे उस-उस प्रदेश के सम्बन्ध में राम ने प्रश्न किया होगा विश्वामित्र ने उनका मन बहलाव एवं ऐतिहासिक तथा भौगोलिक ज्ञान सिखाने की दृष्टि से तत्तत्सम्बन्धित कथाओं का वर्णन किया होगा। शास्त्रीय दृष्टि से, स्मृति का विषय होकर उपेक्षा के अनर्ह (अयोग्य) होना ही सङ्गति है। "स्मृतिविषयत्वे सत्युपेक्षानर्हत्वं सङ्गतित्वम्" इस तरह तत्तत् प्रदेशों से सम्बन्धित काम-दहन तथा ताटका की कथाएँ अत्यन्त सङ्गत हैं। ताटका-वध के सम्बन्ध से भी ताटका का वर्णन सङ्गत है। २७ वें सर्ग में ताटका के वध से प्रसन्न होकर विश्वामित्र राम को नाना प्रकार के शस्त्रास्त्र प्रदान करते हैं। २८ वें सर्ग में उन शस्त्रास्त्रों का राम के वशवर्ती होने का वर्णन है। २९ वें सर्ग में स्वयं विश्वामित्र जिस आश्रम में रहते हैं, जहाँ यज्ञ करते हैं, उसकी कथा के प्रसङ्ग से वामन-कथा का वर्णन स्वाभाविक ही है। वे अन्त में यह भी कहते हैं कि वामन की भक्ति से ही मैं उनके इस आश्रम में रहता हूँ। यह आश्रम जैसा मेरा हैं वैसा ही आप का भी है, क्योंकि आप ही तो वामनरूपधारी विष्णु हैं, यह ध्वन्यर्थ है—