रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ रामायणमीमांसा त्रयोदश "तदाश्रमपदं तात तवाप्येतद् यथा मम ।" (वा० रा० १९।२४) । "तदेतदाश्रमपदं यथा मम स्वभूतं तथा तवापि विष्ण्ववतारत्वादिति गूढाभिसन्धिः"-तिलक। यज्ञपूति के बाद ३१वें सर्ग में राम विश्वामित्र के साथ मिथिला के मार्ग में पुनः प्रश्न करते हैं। तब विश्वामित्र कुशवंश का वर्णन करते हैं सर्ग ३३ तक । इसके पश्चात् शोण-गङ्गा-समागम स्थल पर जाकर किसी भी आस्तिक को गङ्गा के सम्बन्ध में जिज्ञासा हो सकती थी, फिर मर्यादा- पुरुषोत्तम राम को जिज्ञासा क्यों न होती ? अतः रामने प्रश्न किया, "भगवन्, त्रिपथगा नदी के सम्बन्ध में मैं सुनना चाहता हूँ। इसपर मुनि ने गङ्गा की कथा प्रारम्भ कर दी । गङ्गा का वर्णन सुनने पर भी संतुष्ट न होकर पुनः राम तथा लक्ष्मण दोनों ही प्रश्न करते हैं और विस्तार से पूछते हैं। गङ्गा तीन लोकों में जाकर त्रिपथगामिनी कैसे हुई इत्यादि प्रश्न पर प्रसङ्गानुसार उमा की कथा कहकर गङ्गा की कथा, कार्तिकेय की उत्पत्ति आदि का वर्णन किया । इसी प्रकार प्रसङ्गानुसार सगर की कथा का वर्णन भी संगत है। सङ्गति के छः भेद होते हैं- 'सप्रसङ्ग उपोद्घातो हेतुतावसरस्तथा । निर्वाहकैक्यकार्यैक्ये षोढा सङ्गतिरुच्यते ॥" प्रसङ्ग १, उपोद्घात २, हेतुता ३, अवसर ४, निर्वा- हैक्य ५, एककार्यत्व ६, ये छः प्रकार की सङ्गतियाँ होती हैं। इनमें से किसी भी सङ्गति के अनुसार वस्तु का निरूपण सङ्गत होता है। प्रसङ्गानुसार विशाला के राजवंशसम्बन्धी प्रश्न के अनुसार इन्द्र, सागरमन्थन, अमृतोत्पत्ति, दितिपुत्र मरुतों की उत्पत्ति आदि का वर्णन है। अहल्या-कथा को आप सङ्गत मानते ही हैं। अहल्यापुत्र शतानन्द ने विश्वामित्र से अपनी माता अहल्या के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के अनन्तर राम से कहा कि राम तुम धन्य हो जो तुम्हें महातेजा विश्वामित्र का संरक्षण प्राप्त है। इसी प्रसङ्ग में विश्वामित्र के वृत्तान्त का वर्णन सङ्गत ही है। वेदों में भी पुराणों का महत्त्व वर्णित है- "ऋचः सामानि च्छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाज्जज्ञिरे तस्माद् दिवि देवा दिवि श्रिताः ॥" अथर्ववेद के इस मन्त्र में कहा गया है कि ऋक्, साम और यजु के साथ पुराण भी उस उच्छिष्ट परमेश्वर से उत्पन्न हुए, अतः राम और विश्वामित्र के संवाद में पौराणिक कथाओं का वर्णन असङ्गत नहीं कहा जा सकता है। आश्चर्य है कि एक प्रामाणिक ग्रन्थ के अनेकों सर्गों को तोड़मरोड़ कर अपने मस्तिष्क के फितूरों के आधार पर प्रक्षेप कहने का साहस किया जाता है। महाकवि कालिदास तथा आनन्दवर्धनाचार्य जैसे महाविद्वान् बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड सहित समस्त रामायण को आदि कवि वाल्मीकि की कृति कहते हैं। फिर भी दुरभिसन्धिपूर्ण कुछ पाश्चात्यों के अनुयायी बुल्के दोनों काण्डों को प्रक्षेप कहते हैं। उसी प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में राम और विश्वामित्र के संवाद में अन्य कथाओं का वर्णन है यह तो प्रमाणसिद्ध है, परन्तु यह मिथ्या है कि राम ने प्रश्न नहीं किया तथा विश्वामित्र ने उक्त कथाओं का निरूपण नहीं किया। इसमें बुल्के के पास कोई प्रमाण है ? बला और अतिबला विद्या या जया और विजया विद्या की प्राप्ति का वर्णन ठीक ही है। असमिया बालकाण्ड (अ० २७) के अनुसार दशरथ किसी समय अपने चारों पुत्रों सहित भारद्वाज के आश्रम में गये थे। वहाँ राम ने स्वप्न में देखा कि इन्द्र ने उनका अभिषेक कर उन्हें मन्त्र सिखलाया और धनुष-बाण भी प्रदान किये। जागने पर राम ने अपने हाथ में धनुष-बाण देखे और मन्त्र का भी उच्चारण किया। विशेष कथा सामान्य कथा से अविरुद्ध होने से मान्य ही है। ताटका-वध, यज्ञ-रक्षण, सुबाहु आदि राक्षसों का वध और मानवास्त्र द्वारा मारीच के शतयोजन दूर प्रक्षेप की कथा के सम्बन्ध में विप्रतिपत्ति न होने पर भी बुल्के को ताटका की कथा में विकास दिखता है। वाल्मीकि- रामायण के अनुसार ताटका राम के बाणों से विद्ध होकर भूमि पर गिर कर मर जाती है, किन्तु अध्यात्मरामायण, पद्मपुराण (उ० खं० २६९।१२१) तथा रामचरितमानस के अनुसार ताटका दिव्य रूप धारण कर स्वर्ग के लिए प्रस्थान करती है, परन्तु यह विशेष प्रमाणसिद्ध हैं; अतः वाल्मीकिरामायण के सामान्य से अविरुद्ध होने से आदरणीय ही हैं। अन्य रामायणों के अनुसार तीन करोड़ राक्षसों, महाकाय गैंडों, सुनागिन, काकनासुर आदि के वध का वर्णन