रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरीक्षा में असफल होकर निवृत्त हो गये थे । तब राम आये और सफल हुए । वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड के ६६ वें सर्ग में जनक ने विश्वामित्र से कहा ही है । 'वीर्यशुल्का' सीता के लिए बहुत से राजा शिव-धनुष की परीक्षा में शामिल हुए, परन्तु कोई उसे उठाने या ग्रहण करने में भी सफल नहीं हुआ । तब परम कोप से राजाओं ने मिथिला घेर ली । देवताओं की सहायता से मैंने उनको पराजित कर दिया । यदि राम इस धनुष को चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा सीता कन्या राम को दूंगा । महानाटक में कहा गया है कि सभी सुरगण, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा महोरग किसी की भी सामर्थ्य इस धनुष के उठाने, चढ़ाने तथा हिलाने तक की नहीं हुई फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या थी— “नैतत् सुरगणाः सर्वे सासुरा न च राक्षसाः । गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः ॥ क्व गतिर्मानुषाणाञ्च धनुषोऽस्य प्रपूरणे । आरोपणे समायोगे वेपने तोलने तथा ॥” ९, १०॥ इससे स्पष्ट ही है कि धनुष की परीक्षा में अगणित राजा ही नहीं देवता, दानव आदि भी आये थे । महाभारत में संक्षेप के कारण ही धनुर्भङ्ग का उल्लेख नहीं हुआ । जैनों के उत्तरपुराण में जनक ही अपने यज्ञ के रक्षार्थ राम और लक्ष्मण को दशरथ से मांग कर लाते हैं और यज्ञरक्षा के पुरस्कारस्वरूप अपनी दत्तक पुत्री सीता का प्रदान करते हैं । जैनों द्वारा वाल्मीकिरामायण को ही विकृत करने का प्रयत्न किया है। तिब्बती रामायण में सीता कृषकों द्वारा पाली जाती है। उन्हीं के अनुरोध से राम ने अपनी तपस्या छोड़कर सीता के साथ ब्याह किया । खोतानी- रामायण के अनुसार राम और लक्ष्मण दोनों ही सीता से विवाह करते हैं । दशरथजातक में राम सहोदरी बहन सीता से विवाह करते हैं । कहना न होगा कि वर्णाश्रम तथा वेद-शास्त्र के विरोधी बौद्धों ने भी अपनी भावनाओं के अनुसार रामायण गढ़ने का प्रयास किया है, अतः वह वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध रामकथा का विकृत रूप ही है । उसका वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार जनक का कथन है कि देवताओं ने मेरे पूर्वज निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात को शिव-धनुष दिया था ( वा० रा० १।६६।८-१२ ) । परशुरामतेंजोभङ्ग के प्रसङ्ग में कहा गया है कि स्वयं शिव ने ही देवरात को धनुष दिया था, किन्तु अनसूया से सीता ने कहा था कि वरुण ने देवरात को धनुष दिया था ( वा० रा० २।११८ ) । अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा पद्मपुराण के अनुसार शिव ने उससे त्रिपुर को नष्ट किया था । सत्योपाख्यान ( उत्तरार्द्ध अ० २ ) तथा बृहत्कोशलखण्ड ( अ० ६ ) के अनुसार शिव ने स्वप्न में जनक को दर्शन देकर कहा था कि धनुर्भङ्ग करनेवाला ही सीता के साथ विवाह करे । अनेक राम-कथाओं में जनक ने ही उस धनुष को प्राप्त किया था । पद्मपुराण ( पातालखण्ड अ० ११२ ) के अनुसार जनक को चिन्ता थी कि राम के साथ सीता-विवाह कैसे निश्चित हो । वह शिव और पार्वती से प्रार्थना करते हैं । फलतः शिव उन्हें अजगव धनुष प्रदान कर कहते हैं कि उसे तोड़ने में राम ही समर्थ होंगे । कृत्तिवास- रामायण के अनुसार ब्रह्मा ने शिव से कहा था ऐसी युक्ति सोची जाय, जिससे सीता का विवाह राम से ही हो । इसपर शिव ने परशुराम को अपना धनुष देकर आदेश दिया कि मेरा यह धनुष जनक के घर में रख दो और जनक से कहना कि सीता के साथ वही विवाह करे जो इस धनुष को तोड़ सके । काश्मीरीरामायण के अनुसार शिव ने इस शर्त पर जनक को एक धनुष दिया कि जो इसे चढ़ा सके वही सीता से विवाह करे । सेरीराम के अनुसार देवताओं ने इस धनुष को किसी महर्षि की अस्थियों से बनाया था; शिव ने उसे ब्रह्मा को दिया एवं ब्रह्मा ने सीता