रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ४३९ के पिता को दिया । सेरतकाण्ड के अनुसार जनक के पास वह आकाश से गिरकर आया । रामकेत्ति के अनुसार सीता का अपूर्व सौन्दर्य देखकर जनक ने मन्त्रों द्वारा एक दिव्य धनुष की सृष्टि की थी और यह प्रण किया था कि जो इस धनुष को उठाने में समर्थ होगा उसी को मैं सीता प्रदान करूँगा ( सर्ग १ ) । आनन्दरामायण ( १।३।४७ ) तथा भावार्थरामायण ( १।१७ ) में कहा गया है कि जो शिव-धनुष जनक के पास है उसी धनुष से परशुराम ने २१ बार क्षत्रियों का नाश किया था । एक अन्य वृत्तान्त के अनुसार धनुष के साथ ही सीता यज्ञ की अग्नि से प्रकट हुई थी । आनन्दरामायण, भावार्थरामायण, बिहौरराम-कथा आदि के अनुसार सीता ने धनुष उठाकर उस जगह को लीपा था तब जनक ने यह प्रण किया कि जो इसे तोड़ेगा उसी से सीता का विवाह होगा । उसी से जनक ने सीता को लक्ष्मी जाना । भावार्थरामायण ( १।१७ ) के अनुसार परशुराम ने जनक के महल में उस धनुष से सीता को खेलते देखकर जनक को यह सुझाव दिया था कि जो धनुष-भङ्ग करने में समर्थ हो वही सीता का पति बने । जो भी हो, अनेक वर्णनों में विकृतियाँ हो सकती हैं। परन्तु आर्ष प्रमाणों में कल्पभेद या सामान्य-विशेष भाव से समन्वय किया जाना उचित है । नाटक, काव्य आदि में रसोत्पत्ति के लिए मूल कथा में कुछ हेरफेर करने की परिपाटी है ही; किन्तु सबकी दृष्टि से धनुर्भङ्ग और धनुष की असाधारणता स्पष्ट है । सीता-स्वयंवर के प्रसङ्ग में बहुत से राजाओं की धनुष तोड़ने या चढ़ाने में असफलता के पश्चात् उनका मिथिला पर आक्रमण कहा गया है । उसके बाद "सुदीर्घस्य तु कालस्य" बहुत दिनों बाद राम ने धनुष तोड़कर सीता से विवाह किया ( वा० रा० २।११८ ) । यहाँ बुल्के कहते हैं बाद की कथाओं में सीता-स्वयंवर तथा राजाओं के आक्रमण का राम से सम्बन्ध स्थापित हो गया । परन्तु यह कोई असम्भावित बात नहीं है । सुदीर्घ काल का अर्थ सौ दो सौ वर्ष न होकर आपेक्षिक महीना १५ दिन भी हो सकता है और राजाओं के सीता-प्राप्त्यर्थ धनुषपरीक्षण की प्रवृत्ति कुछ-कुछ चलती ही रही, इसलिए दोनों बातें सङ्गत हो जाती हैं । प्रथम अधिकाधिक राजा लोग एकत्रित हुए। तभी असफल होकर जनक पर आक्रमण किया । जब देवताओं से चतुरङ्ग बल पाकर जनक ने उन्हें पराजित कर दिया तब वैसी प्रवृत्ति धीमी पड़ गयी । राम के आगमन पर भी कुछ राजा या राजकुमार धनुष के परीक्षणार्थ आये होंगे । राम की सफलता देखकर ईर्ष्यावश राम पर आक्रमण की बात सोचते रहे होंगे । कल्पभेद से भी दोनों स्थितियों का समाधान कर लेना उचित है । पउमचरियं के अनुसार राम ने म्लेच्छों के विरुद्ध जनक की सहायता की थी, अतः पुरस्कारस्वरूप जनक ने उन्हें सीता-प्रदान किया । विवाह के पूर्व नारद सीता को देखने आते हैं । सीता भयभीत होकर छिप गयी, इसपर नारद को महल से निकाल दिया गया । नारद ने भामण्डल के उद्यान में सीता का चित्र बना दिया, जिसे देखकर भामण्डल उसपर अनुरक्त हो गया । उसकी विरहव्यथा देख उसके पालक पिता ने एक मायावी विद्याधर द्वारा जनक को अपने पास बुला लिया और भामण्डल से सीता के विवाह का अनुरोध किया । जनक ने उत्तर दिया कि मैंने राम को सीता देने की प्रतिज्ञा कर ली है । फिर उसके अनुरोध से जनक ने यह शर्त स्वीकार कर ली कि राम को पहले वज्रावर्त्त धनुष चढ़ाना होगा इसपर स्वयंवर का आयोजन हुआ । राम ने धनुष चढ़ा दिया । विभिन्न लेखक अपनी कृति में चमत्कार लाने के लिए बहुत से काल्पनिक अंशों को जोड़ देते हैं; परन्तु आर्ष ग्रन्थों में तो वस्तुस्थिति का ध्यान रखते हुए ही कृति में सौष्ठव लाने का प्रयास किया जाता है । नृसिंहपुराण ( अ० ४७ ), भागवतपुराण ( ९।१० ), अध्यात्मरामायण ( १।६।२४ ), कम्ब- रामायण, सूरसागर आदि के अनुसार अन्य राजाओं की उपस्थिति में स्वयंवर के समय राम धनुष उठाते हैं । पद्मपुराण ( पातालखण्ड ) के अनुसार नारद के अनुरोध पर सीता-स्वयंवर का आयोजन हुआ । दशरथ ने अपने पुत्रों के विवाहार्थ अपने दूतों को नाना देशों में भेजा था । एक ने शीघ्र ही लौटकर समाचार दिया कि विदेह की पुत्री वैदेही विवाहयोग्य है, इसपर वसिष्ठ को भेजा गया जो लग्न निश्चित कर अयोध्या लौटते हैं । अनन्तर विवाह- मङ्गल गाती हुई युवतियों आदि के साथ बरात मिथिला के लिए प्रस्थान करती है । जनक स्वागत कर उन्हें विदेह-