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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 517

४४० रामायणमीमांसा नगर के एक महल में ठहराते हैं। वहाँ नारद आते हैं और अगले दिन विवाह के लिए जनक द्वारा आमन्त्रित किये जाते हैं । नारद कहते हैं यह मुहूर्त ठीक नहीं है। नारद गर्ग आदि के साथ परामर्श कर दशरथ की अनुमति से स्वयं- वर में अन्य राजाओं को भी बुलाते हैं। उसी रात शिवजी से जनक अजगव धनुष प्राप्त करते हैं, जिसे राम को छोड़कर कोई भी उठाने में समर्थ नहीं होता (पद्मपु० पातालखण्ड १११।४९-९०) । नृसिंहपुराण, पद्मपुराण आदि अर्वाचीन नहीं, आर्ष ग्रन्थ हैं। उनका परस्पर समन्वय करना ही उचित है । किसी वस्तु की प्रशंसा के लिए अर्थवाद वेदों में भी होते हैं । अर्थवादों का स्वार्थ में तात्पर्य न होकर स्तुति में ही तात्पर्य होता है। सीता-राम के विवाह का उत्कर्ष वर्णन करने की दृष्टि से कुछ विरुद्ध भी अर्थवाद हो सकते हैं। महावीरचरित आदि में सीता-स्वयंवर में रावण का दूत उपस्थित रहता है । राजशेखरकृत बालरामायण आदि ग्रन्थों में सीता-स्वयंवर के समय रावण भी उपस्थित रहता है और वह धनुष-परीक्षा में शामिल नहीं होता । परन्तु प्रसन्नराघव आदि के अनुसार रावण तथा बाणासुर दोनों धनुष चढ़ाने में असफल होते हैं। रामलिङ्गामृत आदि के अनुसार रावण ने धनुष उठाने का प्रयत्न किया, किन्तु धनुष उलट गया और वह उसके नीचे दबकर छटपटाने लगा। जब कोई भी धनुष नहीं उठा सका तब विश्वामित्र ने राम को रावण के प्राण बचाने का आदेश दिया। आनन्दरामायण (१।३।७७-८५) तथा तोरवेरामायण में भी ऐसा वृत्तान्त है । बलरामदासरामायण में पुष्पक में ही बैठा रावण धनुर्भङ्ग देखकर डरकर लङ्का लौट जाता है। सेरीराम में उल्लेख है कि इन्द्रजित् भी स्वयंवर में विद्यमान था, पर वह इसलिए धनुष के पास नहीं गया कि वह पुत्री- कोमालदेवी नामक अपनी प्राणप्यारी सहधर्मिणी के लिए किसी को सपत्नी नहीं बनाना चाहता था। जो भी हो, मूल अर्थ वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध अन्य घटनाएँ भी प्रामाणिक हो सकती हैं, अतः उनका अपलाप करने का कोई प्रश्न नहीं उठता है। अर्वाचीन राम कथाओं में ही क्यों प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में भी देवताओं की उपस्थिति सीता-स्वयंवर में थी । पद्मपुराण (पा० ख० ११२।९९-१०३) के अनुसार महेन्द्र, सूर्य तथा वायु ने धनुष उठाने का निष्फल प्रयास किया था। रामचरितमानस के अनुसार देवता मनुष्य का रूप धारण कर विवाह में सम्मिलित होते हैं । अन्य देव विमानों में चढ़कर स्वयंवर देखते हैं— "देखहि सुर नर चढ़े विमाना" ( रा० मा० १।२४५।४) तथा “देव दनुज धरि मनुजसरीरा।" (रा० मा० १।२५०।४) । सेरतकाण्ड के अनुसार सीता के पोषक पिता रंसिकल को आकाश से गिरा एक धनुष मिला और उसने संकल्प किया कि जो इस धनुष से चलाए हुए बाण के द्वारा सप्त ताल वृक्षों को विद्ध करे उसी को सीता मिलेगी। रावण छः वृक्षों को विद्ध कर सका। ये ताल एक साँप की पीठ पर खड़े थे। लक्ष्मण ने उस साँप को दबाकर सीधा कर दिया, तब राम ने लक्ष्मण की सहायता से सप्ततालों को वेध दिया। रामकेर्ति में ब्रह्मा, इन्द्र, शिव, वायु, अग्नि आदि कई देवताओं की चर्चा है जो एक-एक करके धनुष के उत्तोलन में असफल हुए थे। यह धनुष की गुरुता की प्रशंसामात्र समझना चाहिए । वस्तुतः ब्रह्मा, शिव ईश्वरकोटि के देव हैं। उन्हें राम और सीता के असाधारण स्वरूप का ज्ञान था ही, अतः वे सीता की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील नहीं हो सकते थे । सेरीराम के अनुसार जनक काकासुर का वध करने के लिए राम से निवेदन करते है। यह काकासुर यज्ञ में प्रयुक्त होनेवाला दूध पीकर यज्ञों में विघ्न डाला करता था । राम का बाण काक का पीछा करता हुआ समुद्र के एक टापू पर पहुँचता है । काक भयभीत होकर प्रतिज्ञा करता है कि आगे वह महारीसी कली को कष्ट नहीं देगा । राम का बाण काक का सन्देश लेकर मिथिला वापस आता है। इसके बाद विवाह होता है ।