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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय बालकाण्ड ४३९ के पिता को दिया । सेरतकाण्ड के अनुसार जनक के पास वह आकाश से गिरकर आया । रामकेत्ति के अनुसार सीता का अपूर्व सौन्दर्य देखकर जनक ने मन्त्रों द्वारा एक दिव्य धनुष की सृष्टि की थी और यह प्रण किया था कि जो इस धनुष को उठाने में समर्थ होगा उसी को मैं सीता प्रदान करूँगा ( सर्ग १ ) । आनन्दरामायण ( १।३।४७ ) तथा भावार्थरामायण ( १।१७ ) में कहा गया है कि जो शिव-धनुष जनक के पास है उसी धनुष से परशुराम ने २१ बार क्षत्रियों का नाश किया था । एक अन्य वृत्तान्त के अनुसार धनुष के साथ ही सीता यज्ञ की अग्नि से प्रकट हुई थी । आनन्दरामायण, भावार्थरामायण, बिहौरराम-कथा आदि के अनुसार सीता ने धनुष उठाकर उस जगह को लीपा था तब जनक ने यह प्रण किया कि जो इसे तोड़ेगा उसी से सीता का विवाह होगा । उसी से जनक ने सीता को लक्ष्मी जाना । भावार्थरामायण ( १।१७ ) के अनुसार परशुराम ने जनक के महल में उस धनुष से सीता को खेलते देखकर जनक को यह सुझाव दिया था कि जो धनुष-भङ्ग करने में समर्थ हो वही सीता का पति बने । जो भी हो, अनेक वर्णनों में विकृतियाँ हो सकती हैं। परन्तु आर्ष प्रमाणों में कल्पभेद या सामान्य-विशेष भाव से समन्वय किया जाना उचित है । नाटक, काव्य आदि में रसोत्पत्ति के लिए मूल कथा में कुछ हेरफेर करने की परिपाटी है ही; किन्तु सबकी दृष्टि से धनुर्भङ्ग और धनुष की असाधारणता स्पष्ट है । सीता-स्वयंवर के प्रसङ्ग में बहुत से राजाओं की धनुष तोड़ने या चढ़ाने में असफलता के पश्चात् उनका मिथिला पर आक्रमण कहा गया है । उसके बाद "सुदीर्घस्य तु कालस्य" बहुत दिनों बाद राम ने धनुष तोड़कर सीता से विवाह किया ( वा० रा० २।११८ ) । यहाँ बुल्के कहते हैं बाद की कथाओं में सीता-स्वयंवर तथा राजाओं के आक्रमण का राम से सम्बन्ध स्थापित हो गया । परन्तु यह कोई असम्भावित बात नहीं है । सुदीर्घ काल का अर्थ सौ दो सौ वर्ष न होकर आपेक्षिक महीना १५ दिन भी हो सकता है और राजाओं के सीता-प्राप्त्यर्थ धनुषपरीक्षण की प्रवृत्ति कुछ-कुछ चलती ही रही, इसलिए दोनों बातें सङ्गत हो जाती हैं । प्रथम अधिकाधिक राजा लोग एकत्रित हुए। तभी असफल होकर जनक पर आक्रमण किया । जब देवताओं से चतुरङ्ग बल पाकर जनक ने उन्हें पराजित कर दिया तब वैसी प्रवृत्ति धीमी पड़ गयी । राम के आगमन पर भी कुछ राजा या राजकुमार धनुष के परीक्षणार्थ आये होंगे । राम की सफलता देखकर ईर्ष्यावश राम पर आक्रमण की बात सोचते रहे होंगे । कल्पभेद से भी दोनों स्थितियों का समाधान कर लेना उचित है । पउमचरियं के अनुसार राम ने म्लेच्छों के विरुद्ध जनक की सहायता की थी, अतः पुरस्कारस्वरूप जनक ने उन्हें सीता-प्रदान किया । विवाह के पूर्व नारद सीता को देखने आते हैं । सीता भयभीत होकर छिप गयी, इसपर नारद को महल से निकाल दिया गया । नारद ने भामण्डल के उद्यान में सीता का चित्र बना दिया, जिसे देखकर भामण्डल उसपर अनुरक्त हो गया । उसकी विरहव्यथा देख उसके पालक पिता ने एक मायावी विद्याधर द्वारा जनक को अपने पास बुला लिया और भामण्डल से सीता के विवाह का अनुरोध किया । जनक ने उत्तर दिया कि मैंने राम को सीता देने की प्रतिज्ञा कर ली है । फिर उसके अनुरोध से जनक ने यह शर्त स्वीकार कर ली कि राम को पहले वज्रावर्त्त धनुष चढ़ाना होगा इसपर स्वयंवर का आयोजन हुआ । राम ने धनुष चढ़ा दिया । विभिन्न लेखक अपनी कृति में चमत्कार लाने के लिए बहुत से काल्पनिक अंशों को जोड़ देते हैं; परन्तु आर्ष ग्रन्थों में तो वस्तुस्थिति का ध्यान रखते हुए ही कृति में सौष्ठव लाने का प्रयास किया जाता है । नृसिंहपुराण ( अ० ४७ ), भागवतपुराण ( ९।१० ), अध्यात्मरामायण ( १।६।२४ ), कम्ब- रामायण, सूरसागर आदि के अनुसार अन्य राजाओं की उपस्थिति में स्वयंवर के समय राम धनुष उठाते हैं । पद्मपुराण ( पातालखण्ड ) के अनुसार नारद के अनुरोध पर सीता-स्वयंवर का आयोजन हुआ । दशरथ ने अपने पुत्रों के विवाहार्थ अपने दूतों को नाना देशों में भेजा था । एक ने शीघ्र ही लौटकर समाचार दिया कि विदेह की पुत्री वैदेही विवाहयोग्य है, इसपर वसिष्ठ को भेजा गया जो लग्न निश्चित कर अयोध्या लौटते हैं । अनन्तर विवाह- मङ्गल गाती हुई युवतियों आदि के साथ बरात मिथिला के लिए प्रस्थान करती है । जनक स्वागत कर उन्हें विदेह-

४४० रामायणमीमांसा नगर के एक महल में ठहराते हैं। वहाँ नारद आते हैं और अगले दिन विवाह के लिए जनक द्वारा आमन्त्रित किये जाते हैं । नारद कहते हैं यह मुहूर्त ठीक नहीं है। नारद गर्ग आदि के साथ परामर्श कर दशरथ की अनुमति से स्वयं- वर में अन्य राजाओं को भी बुलाते हैं। उसी रात शिवजी से जनक अजगव धनुष प्राप्त करते हैं, जिसे राम को छोड़कर कोई भी उठाने में समर्थ नहीं होता (पद्मपु० पातालखण्ड १११।४९-९०) । नृसिंहपुराण, पद्मपुराण आदि अर्वाचीन नहीं, आर्ष ग्रन्थ हैं। उनका परस्पर समन्वय करना ही उचित है । किसी वस्तु की प्रशंसा के लिए अर्थवाद वेदों में भी होते हैं । अर्थवादों का स्वार्थ में तात्पर्य न होकर स्तुति में ही तात्पर्य होता है। सीता-राम के विवाह का उत्कर्ष वर्णन करने की दृष्टि से कुछ विरुद्ध भी अर्थवाद हो सकते हैं। महावीरचरित आदि में सीता-स्वयंवर में रावण का दूत उपस्थित रहता है । राजशेखरकृत बालरामायण आदि ग्रन्थों में सीता-स्वयंवर के समय रावण भी उपस्थित रहता है और वह धनुष-परीक्षा में शामिल नहीं होता । परन्तु प्रसन्नराघव आदि के अनुसार रावण तथा बाणासुर दोनों धनुष चढ़ाने में असफल होते हैं। रामलिङ्गामृत आदि के अनुसार रावण ने धनुष उठाने का प्रयत्न किया, किन्तु धनुष उलट गया और वह उसके नीचे दबकर छटपटाने लगा। जब कोई भी धनुष नहीं उठा सका तब विश्वामित्र ने राम को रावण के प्राण बचाने का आदेश दिया। आनन्दरामायण (१।३।७७-८५) तथा तोरवेरामायण में भी ऐसा वृत्तान्त है । बलरामदासरामायण में पुष्पक में ही बैठा रावण धनुर्भङ्ग देखकर डरकर लङ्का लौट जाता है। सेरीराम में उल्लेख है कि इन्द्रजित् भी स्वयंवर में विद्यमान था, पर वह इसलिए धनुष के पास नहीं गया कि वह पुत्री- कोमालदेवी नामक अपनी प्राणप्यारी सहधर्मिणी के लिए किसी को सपत्नी नहीं बनाना चाहता था। जो भी हो, मूल अर्थ वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध अन्य घटनाएँ भी प्रामाणिक हो सकती हैं, अतः उनका अपलाप करने का कोई प्रश्न नहीं उठता है। अर्वाचीन राम कथाओं में ही क्यों प्राचीन आर्ष ग्रन्थों में भी देवताओं की उपस्थिति सीता-स्वयंवर में थी । पद्मपुराण (पा० ख० ११२।९९-१०३) के अनुसार महेन्द्र, सूर्य तथा वायु ने धनुष उठाने का निष्फल प्रयास किया था। रामचरितमानस के अनुसार देवता मनुष्य का रूप धारण कर विवाह में सम्मिलित होते हैं । अन्य देव विमानों में चढ़कर स्वयंवर देखते हैं— "देखहि सुर नर चढ़े विमाना" ( रा० मा० १।२४५।४) तथा “देव दनुज धरि मनुजसरीरा।" (रा० मा० १।२५०।४) । सेरतकाण्ड के अनुसार सीता के पोषक पिता रंसिकल को आकाश से गिरा एक धनुष मिला और उसने संकल्प किया कि जो इस धनुष से चलाए हुए बाण के द्वारा सप्त ताल वृक्षों को विद्ध करे उसी को सीता मिलेगी। रावण छः वृक्षों को विद्ध कर सका। ये ताल एक साँप की पीठ पर खड़े थे। लक्ष्मण ने उस साँप को दबाकर सीधा कर दिया, तब राम ने लक्ष्मण की सहायता से सप्ततालों को वेध दिया। रामकेर्ति में ब्रह्मा, इन्द्र, शिव, वायु, अग्नि आदि कई देवताओं की चर्चा है जो एक-एक करके धनुष के उत्तोलन में असफल हुए थे। यह धनुष की गुरुता की प्रशंसामात्र समझना चाहिए । वस्तुतः ब्रह्मा, शिव ईश्वरकोटि के देव हैं। उन्हें राम और सीता के असाधारण स्वरूप का ज्ञान था ही, अतः वे सीता की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील नहीं हो सकते थे । सेरीराम के अनुसार जनक काकासुर का वध करने के लिए राम से निवेदन करते है। यह काकासुर यज्ञ में प्रयुक्त होनेवाला दूध पीकर यज्ञों में विघ्न डाला करता था । राम का बाण काक का पीछा करता हुआ समुद्र के एक टापू पर पहुँचता है । काक भयभीत होकर प्रतिज्ञा करता है कि आगे वह महारीसी कली को कष्ट नहीं देगा । राम का बाण काक का सन्देश लेकर मिथिला वापस आता है। इसके बाद विवाह होता है ।

अध्याय बालकाण्ड ४४१ विवाहोत्सव वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के अनुसार राम के विवाह के साथ लक्ष्मण का ऊर्मिला से, भरत और शत्रुघ्न का क्रमशः माण्डवी और श्रुतकीर्ति से विवाह होता है। गुणभद्र के उत्तरपुराण, तिब्बती रामायण, खोतानी रामायण तथा बौद्ध जातकों में सीता और राम का ही विवाह वर्णित है। भट्टिकाव्य, सेरीराम, रामकेलि, रामकियेन आदि में राम और लक्ष्मण का विवाह वर्णित है। वह्निपुराण और पद्मपुराण (गौडीय पातालखण्ड) में राम और भरत का विवाह वर्णित है। राम और सीता के विवाह के कारण भरत को उदास देखकर कैकेयी ने भरत और सुभद्रा के विवाह का प्रस्ताव किया। सुभद्रा जनक के भाई कनक की कन्या है। इसपर सुभद्रा के स्वयंवर का आयोजन होता है। स्वयंवर में सुभद्रा भरत को चुनती है। तत्त्वसंग्रहरामायण में विवाह में ब्रह्मा की उपस्थिति का उल्लेख है। रामचरितमानस में देवता ब्राह्मण का रूप धारण कर विवाह में भाग लेते हैं। होम के समय पूजा स्वीकार करते हैं। "सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानहिं नाना जूथा ॥ प्रेमपुलक तन हृदय उछाहू । चले बिलोकन राम बिआहू॥" (रा० मा० १।३१३।१,२) "ब्रह्मादि सुरवर विप्रवेष बनाई कौतुक देखहीं ॥" (रा० मा० १।३१९ छन्द) उनकी स्त्रियां छद्मवेश में परछन के समय राम की आरती उतारती हैं। "सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी । कपटनारि बर बेष बनाई । मिली सकल रनवासहिं जाई ॥" (रा० मा० १।३१७।३,४) कृत्तिवासरामायण में चन्द्रमा ने नर्तकी का रूप धारण कर अपने नृत्य से सबको मन्त्रमुग्ध कर दिया, जिससे शुभ मुहूर्त्त टल गया जिसे देवता चाहते थे (१।६२)। अतएव लौकिक दृष्टि से वह विवाह सुखदायक नहीं हुआ। इसी के आधार पर अन्य कल्पनाएँ हुई हैं। विवाह की अवस्था वाल्मीकिरामायण में उक्त 'ऊनषोडशवर्षः (१।२०) के अनुसार राम की १६ वर्ष से कम उम्र थी एवं (वा० रा० १।७७।१४) तथा अनसूयासंवाद (वा० रा० २।११८।२७-५२) के अनुसार सीता की पतिसंयोगसुलभ अवस्था का उल्लेख है। पर बुल्के इसे और अनसूया-संवाद को प्रक्षेप कहते हैं, परन्तु उनकी यह कल्पना भी निराधार ही है। क्योंकि भारतीय टीकाकारों ने उसे परम्पराप्राप्त मानकर ही उसपर टीकाएँ की हैं। अरण्यकाण्ड (३।४७) के अनुसार विवाह के पश्चात् सीता १२ वर्ष तक अयोध्या में रही थीं। वनगमन के समय राम और सीता की अवस्था क्रमशः २५ तथा १८ की थी (वा० रा० ३।४७।१०-११)। विवाह के समय राम तथा सीता की उम्र १३ और ६ वर्ष की थी। अयोध्याकाण्ड के (वा० रा० २।२०।४५) के अनुसार राम की अवस्था १७ वर्ष की थी। (वा० रा० ५।३३।१७) में वनवास के पहले १२ वर्ष अयोध्या में रहना कहा गया है। स्कन्दपुराण (ब्राह्मखण्ड धर्मारण्यखण्ड अ० ३०) तथा पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ३३) में विवाह के समय दोनों की उम्र क्रमशः १५ और ६ वर्ष की मानी गयी है। बुल्के उन सबमें परस्पर मतभेद भी दिखला कर प्रक्षेप सिद्ध करना चाहते हैं। परन्तु वस्तुतः इन सबका समन्वय ही है। सीता अयोनिया एवं दिव्य होने के कारण ६ वर्ष की अवस्था में भी पतिसंयोगसुलभ प्रतीत होती थीं। 'ऊनषोडशवर्षः' यह वचन कहकर दशरथ ने विश्वामित्र से यह कहना चाहा था कि १६ वर्ष का क्षत्रिय- पुत्र युद्धयोग्य होता है, किन्तु राम अभी षोडश वर्ष के नहीं हुए, अतः युद्ध के अयोग्य हैं। उपक्रमन्याय से बालकाण्ड ५६

४४२ रामायणमीमांसा त्रयोदश के अनुसार ही अयोध्याकाण्ड के वचन का अर्थ लगाना उचित है। "सप्त दश च वर्षाणि जातस्य तव राघव।" (वा० रा० २।२०।४५) का अर्थ रामाभिरामी के अनुसार यह है कि उपनयन संस्कार रूप द्वितीय जन्म से राम वनवास के समय १७ वर्ष के थे। इस तरह राम विश्वामित्र-यज्ञ के समय १५ वर्ष के थे। १२ वर्ष विवाह के बाद अयोध्या में रहे और वनगमन के समय २७ वर्ष के ही थे। दश वर्ष की अवस्था में उपनयन हुआ था। यद्यपि “मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः। अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते ।। (वा० रा० ३।४७।१०-११) इस वचन से वनगमन के समय में क्रमशः राम और सीता की आयु २५ और १८ वर्ष की प्रतीत होती है तथापि इस वचन का भी पूर्व वचनों के अनुसार ही अर्थ करना उचित है। अतएव टीकाकारों ने पञ्चविंशक का अतितरुण अर्थ किया है। अथवा २४ तत्त्वों से पृथक् पञ्चविंशक सांख्यीय चैतन्य पुरुष ही राम हैं। पञ्चतन्मात्राएँ, पञ्चमहाभूत, पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, अहङ्कार, बुद्धि, मनरूप १८ वर्ष पूर्व मेरे कार्य गिने जाते हैं। मैं मूलप्रकृति हूँ। ‘पतिसंयोगसुलभम्’ का भी अर्थ पाणिग्रहणयोग्यता ही विवक्षित है। यही रामाभिरामी टीका का मत है। पूर्वराग अनेक रामायणों के अनुसार सीता और राम का परस्पर प्रेम हो जाता है। आनन्दरामायण ( १।३।१११- १२०) स्वयंवर के समय रामाभिराम को देखकर सीता प्रेमविह्वल हो जाती हैं। वे देवताओं से प्रार्थना करती हैं कि धनुष को पुष्पवत् बना दें। कल्किपुराण (३।३।२९) के अनुसार जनकनन्दिनी सीता के कटाक्ष से अर्चित होकर राम धनुष चढ़ाते हैं—‘जनकजेक्षितैरचितः’। कम्बरामायण के अनुसार सीता कन्या-भवन पर खड़ी थी और राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ आ रहे थे। दोनों की दृष्टि दोनों पर पड़ी। दोनों प्रेमनिमग्न हो गये। रामचरितमानस के अनुसार पुष्पवाटिका में दोनों एक दूसरे को देखकर प्रभावित होते हैं— “सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत । चकित विलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत ।।” (रा० मा० १।२२९) “..................‘सियमुख ससि भय नयन चकोरा । भए बिलोचन चारु अचंचल । मनहुँ सकुचि निमि तजे दृगंचल ॥ देखि सीय सोभा सुखु पावा । हृदय सराहत बचनु न आवा।।” (रा० मा० १।२२९।२,३) “सियसोभा हिय बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि ।।” (रा० मा० १।२३०) सीताजी भी— “देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥ थके नयन रघुपतिछबि देखें । पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें ॥ अधिक सनेहु देह भै भोरी । सरदससिहि जनु चितव चकोरी ॥ लोचनमग रामहि उर आनी । दीन्हे पलक कपाट सयानी ।।” (रा० मा० १।२३१।२-४) और सीता राम-प्राप्ति के लिए गौरी से मूक प्रार्थना करती हैं— “मोर मनोरथ जानहु नीके । बसहु सदा उर पुर सबही के ॥” (रा० मा० १।२३५।२)

भवानी ने भी प्रसन्नता से वरदान दिया, यह जानकर सीता प्रसन्न होती हैं— "जानि गौरि अुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।" (रा० मा० १।२३६) राघवोल्लास के अनुसार स्वप्न में सीता को राम का दर्शन होने से वे अनुरागवती होती हैं । भुशुण्डि- रामायण के अनुसार पक्षी के द्वारा रामप्रेषित राम का चित्र देखकर और बृहत्कोशलखण्ड में गुणश्रवण द्वारा सीता पूर्वानुरागवती होती हैं । तुलसीदास के अनुसार यह स्वाभाविक पुनीत प्रेम था और सीता के नयन निजनिधि पहचान कर ललक उठे । आर्ष रामायण के अविरुद्ध ऐसी स्थितियों का वर्णन भी असङ्गत नहीं है । राम एकपत्नीव्रत थे । वाल्मीकि के अनुसार राम सत्यपराक्रम, पितृभक्त एवं स्वदारनिरत थे । अन्य रामायणों में भी राम को एकपत्नीव्रत कहा गया है । परन्तु बुल्के इसे भी विकास मानते हैं । यहाँ बुल्के कहते हैं, "उच्चाशय मानव का चित्रण करते हुए भी वाल्मीकि का दृष्टिकोण यथार्थवादी ही था, अतः उनकी रचना में ऐसी उक्तियाँ भी मिलती हैं जो परवर्ती रामकथाओं के मर्यादावाद को आघात पहुँचाती हैं । जैसे— "हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः ।" (वा० रा० २।१८।१२) अर्थात् राम के अभिषेक के बाद राम की परम स्त्रियाँ प्रहृष्ट होंगी । ऐसे ही— "भुजैः परमनारीणामभिमृष्टमनेकधा ।" (वा० रा० ६।२१।३) । अनेकधा परम नारियों की भुजाओं से स्पृष्ट राम की बाँह का उल्लेख किया गया है ।" परन्तु बुल्के भारतीय शास्त्रीय समन्वय की पद्धति से अपरिचित हैं । इसी लिए उन्हें इस प्रकार का भ्रम हुआ है । ऐसे प्रसङ्गों में टीकाकारों ने एकपत्नीव्रत के अनुकूल ही अर्थ किया है । राम की सीता एवं सीता की सखियाँ प्रसन्न होंगी । स्त्री का अर्थ पत्नी ही नहीं होता है । रामसम्बन्धिनी परम उत्कृष्ट स्त्रियां प्रसन्न होंगी । यही उक्त वचन का अर्थ है । उपनिषद में आया है "ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके" (कठ उ० १।३।१) । यहाँ पिबन्तौ से यही प्रतीत होता है कि जीव और ईश्वर दोनों ऋत (कर्मफल) का पान करनेवाले हैं । परन्तु जीव और ईश्वर के स्वभाव भिन्न होने के कारण ईश्वर भोक्ता नहीं होता । "अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति" (मु० उ० ३।१।१) ईश्वर भोजन न करता हुआ केवल प्रकाशक रहता है । इस श्रुति के कारण पिबन्तौ का मीमांसासम्मत अर्थ यह होता है कि— 'जीवः पिबति ईश्वरः पाययति' अर्थात् जीव कर्म-फल का भोक्ता है ईश्वर जीव को कर्मफल भोगार्थ प्रेरित करता है । इसी तरह 'परमाः स्त्रियः' में राम की पत्नी सीता एवं उसकी सखियाँ ही गृहीत होती हैं । अतएव "बहुवचनेन सीतासख्यः" यही अर्थ रामाभिरामी टीका में किया गया है । इसी प्रकार दूसरे वचन का भी अर्थ यह है कि मणि, काञ्चन, मुक्तादि सर्वोत्तम भूषण युक्त परम नारियों (धात्रीजनों) के द्वारा स्नान, अलङ्करण आदि के समय राम की बाहें स्पृष्ट होती हैं । रामाभिरामी का स्पष्टतः कहना है— "परमनारीणामेकदारव्रतत्वेनेतरस्त्रीप्रसङ्गाभावादुत्तमधात्रीजनानां भुजैरनेकधा स्तनपनालङ्कर- णादिकाले स्पृष्टम् ।" अर्थात् राम एकदारव्रत हैं, अतः उनका अन्य नारी-स्पर्श का प्रसङ्ग न होने से धात्रीजनों की भुजाओं से स्नान, अलङ्करण आदि के समय राम की भुजा स्पृष्ट होती थी । वाल्मीकिरामायण में ही राम को एक- पत्नीव्रत कहा गया है और उसी के कारण यज्ञों में भी सुवर्णमयी सीता की प्रतिमा का प्रयोग हुआ । न सीतायाः परां भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ।। (वा० रा० ७।९९।७) अर्थात् राम ने सीता से भिन्न भार्या का वरण नहीं किया, इसलिए पत्नी के स्थान में यज्ञों में सीता की काञ्चनी प्रतिमा ही उपयुक्त होती थी । इसी प्रकार बुल्के यह भी कहते हैं कि यद्यपि सीता के प्रति

राम-प्रेम की असंख्य बार रामायण में चर्चा है तथापि भरत के अभिषेक की बात सुनकर राम ने कहा है कि पिता की आज्ञा से मैं भरत को अपना राज्य, सम्पत्ति, अपना जीवन तथा सीता को भी सहर्ष प्रदान कर सकता हूँ। “अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च। हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरताय प्रचोदितः ॥” ( वा० रा० २।१९।७ ) परन्तु इससे सीता-प्रेम में विरोध कैसे प्रतीत होता है ? यह तो वही जानें, पर वस्तुतः प्राण या जीवन से ही पत्नी का सम्बन्ध होता है, जो अपने प्राण एवं जीवन ही भरत को प्रदान करने को प्रस्तुत है तब उसके सीता के प्रदान में प्रेम की न्यूनता कहाँ आती है। इसी तरह घोर शरपाशबन्धन से मूच्छित लक्ष्मण को देखकर विलाप करते हुए राम कहते हैं, मैं युद्ध में मूच्छित लक्ष्मण को देख रहा हूँ। इस स्थिति में सीता के मिलने या जीवन से भी मुझे क्या करना है। ढूँढने पर मर्त्यलोक में सीता जैसी नारी मिल सकती है, पर लक्ष्मणसदृश साम्परायिक ( युद्ध का सच्चा साथी ) भ्राता नहीं मिल सकता ( वा० रा० ६।४७।५, ६ ) । इससे भी बुल्के को सीता-प्रेम में कमी दिखती है, परन्तु वस्तुतः यहाँ शोकसन्तप्त राम का तात्पर्य लक्ष्मण के महत्त्व-वर्णन में ही है, सीता के अपकर्ष-वर्णन में नहीं । “यत्परः शब्दः स शब्दार्थः” शब्द का जिसमें तात्पर्य होता है वही शब्दार्थ होता है। फिर भी बुल्के अनिश्चितता की ही स्थिति में रह जाते हैं और कहते हैं कि उपर्युक्त उद्धरणों का उत्तरदायित्व वाल्मीकि पर है या प्राचीन गायकों पर है, इसका निर्णय असंभव है। परन्तु आर्ष वाल्मीकिरामायण पर विश्वास करनेवाले आस्तिकों को तो पूर्वोक्त ढंग से समन्वित अर्थ ही प्रतीत होता है, विरोध का अवकाश ही नहीं। वाल्मीकिरामायण ( २।६४।४३ ) में वर्णित— ‘एकपत्नीव्रतस्य’ राम के एकपत्नीव्रत की महिमा ठीक ही है। सीता को भी राम के ‘स्वदारनिरतः’ ( वा० रा० ३।९।६ ) के अनुसार स्वदाररत होने का पूर्ण विश्वास है ही। वे उन्हें ‘स्थिरानुराग’ मानती हैं। कैकेयी भी यह स्पष्ट कहती है कि राम कभी परस्त्री को चक्षु से भी नहीं देखते । “न रामः परदारान् स चक्षुर्भ्यामपि पश्यति ।” ( वा० रा० २।७२।४८ ) आनन्दरामायण में तो राम स्वयं ही कहते हैं कि सीता को छोड़कर सभी नारियाँ उनके लिए कौशल्या के तुल्य हैं— अन्यत् सीतां विनाऽन्या स्त्री कौशल्यासदृशी मम । न क्रियते परा पत्नी मनसाऽपि न चिन्तये ॥ ( आ० रा० विलासकाण्ड सर्ग ७ ) जैनों ने राम की ८००० और लक्ष्मण की १६००० पत्नियां मानी हैं, जो आर्षरामायणविरुद्ध होने से अग्राह्य ही है। रसिकसम्प्रदाय की दृष्टि में राम परमेश्वर हैं। उनमें बहुतों की पतिभावना हो सकती है, परन्तु वह भावना की बात है, व्यावहारिक नहीं। इसी प्रकार राम और लक्ष्मण दोनों के सीता से विवाह करने की बात खोतानी रामायण, राम वानररूप धारण कर अञ्जना से हनुमान् को उत्पन्न करते हैं ( सेरीराम ), राम वाली की विधवा से विवाह कर अङ्गद के पिता बनते हैं ( अनु० ३२७ ) रामकथा, आदि सब को रामायण की विकृतियां ही समझना चाहिये । अयोनिजा सीता ४०५ वें अनु० में बुल्के सीता के जन्म के सम्बन्ध में कहते हैं “सीता के कुलपरम्परासम्बन्धी तथ्यों के अभाव के कारण अनेक प्रकार की कथाएँ प्रचलित हुई हैं। जनक, रावण और दशरथ तीनों ही सीता के पिता माने गये हैं।” परन्तु यह उनका भ्रम ही है। रामायण के अनुसार सीता अयोनिजा ही हैं। उनके अनुसार महाभारत,

अध्याय बालकाण्ड ४४५ हरिवंश, पउमचरियं और आदिवाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता जनकजा है । यद्यपि प्रचलित रामायण से भिन्न आदिरामायण नाम की कोई वस्तु नहीं है। वह केवल पाश्चात्यों के मस्तिष्क का फितूर ही है। महाभारत रामो- पाख्यान में सीता को जनक की आत्मजा अवश्य कहा गया है । विदेहेराजो जनकः सीता तस्यात्मजा विभो ।” ( म० भा० ३।१५८।९ ) परन्तु यहाँ आत्मजा शब्द पुत्री का ही बोधक है जैसे अग्निजा द्रौपदी भी द्रुपदात्मजा या द्रौपदी हुई वैसे ही अयोनिजा सीता भी पुत्रीत्वेन जनक द्वारा स्वीकृत होने के कारण जनकात्मजा या जानकी हो ही जाती हैं। हरिवंश ( १।४१ ) का भी यही समाधान है । संक्षेप कथा के कारण ही उनमें सीताजन्म का विशेष विवरण न होना स्वाभाविक ही है। अनसूया-सीता-संवाद में, अशोकवाटिका में हनुमान् द्वारा तथा अग्निपरीक्षा प्रसंग में सीता को भूमिजा अयोनिजा कहा गया है और इन काण्डों को बुल्के प्रामाणिक भी कहते हैं फिर भी इन प्रसङ्गों को वे प्रक्षेप कहते हैं, जिसका कि मैंने अनेक प्रसङ्गों में खण्डन कर दिया है । प्रामाणिक टीकाकारों ने सातों काण्ड रामायण को प्रमाण मानकर उन सभी काण्डों और उक्त सर्गों पर भी टीकाएँ लिखी हैं। अयोध्याकाण्ड के ११८ वें सर्ग के अनुसार अत्रि-पत्नी अनसूया सीता से प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य वस्त्र, आभरण और महार्ह दिव्य अङ्गराग तथा मालाएँ प्रदान करती हैं और सीता से उनके स्वयंवर की कथा पूछती हैं। उसी प्रसङ्ग में सीता कहती हैं मेरे पिता मिथिलाधिपति हल से ( चयन-यज्ञप्रसङ्ग में ) यज्ञयोग्य क्षेत्रमण्डल का कर्षण कर रहे थे मैं पृथिवी-भेदन करके निकल पड़ी थी । गुण्ठित सर्वाङ्गवाली मुझे देख विस्मित होकर जनक ने अनपत्य होने के कारण स्नेह से अङ्क में मेरी पुत्री कह कर उठा लिया और मुझे अपनी ज्येष्ठ पत्नी को प्रदान किया । उसने मातृभाव से मेरा पालन किया । उसी प्रसङ्ग में सीता ने अपने को अयोनिजा भी कहा है— “तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम् । अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपतेः सुता । अनपत्येन च स्नेहादङ्कमारोप्य च स्वयम् । ममेयं तनयेत्युक्त्वा स्नेहो मयि निपातितः । अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन् ॥” (वा० रा० २।११८ २८-३७) यही बात वाल्मीकिरामायण ( ५।१६ ) में कही गयी है जो हलमुखक्षत क्षेत्रमण्डल में मेदनी-भेदन करके उत्पन्न हुई है वह धर्मशील जनकराज की पतिव्रता पुत्री है— “उत्थिता मेदिनीं भित्वा क्षेत्रे हलमुखक्षते । पद्मररेणुनिभैः कीर्णा शुभैः केदारपांसुभिः ॥” इसी तरह अग्निपरीक्षा के प्रसङ्ग में भी सीता ने साधारण स्त्रियों से अपनी विशेषता बतलाते हुए अपने को अयोनिजा या भूमिजा कहा है— “अपदेशो हि जनकान्नोत्पत्तिर्वसुधातलात् । मम वृत्तं च वृत्तज्ञ बहु ते न पुरस्कृतम् ॥” ( वा० रा० ६।११६।१५ ) नृपशार्दूल, आपने रोष का ही अनुवर्तन करते हुए सामान्य पुरुषों के समान स्त्रीत्वमात्र की दृष्टि से मेरे सम्बन्ध में शङ्काएँ व्यक्त की हैं। इसपर ध्यान नहीं दिया कि मेरा वैदेही ऐसा नाम और व्यवहार जनकयज्ञ भूमिमात्र के सम्बन्ध से ही है । जनक से मेरी उत्पत्ति नहीं हुई, किन्तु वसुधातल से ही मेरी अभिव्यक्ति हुई है । इस तरह मनुष्य-योनि से अनुत्पत्ति के कारण मुझे प्राकृत स्त्री नहीं कहा जा सकता और मेरे बहुमान चरित्र को भी आपने महत्त्व नहीं दिया ।

४४६ रामायणमीमांसा त्रयोदश वाल्मीकिरामायण के उक्त सभी स्थलों में कतक, तीर्थ, तिलक, भूषण आदि टीकाएँ हैं, अतः इन्हें प्रक्षेप कह देना साहसमात्र है। अतएव यह कहना कि आदिरामायण के अनुसार सीता जनक की औरसी पुत्री थी, सर्वथा अशुद्ध है ( वा० रा० १।१।२७; ५।१३।४; २।२८।३ तथा ३।४७।३ ) के वचनों का भी यही अर्थ हैं कि विदेहकुल में सीता जनक द्वारा पुत्रीरूप से गृहीत हुई है। "जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता ।" ( वा० रा० १।१।२७ ) यहाँ नागेश रामाभिरामी में लिखते हैं-- "यद्यप्येषाऽयोनिजा तथापि सीरध्वजस्य देवयजनलाङ्गलपद्धतावाविर्भूतत्वादेवमुक्तिः ।" यद्यपि सीता अयोनिजा हैं फिर भी सीरध्वज जनक के देवयजनक्षेत्र की लाङ्गल पद्धति से उनका आविर्भाव हुआ है, अतः जनक के कुल में उद्भूत मानी गयी हैं। आश्चर्य है, स्वाभिमत विरुद्ध होने से स्वयं प्रमाणत्वेन स्वीकृत २-६ काण्डों में सीता के अयोनिजा कही जाने पर भी बुल्के उसे स्वीकार नहीं करते हैं और बालकाण्ड को प्रामाणिक न मानने पर भी उसके अनुसार सीता को जनक की औरसी पुत्री सिद्ध करने की निर्लज्ज चेष्टा करते हैं । "जनकस्य कुले जाता रामपत्नी सुमध्यमा ।" ( वा० रा० ५।१३।१४ ) इस प्रसङ्ग में भी पूर्वोक्त ही अभिप्राय है। विशेषतः जनककुल की कन्या और राम की पत्नी रावण के वश में कथमपि नहीं हो सकती । “सीते महाकुलीनासि धर्मे च निरता सदा ।" ( वा० रा० २।१८।३ ) यहाँ भी सीता जनक की औरसी पुत्री नहीं कही गयी हैं। इसी तरह अन्य उद्धरणों को भी उपक्रमन्याय से बालकाण्ड-कथा के अनुसार ही लगाना चाहिये । बालकाण्ड के ६६वें सर्ग में विवाह के समय स्वयं ही जनक ने सीता की उत्पत्ति का वर्णन किया था— "अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः । क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता ।। भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा । वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा ।।" ( वा० रा० १।६६।१३-१५ ) क्षेत्र-शोधनार्थ अग्निचयन के लिए देवयजन क्षेत्रमण्डल का कर्षण करते हुए मेरी लाङ्गलपद्धति से सीता का उत्थान हुआ था, इसी लिए उसका नाम सीता रखा गया है। भूतल से उत्थित अतएव अयोनिजा सीता मेरी पुत्री है । टीकाकारों ने भी ऐसी ही व्याख्या की है। पद्मपुराण में “अथ लोकेश्वरी लक्ष्मीर्जनकस्य पुरे स्वतः । शुभक्षेत्रे हलोत्खाते तारे चोत्तरफाल्गुने ।। अयोनिजा पद्मकरा बालार्कशतसन्निभा । सीतामुखे समुत्पन्ना बालभावेन सुन्दरी ।। सीतामुखोद्भवात्सीता इत्यस्यै नाम चाकरोत् ।” लोकेश्वरी लक्ष्मी जनकपुर में उत्तराफाल्गुनी शुभ नक्षत्र में हलोत्खात यज्ञीय शुभ क्षेत्र में अयोनिजा पद्मकरा बालार्कशतभास्वरा स्वतः आविर्भूत हुई । टीकाकारों ने भी यही सब बातें लिखी हैं । लङ्काकाण्ड के अनुसार अग्नि में प्रविष्ट होकर भी सीता ने अपने दिव्य रूप का अनुभव कराया और अन्त में उत्तरकाण्ड के अनुसार दिव्य-

अध्याय बालकाण्ड ४४७ सिंहासनासीन होकर दिव्य लोक पधार गयीं । इन सबको प्रक्षेप कहना सचमुच पाश्चात्य-मनोवृत्ति का साहस ही है । बुल्के ने यह भी लिखा है कि ब्रज के प्रचलित लोकगीत के अनुसार सीता भाट की बेटी थी । शिकार खेलते समय राम का उनसे परिचय हुआ । वस्तुतः आर्ष वाल्मीकिरामायण तथा अन्य पुराणादि आर्ष ग्रन्थ ही राम ओर सीता के वृत्त में प्रमाण हो सकते हैं । तद्विरुद्ध कल्पनाएँ निराधार तथा निरर्गल ही हैं । आश्चर्य तो यह है कि एक ओर बुल्के भाटों के लोकगीतों को प्रमाण मानते हैं और दूसरी ओर वाल्मीकि जैसे महर्षि की खिल्ली उड़ाने में नहीं सकुचाते । पउमचरियं के अनुसार जनक की पत्नी विदेहा से सीता अपने भ्राता भामण्डल के साथ उत्पन्न हुई थीं । जन्मते ही भामण्डल को कोई देवता उठा ले जाकर किसी अन्य राजा के यहाँ छोड़ देता है । यह वृत्तान्त भी वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध होने से अनादरणीय ही है । कालिकापुराण (अ० ३८) के अनुसार नारद निःसन्तान जनक को यज्ञ करने का परामर्श देते हुए कहते हैं कि यज्ञ के प्रभाव से दशरथ के चार पुत्र हुए हैं । तदनुसार जनक यज्ञ के लिए क्षेत्र तैयार करते समय एक पुत्री और पुत्र पाते हैं । यह कथा भी किसी कल्प की हो सकती है, पर इसके अनुसार भी सीता अयोनिजा ही हैं । विष्णुपुराण में यज्ञभूमि से ही सीता के आविर्भाव का वर्णन है । पद्मपुराणीय उत्तरखण्ड के बङ्गीय पाठ के अनुसार जनक को भूमि में पेटिकानिहित एक धनुष मिला था, जिसे खोलने पर जनक ने एक कन्या देखी । उसे सीता नाम देकर ग्रहण किया । सीतोपनिषद् में भी हलाग्रजात होने के कारण सीता नाम का उल्लेख हुआ है । उसके अनुसार भी सीता ही श्री, भू, नीला आदि दिव्य शक्तियों का दिव्य केन्द्र हैं । वीरलक्ष्मी, ऐश्वर्यलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी आदि सब उसी के अंश हैं । इसी दृष्टि से वह कृषि की अधिष्ठात्री देवी भी मानी जाती हैं । अतएव वैदिक सीता ऐतिहासिक न होकर लाङ्गलपद्धति के मानवीकरण का परिणाम है, बुल्के का यह कथन सर्वथा निराधार है । क्योंकि वैदिक साहित्य की व्याख्या ही रामायण, महाभारत आदि आर्ष इतिहासों एवं पुराणों में की गयी है । कृषि की अधिष्ठात्री देवी जिसका अंश है, वह महालक्ष्मी ही ऐतिहासिक राजकुमारी सीता के रूप में प्रकट हुई थी । यही भारतीय आस्तिकसमाज सम्मत वेद, रामायण, भारत तथा पुराणों का सारार्थ है । गौडीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठों की मेनका सम्बन्धित जनक की मानसी पुत्री भी हलाग्रसमुद्भूत सीता में ही गतार्थ है । बुल्के का यह कथन भी असङ्गत है कि सीता की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कोई एक वृत्तान्त प्रामाणिक नहीं माना जाता था, क्योंकि वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों में अयोनिजा सीता प्रामाणिक है ही । वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही असमियारामायण, कृत्तिवासरामायण तथा बलरामदासरामायण का भी अभिप्राय लगाना उचित है । मेनका या उर्वशी को देखकर उसी के समान कन्या प्राप्त करने की इच्छा जनक जैसे ज्ञानी को नहीं हो सकती है । ज्ञानी को कामवासना नहीं हो सकती है । जनक का तपोमय तेज भी परम्परा से भूमिजा सीता में हेतु हुआ हो तब भी सीता अयोनिजा तो रही ही । वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड सर्ग १७ में वेदवती सीता के रूप में उत्पन्न हुई । ४१० वें अनुच्छेद में बुल्के कहते हैं कि “वेदवती की कथा में सीता के पूर्वजन्म का वर्णन किया गया है, अतः उसकी उत्पत्ति के समय सीता के लक्ष्मी के अवतार होने का सिद्धान्त सर्वमान्य नहीं था !” उनका यह कथन भी असङ्गत ही है, क्योंकि पूर्वजन्म की कथा-मात्र से अवतारत्व का विरोध नहीं होता, क्योंकि पुराणों में सीता का जन्मान्तर में रुक्मिणी होना भी प्रसिद्ध ही है । राम का भी जन्मान्तर में कृष्ण होना प्रसिद्ध है । “राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि ।” (वि० पु०) लक्ष्मी ही विष्णु के राघव होने पर सीता होती हैं एवं कृष्ण होने पर रुक्मिणी होती हैं । सभी जीव सीताराम के ही अंश होते हैं । उपासना और तपस्या के बलपर उन्हें उनका सायुज्य भी प्राप्त होता है । वेदवती ने

४४८ रामायणमीमांसा त्रयोदश नारायण को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया था— “नारायणो मम पतिर्न त्वन्यः पुरुषोत्तमात् । आश्रये नियमं घोरं नारायणपरीप्सया ॥” (वा० रा० ७।१७।१८ ) काममोहित रावण ने जब उसका केशग्रहण किया तब उसने क्रुद्ध होकर असिभूत हाथों से केशों को छिन्न कर दिया और धर्मी ( जनक ) की अयोनिजा पुत्री होकर मैं तेरे वध के लिए प्रकट होऊँगी यह कहकर वह अग्नि में प्रविष्ट हो गयी— “तस्मात्त्वयोनिजा साध्वी भवेयं धर्मिणः सुता ।” ( वा० रा० ७।१७।३२ ) । ऋषियों ने राम से कहा है कि आप विष्णु हैं और वेदवती जनकजा हैं। यहाँ भी सीता को अयोनिजा कहते हुए भी ऋषियों ने उसे जनक-कुल में उत्पन्न होने का उपचार किया है । “अयोनिजा धर्मिणः सुता”, “उत्पन्ना मैथिलकुले जनकस्य महात्मनः ।” ( वा० रा० ७।१७।३७ ), अतः पूर्वोक्त वचनों का भी यही अर्थ समझना चाहिये । वेदवती तप के बल से महालक्ष्मी के साथ सायुज्यभाव को प्राप्त हो गयी, अतः महालक्ष्मी के सीतारूप में जन्म लेने से ही उसका भी सीतारूप जन्म समझा गया । वस्तुतः वेदवती भी लक्ष्मी की अवतारभूता ही थी । उसने स्वयं कहा था कि ब्रह्मर्षि कुशध्वज से वाङ्मयी वेदमयी महालक्ष्मी ही वेदवती के रूप में प्रकट हुई थी । यहाँ भी वे अयोनिजा ही हैं । सीतोपनिषद् में सीता को वेदमयी भी कहा गया है । वही रावण को शाप देने और उसका वध करने के लिए आविर्भूत हुई थीं । “तस्याहं कुर्वतो नित्यं वेदाभ्यासं महात्मनः । संभूता वाङ्मयी कन्या नाम्ना वेदवती स्मृता ॥” ( वा० रा० ७।१७।९ ) यही बात रामाभिरामी टीका में स्पष्ट है— “भगवतः शक्तिर्महालक्ष्मीरेव रावणवधाय रावणं शप्तुमवतीर्णा अस्या वाङ्मयीत्वं सार्वात्म्यात् ।” अतएव इसी प्रसङ्ग में यह भी कहा गया है कि यह महाभागा वेदी में अग्निशिखा के समान अन्य युगों में भी हलोत्कृष्ट क्षेत्र से पुनः उत्पन्न होगी— “एवमेषा महाभागा मर्त्येषूत्पत्स्यते पुनः । क्षेत्रे हलमुखोत्कृष्टे वेद्यामग्निशिखोपमा ॥” ( वा० रा० ७।१७।३६ ) महासुन्दरीतन्त्र का वचन उद्धृत करके रामाभिरामी में कहा गया है कि वैशाख शुक्ल नवमी के दिन भूमिसुता सीता सीतामुख से उत्पन्न हुईं । जनक ने उसका पालन किया । वही महाभागा रामपत्नी हुई । उस दिन श्रद्धाभक्तियुक्त लोगों को वित्तशाठ्य छोड़कर सम्यक् महोत्सव मनाना चाहिये । गीत, वादित्र, नृत्य तथा पुराणपाठ, लक्ष्मीसूक्तपाठ आदि करना चाहिये । इससे धन, धान्य, सौभाग्य तथा पुत्रादि, सेनादि का विस्तार होता है । राम के प्रसाद से प्राणी ऐसा करने से सब बाधाओं से मुक्त हो जाता है और सनातन राम को प्राप्त कर लेता है— “वैशाखे शुक्लनवम्यामुत्पन्ना साऽवनीसुता । सीतामुखात् सा सञ्जाता पालिता जनकेन च ॥ रामपत्नी महाभागा सीता नामेति विश्रुता । तस्मिन् दिने रामभक्ताः श्रद्धाभक्तिसमन्विताः ॥ महोत्सवापराः सर्वे वित्तशाठ्यविवर्जिताः । गीतवादित्रनृत्याद्यै रामभक्तिपरायणाः ॥

अध्याय बालकाण्ड ४४९ वैशाखसितनवम्यां पुराणपठनं तथा। लक्ष्मीसूक्तं पठंस्तत्र याति रामं सनातनम्॥ सौभाग्यं धनधान्यञ्च पुत्रसन्ततिविस्तृतम्। रामप्रसादालभते मुच्यते सर्वपातकात्॥” (वा० रा० ७।१७।३७ की टीका) अतएव देवीभागवत (९।१६) तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण (प्रकृतिखण्ड अ० १४) में इसी कथा का स्पष्टी- करण किया गया है। बुल्के का परिमार्जन शब्द असङ्गत है। उनकी दृष्टि में ये सभी ग्रन्थकार मिथ्याभाषी तथा मिथ्यालेखक हैं और उसी मिथ्या भाषण और लेखन द्वारा कथाओं में सुधार करते हैं। ईसाई-संख्या बढ़ाने की धुन में ही वे लोग हिन्दूशास्त्रों में इस प्रकार दुरभिसन्धिपूर्ण दुष्कल्पना करते हैं। वाल्मीकिरामायण के अनुसार स्पष्टरूप से कहा गया है कि कुशध्वज और उनकी पत्नी लक्ष्मी की उपासना से पुत्रीरूप में लक्ष्मी के प्रकट होने का वरदान प्राप्त करते हैं। जन्म-ग्रहण करते ही लक्ष्मी वैदिक मन्त्रों का गान करती हैं। इस कारण उन्हें वेदवती कहा गया है। कुछ समय बाद वह हरि को प्राप्त करने के लिए तप करती है। रावण से अपमानित होकर रावण को उसके नाश का शाप देकर योगबल से देह-त्याग कर सीता के रूप में उत्पन्न होती है। सीता तथा लक्ष्मी की अभिन्नता के विश्वास की प्रेरणा से वेदवती की कथा को यह नवीन रूप दिया गया है। बुल्के की इस धारणा का आधार बुल्के की दुर्भावना छोड़कर अन्य कुछ नहीं है। क्योंकि पूर्वोक्त व्याख्या के अनुसार वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड में ही उसको वाङ्मयी कहा गया है और युग युग में उसका पुनः पुनः प्रादुर्भाव कहा गया है। कृत्तिवासरामायण में भी उसी का विवरण दिया है। कुशध्वज वेदपाठ कर रहे थे उस समय उनके मुख से एक कन्या उत्पन्न हुई। उन्होंने उसका नाम वेदवती ही रखा। शुम्भदैत्य ने कुशध्वज को मार डाला एवं वेदवती तपस्या करने गयी। तप करते समय रावण से अपमानित होकर वेदवती ने अग्नि में प्रवेश किया (वा० रा० ७।१७)। वेदवती सागरतट पर तपस्या करती थी। बलरामदासरामायण में उस कथा में कुछ विकार जुड़ गया है। रावण के द्वारा अपमानित होने के पश्चात् वह उसे शाप देती है एवं अपने तपोबल से अग्नि उत्पन्न कर उसमें प्रवेश करती है। कुछ दिन बाद रावण वहाँ जाकर देखता है कि वेदवती का शरीर जला नहीं। वह उसे पुष्पक द्वारा लङ्का ले जाता है। मन्दोदरी को उसके मांस का भोजन निर्माण करने का आदेश देता है। नारद के परामर्श से मन्दोदरी दूसरा मांस तैयार कराती है तथा वेदवती का शरीर समुद्र में बहा देती है। वरुण उसे जम्बूद्वीप पहुँचा देता है। वहाँ जनक हल चलाते समय सीता के रूप में उसे प्राप्त करते हैं। देवीभागवत एवं ब्रह्मवैवर्त की कथा जो सर्वथा वाल्मीकिरामायण के अनुसार है उसे तो बुल्के परिमार्जन मानते हैं, परन्तु पउमचरियं की अत्यन्त विलक्षण कथा को वाल्मीकिरामायण का विस्तार- मात्र मान लेते हैं। यही है भ्रान्ति और दुराग्रह का नमूना। पउमचरियं के अनुसार सागरदत्त की पुत्री गुणवती की सगायी धनदत्त (भावी राम) के साथ होती है। उसकी माता रत्नप्रभा उसे धनी श्रीकान्त (भावी रावण) को देना चाहती है। फलतः धनदत्त के भाई वसुदत्त (भावी लक्ष्मण) तथा श्रीकान्त द्वन्द्व युद्ध में एक दूसरे का वध करते हैं। मरणोपरान्त दोनों हरिण बन जाते हैं। गुणवती भी मरकर हरिणी बनती है। उसी के कारण फिर दोनों हरिण लड़कर मर जाते हैं। अनेक जन्मों के बाद गुणवती पुरोहित श्रीभूति की वेदवती कन्या बनती है। स्वायम्भू राजकुमार वेदवती को चाहता है पर श्रीभूति उसे कन्या देना नहीं चाहता है। स्वायम्भू उसकी हत्या कर देता है। वेदवती के साथ बलात्कार करता है। वेदवती उसे शाप देकर श्राविका बन जाती है। बाद में स्वायम्भू और वेदवती

क्रमशः सीता और दशमुख बनते हैं । वाल्मीकिरामायण के आदर्श में और उक्त कथा में महान् अन्तर है । वाल्मीकि- रामायण की वेदवती का रावण स्पर्श तक नहीं कर पाता, केशस्पर्श होने से भी वेदवती अपने हाथ को ही तलवार बनाकर केशों को छिन्नकर देती है, किन्तु पउमचरियं के अनुसार रावण उससे बलात्कार करता है । इसमें रावण और लक्ष्मण का पहले भी कई बार युद्ध होता है । इसमें जैसे मादा पशु के लिए दो पशु लड़ते हैं वैसे ही लक्ष्मण और रावण लड़ते हैं । इसपर भी दोनों ही ग्रन्थ समानरूप में रखे जाते हैं, यह भी कम आश्चर्य नहीं है । जैनों के अनुसार रावण एक धर्मभीरु जैनी ही है । असमिया बालकाण्ड के अनुसार भगवान् ने राम के रूप में अवतार लेने की प्रतिज्ञा की तो लक्ष्मी ने पूछा मैं क्या करूँ ? उन्होंने कहा तुम जनक के यहाँ जन्म लो । लक्ष्मी पृथ्वी पर उतर कर एक पर्वत के शिखर पर बैठ गयीं । रावण उन्हें देखकर मोहित हुआ । लक्ष्मी ने उसे डाँटा कि तुमको मारनेवाला जन्म ले चुका है । यह कहकर वह सागर में कूदकर अन्तर्धान हो जाती है । तब सागर में एक सौ योजन का द्वीप ऊपर आया और लक्ष्मी उसपर विराजमान रही । वसुमती ने आकर लक्ष्मी को आदरपूर्वक अपने गर्भ में धारण कर लिया । बाद में यज्ञ के लिए लोगों ने हल जोतते समय पृथ्वी में एक डिम्ब पाया तथा उसे मिथिलानगर में ले गये । राजा जनक ने डिम्ब को तोड़कर उसमें से एक कन्या निकाली ( अध्याय २३ ) । बुल्के कहते हैं, "रामायण की अलौकिक सीता-जन्मकथा का परिवर्धन किया जाना अत्यन्त स्वाभाविक था । भूमि में पड़ी हुई कन्या आयी कहाँ से ? और वह रावण-नाश का कारण क्यों सिद्ध हुई । वेदवती की कथा में इन प्रश्नों का उत्तर मिलता है । सीता-हरण के पूर्व ही सीता-रावण-सम्बन्ध का इस कथा में प्राचीनतम उल्लेख मिलता है । बाद की कथाओं में यह सम्बन्ध अधिक निकट का हो जाता है । जनक द्वारा प्राप्त होने के पूर्व सीता का किसी न किसी तरह लङ्का से सम्बन्ध स्थापित किया गया है", पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि रामायण की सीता की अलौकिक जन्मकथा निरपेक्ष ही है । भारतीय शास्त्रों की पद्धति से परिचित लोगों के लिए ईश्वर एवं उसकी शक्तियाँ प्रयोजन के अनुसार कहीं भी प्रकट हो सकती हैं— "हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम तें प्रकट होहिं मैं जाना ॥" ( रा० मा० १।१८४।३ ) पाषाणस्तम्भ से नृसिंह का प्राकट्य होता है । मत्स्य, कूर्म, वराह रूपधारी भगवान् के प्राकट्य भी कुछ ऐसे ही हैं । फिर भी कृषि की अधिष्ठात्री शक्तिविशिष्ट महालक्ष्मी का तो भूमि से प्रादुर्भूत होना अत्यन्त स्वाभाविक ही था । एक ब्रह्मज्योति ही सीता-राम, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण, कामेश्वरी-कामेश्वर आदि दो रूपों में प्रकट होती है । विष्णु और लक्ष्मी के समान ही राम और सीता का प्रादुर्भाव होना अनिवार्य है । राम के आविर्भाव का हेतु बालकाण्ड में निर्दिष्ट रावण-वधादि ही है । वेदवती की कथा को भी नवीन बतलाना उसे प्रक्षेप कहने का ही उपक्रम है । वाल्मीकिरामायण की दृष्टि से वह प्राचीन है । प्रसङ्गानुरूप ऋषियों ने उसे उत्तरकाण्ड में राम को सुनाया था । सीता तथा लङ्का के सम्बन्ध का पुराणों में भी अनेक शापों के रूप में वर्णन है । बुल्के कहते हैं—"अनेक ग्रन्थों में सीता को रावणात्मजा कहा गया है । भारत, तिब्बत, खोतान, हिन्दोनेशिया, श्याम और वसुदेवहिण्डि में यह कथा मिलती है । उसके अनुसार विद्याधर मय ने रावण के पास अपनी पुत्री मन्दोदरी के विवाह का प्रस्ताव रखा था, लक्षणज्ञों ने कहा कि इसकी प्रथम सन्तान अपने कुलनाश का हेतु बनेगी । पर रावण उसपर मोहित हो गया था, अतः प्रथम सन्तान के त्याग का निर्णय कर उसने उससे विवाह कर लिया । मन्दोदरी को जब प्रथम पुत्री उत्पन्न हुई तो नाना रत्नों के साथ एक मञ्जूषा में रखकर उसे कहीं छोड़ देने को कहा गया । मन्त्री ने उसे मिथिला में जनक के खेत में रख दिया । बाद में जनक से कहा गया कि यह बालिका हल की रेखा से उत्पन्न हुई है । जनक ने उसे ग्रहण कर अपनी रानी को सौंप दिया । गुणभद्र के उत्तरपुराण की

निम्न कथा में इसका और वेदवतीकथा का समन्वय किया गया है । अलकापुरी के राजा अमितवेग की पुत्री राजकुमारी मणिमती विन्ध्यगिरि पर विजयार्थ तप कर रही थी । रावण ने उसे प्राप्त करने का प्रयास किया । सिद्धि में विघ्न उत्पन्न होने के कारण मणिमती ने क्रुद्ध होकर संकल्प किया कि मैं रावण की पुत्री बन कर उसके नाश का कारण बनूँगी । फलस्वरूप वह मन्दोदरी के गर्भ से उत्पन्न हुई । उसका जन्म होते ही लङ्का में भूकम्प आदि अपशकुन हुए । यह देख ज्योतिषियों ने कहा यह कन्या रावण के नाश का कारण होगी । इसपर रावण ने मारीच को आदेश दिया कि वह उसे किसी दूर देश में छोड़ दे । मन्दोदरी ने कन्या को द्रव्य तथा परिचयात्मक पत्र के साथ एक मञ्जूषा में रख दिया, मारीच ने उसे मिथिला-भूमि में गाड़ दिया, जहाँ उसी दिन वह कृषकों द्वारा पायी गयी । वे उसे जनक के पास ले गये । जनक ने मञ्जूषा खोलकर उससे कन्या को निकाल कर उसे अपनी पत्नी वसुधा को सौंप दिया । यह वृत्तान्त वेदवती की कथा पर ही आधारित है । सीता की धर्ममाता वसुधा होना भी यह सूचित करता है कि रचयिता वाल्मीकि भी उस कथा से परिचित था जिसमें सीता को पृथ्वी की पुत्री कहा गया है । महाभागवत देवीपुराण के अनुसार भी सीता मन्दोदरी से उत्पन्न हुई थी । बाद में वह पृथ्वी से आविर्भूत हुई है ।'' वस्तुतः वसुदेवहिण्डि और उत्तरपुराण कोई आर्ष ग्रन्थ नहीं हैं । सीता और राम के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण तथा अन्य आर्ष पुराण ही प्रमाण हैं । महाभागवत, देवीपुराण अवश्य आर्ष ग्रन्थ हैं, परन्तु उनका वाल्मीकिरामायण से समन्वय करके यही अर्थ समझना चाहिये कि तयोक्त मन्दोदरी-कन्या भी महालक्ष्मी के साथ सायुज्य को प्राप्त हो गयी । अत- एव महालक्ष्मी की अवतारभूत सीता में उसका भी संनिवेश था । “सीता मन्दोदरीगर्भे संभूता चारुरूपिणी । क्षेत्रजा तनयाप्यस्य रावणस्य रघूत्तम ॥” ( महाभा० ४२।६२ ) मन्दोदरी के गर्भ से चारुरूपिणी कन्या आविर्भूत हुई । रावण की तो वह क्षेत्रजा ही कन्या थी, औरसी नहीं । इस दृष्टि से श्रीदशरथ के यज्ञलब्धचरु के अंश से सीता के जन्म की बात भी संगत होती है । अन्यथा यदि सीता मन्दोदरी की प्रथम सन्तान होती तो यह भी कहना होगा कि मेघनाद आदि सब उससे छोटे होंगे फिर इतनी कम उम्र में उनकी विशिष्ट तपस्या तथा इन्द्रादि पर विजय कैसे संभव होती है ? काश्मीरीरामायण की यह कथा कि ‘मन्दोदरी कन्या के गले में पत्थर बाँधकर उसे समुद्र में फेंक देती है’ तथा अन्य कथा के अनुसार रावण द्वारा कन्या को मञ्जूषा में बन्द कर समुद्र में फेंक देने की कथा में विकृति ही है । यह भी कथा वैसी ही है कि एक ब्राह्मण ने किसी बालिका के सम्बन्ध में रावण से कहा कि यह तुम्हारे निधन का कारण बनेगी । यह सुनकर रावण ने उसपर कड़ा पहरा लगा दिया । जब वह कन्या केवल छः मास की थी ऐसी भयङ्कर वर्षा हुई कि उसके पास के सभी व्यक्ति डूबकर मर गये । वह कन्या मञ्जूषा में होने के कारण जल- प्रवाह के द्वारा सिंहलद्वीप पहुँच गयी । इसी कन्या ने उन राम से विवाह कर लिया जिनके द्वारा रावण का वध हुआ । तिब्बती तथा खोतानी रामायणों में रावण की पुत्री जन्म-कुण्डली के अशुभ ग्रहों के कारण परित्यक्त की जाती हैं एवं उसे एक पेटिका में रखकर जल में फेंक दिया जाता है । तिब्बती रामायण के अनुसार पेटिका खोलने- वाला जनक के स्थान पर एक कृषक है । खोतानी रामायण के अनुसार एक ऋषि उसका भरण-पोषण करते हैं । सेरतकाण्ड में भी रावण-महिषी एक पुत्री को जन्म देती है, जो श्री का अवतार थी, पर उसे यह मालूम था कि यदि उसकी सन्तान पुत्री हो तो रावण को उसमें अनुरक्ति होगी । इसी लिए वह उसे पेटी में बन्द कर समुद्र में फेंकवा देती है । बाद में मंतिलीनिवासी कल नामक ऋषि उसको पाते और पालते हैं । उसका नाम सीता रखते हैं । बुल्के

को मंतिली से मिथिला का स्मरण होता है और यह कथा भी वाल्मीकि की सीता-कथा से मिलती है । सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार मन्दोदरी की उस कन्या के मुख का तालू काला था, अतः लक्षणज्ञों ने उसे अशुभ कहा । वह समुद्र में फेंकी गयी । उसे मकर ने डूबने से बचाया । मकर की प्रार्थना से मरुतों ने उसे एक ऋषि की वाटिका में एक पद्म पर रख दिया । ऋषि ने उसका पुत्री की तरह पालन किया । इस कथा पर पद्मजा सीता का प्रभाव पड़ा है । कम्बोडिया के रामकेर्ति के अनुसार जनक यमुना के तीर पर यज्ञ के लिए हल चलाते हुए सीता को एक बेड़े पर देखते हैं। उसे जनक ने पुत्री बनाया । श्याम के रामकियेन के अनुसार दशरथ-यज्ञ के चरुसम्बन्धी अष्टमांश को खाकर मन्दोदरी ने एक कन्या उत्पन्न की, जो वास्तव में लक्ष्मी की अवतार थी । रावण विभीषण आदि ज्योतिषियों से उसे अपने वंश के नाश का कारण जानकर उसे विभीषण को देता है । वह उसे घड़े में रखकर नदी में डाल देता है । नदी में एक कमल उत्पन्न होता है जो उस घड़े का आधार बन जाता है । लक्ष्मी की दिव्य शक्ति से वह घड़ा जनक के पास पहुँचता है । जनक वन में उसी नदी पर तप कर रहे थे । वे घड़ा उठाकर वन में ले जाते हैं तथा एक पेड़ के नीचे खोदकर प्रार्थना करते हैं : यदि यह कन्या राजा के रूप में उत्पन्न नारायणावतार की रानी बननेवाली हो तो इस स्थान पर एक कमल उत्पन्न हो जाय, जो उस घड़े को धारण कर सके । उसी क्षण वहाँ कमल उत्पन्न हो जाता है । उसपर घड़ा रखकर उसे मिट्टी से ढँक कर जनक पुनः तपस्या करने लगते हैं । तपस्या से संतोष न पाकर १६ वर्ष बाद जनक अपनी राजधानी लौटने का निश्चय करते हैं । किन्तु ढूँढने पर भी वे उस घड़े को नहीं पाते । सेना बुलायी गयी । सैनिक भी खोज में असफल होते हैं । अन्त मे जनक हल चलाते हैं तब वह घड़ा अपने आप हल-पद्धति से प्रकट होता है । उसमें एक अत्यन्त सुन्दर कन्या पद्म पर बैठी प्राप्त होती है । सीता ( लाङ्गल-पद्धति ) से उत्पन्न होने के कारण उसका सीता नाम पड़ता है ( अ० रा० ) । वस्तुतः वाल्मीकिरामायण और पुराणों की कथा ही विभिन्न देशों से होती हुई वहाँ पहुँची है, अतः अनेक प्रकार की कल्प- नाएँ उसके साथ जुड़ गयीं । किन्तु राम विष्णु हैं, सीता लक्ष्मी हैं और जनक से सीता का पिता-पुत्री का सम्बन्ध है । वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों का यह अंश प्रायः सर्वत्र व्याप्त है । सीता लक्ष्मी हैं, इस दृष्टि से विविध कमलों तथा पद्द्मों का सम्बन्ध भी उनके साथ है । रामजातक तथा पालकपालाम के अनुसार रावण ने इन्द्र का रूप धारण कर इन्द्राणी को धोखा दिया था, अतः इन्द्राणी ही सीता बनकर रावण के नाश का हेतु बनती है। पालकपालाम के अनुसार—रावण इन्द्र से इन्द्रजाल सीखता था । कालान्तर में इन्द्राणी सीता के रूप में प्रकट होकर अपने पिता रावण पर छूरी का प्रहार करती है, इसपर बालिका बेड़े पर रखकर समुद्र में बहायी जाती है । किसी टापू में उसका ऋषि ने पुत्रीवत् पालन किया है, यह सब वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप हैं । पद्मजा सीता क्षेमेन्द्रकृत दशावतारचरित ( १०।१०४ ) के अनुसार रावण एक विशिष्ट स्थान पर बार-बार जाता है । वह आरम्भ में एक पर्वत देखता है, वहीं फिर नगर, फिर जङ्गल देखता हैं, पुनः वहीं विस्तृत गड्ढा और फिर कमलयुक्त सरोवर देखता है । वहाँ एक शिवलिङ्ग स्थापित कर कमलों से शिव की पूजा करता है । पुनः वह एक कनकपद्म पर एक दिव्य कन्या, जो लक्ष्मी है, देखता है । उसे पुत्री के रूप में ग्रहण कर लङ्का लाता है । नारद मन्दोदरी की गोद में उसे देखकर कहते हैं । यह कन्या चपलेन्द्रिय रावण की अभिलाषा की भूमि बनेगी— ‘‘कन्या भविष्यत्यभिलाषभूमिंश्चपलेन्द्रियस्य’’ यह सुनकर मन्दोदरी उसे स्वर्णपेटिका में बन्द कर किसी दूसरे देश में गाड़ देने का आदेश देती है । जनक यज्ञार्थ हल चलाते हुए उसे प्राप्त करते हैं । तोरवेरामायण ( १।१६ ) के अनुसार हल जोतते समय जनक ने पृथ्वी के नीचे एक कमलों का सरोवर पाया और वहाँ कमल पर विराजमान एक शिशु देखा । जनक अलौकिक दृश्य से भयभीत होकर लक्ष्मी के इस स्थान को छोड़ देने की बात सोच रहे थे कि नारद आ गये और कहा कि इसका

अध्याय बालकाण्ड ४५३ नाम सीता रखो और इसका पालन करो। विष्णु भी अवतार लेनेवाले हैं। वे सीता को पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे। तुम इसका स्वयंवर करना, शिव-धनुष चढ़ानेवाले को ही इसे देना। वाल्मीकिरामायण की टीका में गोविन्दराज के अनुसार वेदवती एक पद्मपर पुनः उत्पन्न होती है। रावण उसे लङ्का ले जाता है और लक्षणज्ञों से उसे अपनी मृत्यु का कारण जानकर उसे समुद्र में फेंक देता है। वहीं कन्या जनक को मिलती है। वस्तुतः उक्त कथाओं का इतना ही तात्पर्य है कि सीता साक्षात् लक्ष्मी का अवतार थी। उसके वर्णन में कवियों की कल्पनाओं में भेद है। वस्तुतत्त्व एक ही है। रक्तजा सीता अद्भुतरामायण (सर्ग ८) के अनुसार रावण दिग्विजय के प्रसङ्ग में ऋषियों से राजकर लेता है। द्रव्य के अभाव में ऋषि लोग कुछ रक्त देते हैं। वह ऋषि गृत्समद के पात्र में एकत्रित किया जाता है। उस पात्र में कुश का किञ्चित् रस था जिसमें गृत्समद के मन्त्रों के फलस्वरूप लक्ष्मी विद्यमान थी। रावण उस पात्र को लङ्का ले जाता है। मन्दोदरी को यह कह कर देता है कि इसमें विष भरा है। कभी रावण की परस्त्री-अनुरक्ति से खिन्न मन्दोदरी आत्महत्या के विचार से उस रक्त का पान कर लेती है, गर्भवती हो जाती है एवं वह तीर्थयात्रा के लिए निकलती है। कुरुक्षेत्र में उस गर्भ को गाड़ देती है बाद में जनक के हल चलाने से वही कन्या भूमि से निकलती। जनक उसे पुत्रीवत् पालते हैं। सिंहलद्वीप की रामकथा में भी उक्त कथा का निर्देश है। एक अन्य कथा के अनुसार मन्दोदरी ने उस रक्त में से कुछ ही बूंदों का पान किया था। उसी से उससे कन्या उत्पन्न होती है। रावण-कोप की शङ्का से उसी घट में उसे रखकर समुद्र में छोड़ देती है। वही जनक के राज्य में पहुँच कर कृषकों द्वारा जनक के पास लायी जाती है। एक अन्य कथा के अनुसार महादेव के धनुष के प्रताप से जनक ने रावण को कई बार पराजित किया था। अद्भुतरामायण के अनुसार रावण राजस्व के स्थान में ऋषियों से रक्त लेता है। ऋषि यह शाप देते हैं कि इस रक्त से तुम्हारा नाश होगा। रावण शाप की अवज्ञा कर उसे लङ्का ले जाता है। उससे वहाँ अनावृष्टि आदि अनिष्ट घटित होते हैं। ज्योतिषियों ने कहा जब तक यह रक्त लङ्का में रहेगा विपत्तियों का अन्त नहीं होगा। यह सुनकर रावण जनक से हुई पराजय का बदला लेने के लिए उस घड़े को मिथिला में गड़वा देता है। वहाँ भी अनावृष्टि हुई। तब मन्त्रिगण राजा को रानी के साथ हल चलाने का परामर्श देते हैं। वैसा करने पर राजा ने उस घड़े को पाया। उसमें ऋषिरक्त से उत्पन्न सीता दिखायी पड़ी। उसके बाद सब अनर्थ शान्त हो गये। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३ एवं बिहौररामकथा में भी ऐसा ही उल्लेख है। इन कथाओं का भी तात्पर्य यही है कि सीता मोक्षलक्ष्मी, राज्यलक्ष्मी तथा ऐश्वर्यलक्ष्मी के साथ ही ऋषियों की तपोमयी लक्ष्मी-भी हैं। आनन्दरामायण के अनुसार राजा पद्माक्ष कठोर तपस्या के बाद लक्ष्मी को पुत्री के रूप में प्राप्त कर उसका पद्मा नाम रखता है। पद्मा के स्वयंवर में पद्माक्ष युद्ध के कारण मारा जाता है। यह देखकर पद्मा ने अग्नि में प्रवेश किया। एक दिन उसके अग्निकुण्ड से निकलने पर रावण ने उसे देख लिया। इस पर वह शीघ्र ही अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। रावण अग्नि बुझाकर उसकी राख में पाँच दिव्य रत्न देखकर एवं उन्हें एक पेटिका में बन्द कर लङ्का ले जाता है। लङ्का में कोई भी उस पेटिका को उठा नहीं सकता। उसे खोलने पर उसमें कन्या मिली। मन्दोदरी के परामर्श से पेटिका मिथिला में गड़वा दी जाती है। बाद में उसे एक शूद्र पाता है, जो ब्राह्मण के लिए खेती कर रहा था। वह ब्राह्मण पेटी जनक को प्रदान करता है। खोलकर जनक ने उसमें कन्या देखी और अपनी पुत्री बनाया। इससे भी हिरण्मयी लक्ष्मी का हिरण्यरेता अग्नि में निवास और उसी से आविर्भाव सूचित किया गया है।

३. तृतीय काण्ड: किष्किन्धा व सुन्दरकाण्ड: बालि-वध धर्म-मीमांसा एवं हनुमान् पराक्रम

दक्षिण भारत के वृत्तान्त के अनुसार लक्ष्मी एक फल से उत्पन्न होती है। वेदमूनि नामक एक ऋषि द्वारा उसका पोषण होता है। उसका नाम सीता था। बाद में वह समुद्र तट पर तप करने जाती है। इसके सौन्दर्य की चर्चा सुनकर रावण उसके पास पहुँचता है, जिसपर वह अग्नि में प्रवेश करके भस्म हो जाती है। राख को वेदमूनि एक स्वर्णयष्टि में बन्द कर देते हैं। बाद में वह यष्टि रावण के पास पहुँचती है, जिसे वह अपने कोषागार में रख देता है। कुछ दिनों के बाद उसमें आवाज सुनायी पड़ती है। उसे खोला जाता है। उसमें कन्या के रूप में सीता दिखायी पड़ती है। ज्योतिषी कहते हैं, इससे सिंहल का नाश होगा। रावण उसे स्वर्णमञ्जूषा में बन्द कर समुद्र में फेंक देता है। वह मञ्जूषा लहरों द्वारा गङ्गा में प्रविष्ट होकर खेत में पहुँचती है। कृषक उसे पाकर अपने राजा को देता है। बुल्के कहते हैं—जिस वृक्ष से सीता का जन्म हुआ वह अवश्य सीताफल ही है। वस्तुतः कृषि, पुष्प, फल आदि सभी लक्ष्मी के ही रूपान्तर हैं। सीतोपनिषद् में भी इसका उल्लेख है। सप्तशतीरहस्य में कहा गया है— “पुष्पपल्लवमूलादिफलाढ्यं शाकसञ्चयम् । काम्यानन्तरसैर्युक्तं क्षुत्तृण्मृत्युजरापहम् ॥” परमेश्वरी क्षुधा और तृष्णा मिटानेवाले तथा काम्य अनन्त रसों से युक्त पुष्प, पल्लव, मूल और फल से आढ्य शाकसञ्चय को धारण करती है। विविध रत्नमयी लक्ष्मीरूप से भी सीतोपनिषद् में सीता का प्राकट्य कहा गया है। किसी कथा में सीता का अग्निकुण्ड से उत्पन्न होना कहा गया है। कहा जाता है कि योगी का रूप धारण कर ईश्वर लङ्का में निवास करते थे। उसमें अनेकानेक उपद्रव उत्पन्न होने लगे। वे बाद में नगर के एक फाटक पर रहने लगे। वहाँ उन्होंने बहुत-सी राख एकत्रित कर ली जिससे एक बहुत बड़ा वृक्ष उत्पन्न हुआ। योगी चले गये। रावण ने वृक्ष के चार टुकड़े कर समुद्र में फेंकवा दिये। उनमें से एक टुकड़ा जनक के राज्य में पहुँच गया। वहाँ उसका यज्ञाग्नि में उपयोग हुआ। तब उस अग्नि से एक धनुष के साथ सीता की उत्पत्ति हुई। उसमें लिखा था जो इसे तोड़ेगा वही इस कन्या का पति होगा (पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १)। इसी तरह रावण की वाटिका के एक वृक्ष से किसी दिन एक कन्या उत्पन्न हुई। माली उसे रावण के पास ले जाता है। रावण को देखकर वह यक्षिणी का रूप धारण कर लेती है। रावण उसे घड़े में बन्द कर समुद्र में बहा देता है। वह घड़ा कन्नक नामक नगर में पहुँचता है। वहाँ का राजा सन्तानहीन था। किसी ऋषि ने राजा को घड़े का रहस्य बताया। राजा ने उसे प्राप्त किया। कन्या को अपनी कन्या बनाकर राजा ने उसका पालन किया। यहाँ भी देश और काल के भेद से वाल्मीकिरामायण की कथा के आधार पर ही उक्त विभिन्न कल्पनाएँ समझनी चाहिये। पर बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि सीता और लक्ष्मी के अभेद की कल्पना वाल्मीकि के बहुत बाद ही संभव हुई होगी, क्योंकि भूमिजा और वेदवती की कथा में ही पूर्वोक्त व्याख्या के अनुसार सीता तथा लक्ष्मी का अभेद स्पष्टरूप से कह दिया गया है। युद्धकाण्ड में भी सीता को लक्ष्मी कहा ही गया है। उसे प्रक्षेप कहना तो प्रमाणों से पिण्ड छुड़ाने का निष्फल प्रयासमात्र है—‘‘सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ।’’ (वा० रा० ६।११७। २७) टीकाकार भी कहते हैं ‘प्रसिद्धविष्णुपत्न्यभिन्नत्वात्’ (तिलक)। अतएव यह भी कहना अशुद्ध है कि सीता के कुल परम्परा के तथ्य के अभाव की पूर्ति के उद्देश्य से भूमिजा सीता के वृत्तान्त की उत्पत्ति हुई है और वेदवती- वृत्तान्त भूमिजा सीता की जन्मकथा की एक पूर्तिमात्र है, क्योंकि अटकलबाजी के आधार पर मनमानी कल्पना की अपेक्षा आर्ष वाल्मीकिरामायण के आधार पर ही तत्त्वनिर्णय करना उचित है। कई लोग कहते हैं यीशू क्राइष्ट की उत्पत्ति प्राकृत ढङ्ग से ही हुई थी, परन्तु अविवाहिता स्त्री से उत्पत्ति का कलङ्क धोने की दृष्टि से ही उसे कुमारी

अध्याय बालकाण्ड ४५५ कन्या से ईश्वर द्वारा उत्पन्न होने की कथा गढ़ी गयी है। ईसाई फ़ादर बुल्के विचार करें यदि सीता की भूमि से उत्पत्ति असंभव है तो क्या उपर्युक्त बातें संभव हैं ? जैसे महाभारत में अग्निकुण्ड से द्रौपदी, धृष्टद्युम्न आदि की उत्पत्ति होने पर कुल-परम्परा के तथ्यों में कोई बाधा नहीं पड़ी। द्रुपद के आयोजित अग्निकुण्ड से आविर्भूत होने के कारण सब द्रुपद के पुत्र-पुत्री माने गये वैसे ही जनक के यज्ञक्षेत्र में जनक की हलपद्धति से उत्पन्न होने के कारण सीता भी जनकपुत्री कहलायीं । वेदवती की कथा भी वस्तुस्थिति से सम्बन्धित है । किसी की पूर्ति के लिए कल्पित नहीं है, क्योंकि बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड सहित सारा वाल्मीकिरामायण प्रमाण है । सीता नाम के आधार पर भूमिजावृत्तान्त नहीं उत्पन्न हुआ, किन्तु भूमिजा- वृत्तान्त के अनुसार सीता नाम ही हुआ । क्योंकि अर्थों के अनुसार अन्वर्थ चातुर्होत्र, इन्द्र, अग्नि आदि नामों की पद्धति वैदिक वाङ्मय में प्रचुरमात्रा में मिलती है । राम आदि नामों की भी उत्पत्ति अर्थानुसारी ही हुई । दशरथजातक के अनुसार सीता दशरथ की पुत्री और राम की बहन थी, यह बौद्धों के वेदादि शास्त्रों के विरोध का नमूना ही है, क्योंकि उनके यहां वेदादि शास्त्र मान्य न होने से भगिनी से विवाह में भी कोई बाधा नहीं होती । बुल्के ने भी ४१९वें अनु० में इसे निर्मूल माना है। उड़ीसा में सुभद्रा वहाँ की इष्ट देवी हैं, अतः उत्कल लोग सीता को सुभद्रा से अभिन्न ही मानते हैं । जावा के रामकेलिङ्ग, मलय के सेरीराम तथा हिकायत महाराज रावण के अनुसार दशरथ की पटरानी मन्दोदरी के सौन्दर्य का वर्णन सुनकर रावण दशरथ से उसकी माँग करता है । मन्दोदरी प्रदान के लिए पति को उद्यत देखकर जादू द्वारा एक दूसरी मन्दोदरी बना देती है जिसे रावण ले जाता है । बाद में दशरथ मन्दोदरी से सत्य वृत्तान्त सुनकर घबड़ाते हैं कि रावण अक्षतयोनि नयी मन्दोदरी का अनुभव करके धोखा समझ जायगा । दशरथ छिप कर लङ्का जाकर नयी मन्दोदरी से मिलते हैं । बाद में रावण मन्दोदरी का विवाह होता है और मन्दोदरी को एक पुत्री होती है । उसकी जन्मकुण्डली से विदित होता है कि उसका पति रावणहन्ता होगा । अतः वह रावण द्वारा पेटिका में बन्द कर समुद्र में फेंक दी जाती है । महर्षि कलि उसे पाकर पालते हैं । महर्षि कलि जावा के सेरतकाण्ड के ऋषि कल ही प्रतीत होते हैं, जिन्हें मिथिलानिवासी ( मंतिलीनिवासी ) माना है । दशरथ की पत्नी के रूप में मन्दोदरी का उल्लेख अन्यत्र कहीं नहीं है । बुल्के ही कहते हैं कि ऐसी कल्पना दशरथजातक के आधार पर हुई होगी । फिर भी रावण द्वारा पार्वती के स्थान पर मन्दोदरी को प्राप्त करने की कथा का यह विकृत रूप ही प्रतीत होता है । अयोध्याकाण्ड का विश्लेषण करते हुए बुल्के कहते हैं कि इस काण्ड में तीनों पाठों में अभिन्नता महत्वपूर्ण है । दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार कैकेयी की माता के अपने पति द्वारा त्यक्त किये जाने की कथा सर्ग ३५।४-२१ में है । वे प्रथम सर्ग के प्रारम्भिक श्लोकों (१-३५) को, बालकाण्ड के अन्तिम श्लोकों की पुनरावृत्तिमात्र होने के कारण प्रक्षिप्त मानते हैं । परन्तु यह सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि पहले तो बालकाण्ड के अन्त में केवल चार पाँच श्लोक ही राम के गुण और स्वभाव का वर्णन करनेवाले हैं, किन्तु अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग के ३५ श्लोकों में राम के गुण और स्वभाव का वर्णन है । इसके अतिरिक्त टीकाकारों ने विस्तृत टीकाएँ भी इन श्लोकों पर लिखी हैं । यदि वे पूर्व श्लोकों के ही आवृत्तिमात्र होते तो उनपर टीका करने की आवश्यकता क्यों होती ? अतः स्पष्ट है कि यहाँ शब्दतः तथा अर्थतः किसी प्रकार की आवृत्ति नहीं कही जा सकती । बालकाण्ड के श्लोकों का सार यह है : राम और लक्ष्मण अपने देवतुल्य पिता की सदा पूजा करते थे और पिता की आज्ञा के अनुसार सब पौर कार्य करते थे । राम सभी के प्रिय एवं हित कार्य करते थे । परम नियन्त्रित श्रुति तथा स्मृति की मर्यादा के अनुसार माताओं के लिए मातृकार्य करते थे । यथासमय गुरुओं के सुश्रूषादि गुरुकार्यों की भी देखभाल करते थे । इस तरह राजा दशरथ तथा ब्राह्मण, वैश्य और विषयवासी सभी नागरिक राम के शील एवं सदाचार से प्रसन्न थे । चारों ही पुत्रों में सत्यपराक्रम राम भूतों में स्वयम्भू के समान अतियशस्वी एवं गुणवत्तर हुए थे ।

चतुर्दश अध्याय अयोध्याकाण्ड अयोध्याकाण्ड में कहा गया है कि रामादि चारों भ्राता राजा दशरथ को अपने शरीर से आविर्भूत चार भुजाओं के तुल्य प्रिय थे। उनमें भी महातेजा राम पिता के लिए अत्यन्त रतिकर थे। प्राणियों में चतुर्मुख के समान राम उन सबमें गुणवत्तर थे, क्योंकि वे साक्षात् सनातन विष्णु थे । उदीर्ण रावण का वध चाहनेवाले देवताओं की प्रार्थना से विष्णु ही राम के रूप में प्रकट हुए थे— “स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥” (वा० रा० २।१।७) उन अमिततेजा राम से कौशल्या वैसे ही शोभित हुईं जैसे वज्रपाणि इन्द्र से अदिति देवी शोभित हुई थी । श्रीराम दिव्य लावण्य और सौन्दर्यपूर्ण दिव्य रूप से सम्पन्न, वीर्यवान् एवं असूयारहित थे। वे गुणों में दशरथ के तुल्य तथा भूमि भर में अनुपम पुत्र थे । वे नित्य शान्तात्मा, मृदुभाषी एवं पहले ही बोलते थे । दूसरे के परुष वचन बोलने पर भी वे परुष उत्तर नहीं देते थे। वे किसी के द्वारा किये गये एक उपकार से ही सन्तुष्ट हो जाते थे और आत्मवान् होने के कारण उसके सैकड़ों अपराधों का भी स्मरण नहीं करते थे— “स च नित्यं प्रशान्तात्मा मृदु पूर्वं प्रभाषते । उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥ कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । विस्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥” (वा० रा० २।१।१०, ११) वे शीलवृद्ध, ज्ञानवृद्ध एवं सज्जनों से अस्त्र-शस्त्रादि श्रम के भी मध्य में सदा ही वेद-वेदान्त-नीति सम्बन्धी चर्चा करते रहते थे । अन्य समय में सुतरां सज्जनों से शास्त्ररहस्य की चर्चा ही करते थे । राम परम बुद्धिमान् तथा आये हुए लोगों से पहले ही बोलते थे । शब्दतः मधुराभिभाषी एवं अर्थतः प्रियंवद थे । वीर्यवान् होने पर भी अपने महान् वीर्य से विस्मित नहीं होते थे। अनृत कथा कभी नहीं करते थे। वे विद्वान् थे और वृद्धों के पूजक थे । प्रजा सदा राम का अनुरञ्जन करती थी और राम सदा ही प्रजा का अनुरञ्जन करते थे । प्रजा का रञ्जन करने से ही राजा होता है, “रञ्जनाद्राजा” इस उक्ति को वे चरितार्थ करते थे । राम सानुक्रोश अर्थात् दुखियों के प्रति दयालु थे । जितक्रोध एवं विशेषतः ब्राह्मणों के प्रतिपूजक थे । दीनों पर अनुकम्पा करनेवाले, धर्मज्ञ एवं नित्य ही दुष्टनिग्रह एवं इन्द्रियनिग्रह में तत्पर तथा पवित्र थे । कुलोचित बुद्धि अर्थात् अपने कुल के अनुसार दया, दाक्षिण्य, शरणागतरक्षण आदि धर्मों में उनकी बुद्धि सदा प्रवण रहती थी, अतएव वे क्षात्र धर्म प्रजापालनादि का बहुत आदर करते थे और उसके द्वारा महान् स्वर्ग की प्राप्ति समझते थे । श्रेय के विपरीत कर्म में उनको कभी रति नहीं होती थी एवं उनकी धर्मविरुद्ध कथा में कभी रुचि नहीं होती थी । राम कभी भी अश्रेयस्कर निषिद्ध कर्म में प्रवृत्त नहीं होते थे तथा धर्मविरुद्ध कथा में रुचि नहीं रखते थे । वाद, जल्प आदि कथाओं में वे बृहस्पति के समान स्वसिद्धान्तनिर्वाहक युक्तियों के वक्ता थे। वे अरोग अर्थात् सत्कर्मा- नुष्ठानसमर्थ, तरुण, विपुलांशत्व आदि उत्तम लक्षणवाले वपु से युक्त, तत्तत्कर्मयोग्य देश तथा काल के ज्ञाता थे एवं निग्रह और अनुग्रह के लिए पुरुषों की अधर्मिष्ठता आदि जानते थे । ऐसा प्रतीत होता था कि मानों ब्रह्मा द्वारा वे संसार में

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४५७ एकमात्र सर्वगुणयुक्त साधु पुरुष निर्मित हुए हैं। राम गुणों के कारण श्रेष्ठ गुणों से युक्त प्रजाजनों के बहिश्चर प्राणों के तुल्य परम प्रिय थे। वे यथावत् साङ्गोपाङ्ग वेदों के ज्ञाता थे और तत्तद् विद्याओं के लिए अपेक्षित व्रतों का अनुष्ठान कर व्रतस्नात हुए थे। मन्त्रहीन शस्त्रों एवं मन्त्रयुक्त अस्त्रों में भरताग्रज राम अपने पिता से भी श्रेष्ठ थे। विविध कल्याणों की वे जन्मभूमि थे। वे साधु तथा क्षोभ के हेतु उपस्थित होने पर भी अक्षुब्ध अन्तःकरणवाले, सत्यवाक् एवं धर्मार्थदर्शी वृद्ध ब्राह्मणों द्वारा शिक्षित तथा सौम्य थे। वे धर्म, अर्थ और काम के याथात्म्य को जानने- वाले और स्मृतिमान् तथा प्रतिभासंपन्न थे। वे लौकिक कार्यों के करने में सामर्थ्यसम्पन्न तथा समयाचार धर्म में कुशल थे। वे विनीत, गूढ़ अभिप्रायवाले तथा फल-निष्पत्ति-पर्यन्त मन्त्रणा को गुप्त रखनेवाले थे और मित्रत्वेन सब लोगों द्वारा अज्ञात मित्रों से सुरक्षित थे एवं उन्हीं के द्वारा परराष्ट्र-भेद आदि में पूर्ण साहाय्य प्राप्त करते थे। राम के क्रोध और हर्ष दोनों अमोघ थे जिसपर प्रसन्न होते उसे निहाल कर देते थे। सत्पात्र में वित्तदान एवं न्यायपूर्वक धनसंग्रह के वे कालज्ञ थे। वे गुरु आदि में दृढ़ भक्तिवाले तथा स्थिरप्रज्ञ अर्थात् विस्मृतिरहित थे। वे असद्ग्राही दुर्वचन बोलने- वाले नहीं थे, आलस्यरहित, सावधान एवं स्वदोष तथा परदोष को जाननेवाले थे। वे शास्त्रज्ञ, कृतज्ञ तथा परकृत अल्प उपकारों को भी जानते थे और वे पुरुषों के अन्तर (तारतम्य) को जाननेवाले थे अथवा पुरुषों के अन्तर अर्थात् अभिप्राय को जाननेवाले थे। न्याय के अनुसार प्रग्रह, निग्रह एवं अनुग्रह करने में दक्ष थे। वे सत्पुरुषों के संग्रह और सपरिवार सत्पुरुषों के पालन तथा दुष्टों के निग्रह का देश और काल जानते थे और वे आय कर्म के उपायों को जानते थे। जैसे मधुकर पुष्पों से रस का संग्रह करता है वैसे ही प्रजा से यथोचित धन ग्रहण करने में वे चतुर थे एवं शास्त्रदृष्ट व्यय कर्म के भी अच्छे जानकार थे। आय के अर्धभाग, चतुर्भाग या त्रिभाग के व्यय की व्यवस्था जानते थे। शास्त्रसमूहों तथा प्राकृतादि भाषामिश्रित नाटकादि में वे निपुण थे। निरालस्य होकर अर्थ और धर्म का संग्रह कर अर्थ और धर्म के अविरुद्ध काम का भी आदर करते थे। क्रीड़ा प्रयोजनवाले गीत, वाद्य, चित्रकर्म आदि के विज्ञाता थे तथा अर्थ के 'धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च ।' पञ्चधा विभाग के ज्ञाता एवं अनुष्ठाता थे। अश्व, हस्ती आदि के आरोहण, नियन्त्रण, गत्यादि-शिक्षण में वे सावधान थे। धनुर्वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ और अतिरथों से आदृत थे। वे परसेना के संमुख अभियान करनेवाले एवं शत्रुओं पर प्रहार करनेवाले थे। सेनाओं के नयन तथा व्यूहनिर्माण आदि में विशारद थे। संग्राम में क्रुद्ध हुए देवताओं तथा दानवों के द्वारा भी सर्वदा अप्रधृष्य थे। असूया, क्रोध, घमण्ड तथा मत्सर से रहित थे। कोई प्राणी उनकी अवज्ञा नहीं कर सकता था। प्राकृत पुरुषों के समान वे कालपराधीन न होकर स्वायत्त परिकर थे। सर्वश्रेष्ठ गुणों से युक्त राजकुमार राम प्रजाजनों के सम्मत सर्वश्रेष्ठ गुणों से युक्त हैं यह तीन बार कहकर राम में श्रेष्ठ गुणों की दृढ़ता कही गयी। वे अपने क्षमाप्रधान गुणों के कारण वसुधा के तुल्य, बुद्धि से बृहस्पति के तुल्य तथा वीर्य में इन्द्र के तुल्य थे। पिता को प्रसन्नता देनेवाले तथा सभी प्रजाजनों के अभीष्ट उत्तम गुणों से राम इस प्रकार प्रदीप्त हुए जैसे अंशुजालों के द्वारा सूर्य दीप्त होता है। एवंगुणसम्पन्न तथा अप्रधृष्य पराक्रम- वाले राम लोकनाथ विष्णु के तुल्य हैं। उन राम को मेदिनी ने अपना पति बनाना चाहा (वा० रा० २।१।३-३४)। यह दोनों अंशों की संक्षिप्त व्याख्या है। इसमें बालकाण्ड के अंश की आवृत्तिमात्र है' यह कहना अज्ञजनप्रतारण छोड़कर कुछ तथ्य नहीं है। वस्तुतः यह भी "वदतो व्याघातः" है जब बुल्के की दृष्टि में बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड वाल्मीकि की कृति में थे ही नहीं तब अयोध्याकाण्ड के इस अंश को पूर्व की आवृत्ति कैसे कहा जा सकता है ? वस्तुतः यह बुल्के की भी अज्ञता का स्पष्ट नमूना है। यदि यह प्रक्षिप्त है तब राम कौन हैं, क्यों वे राजा “अथ राज्ञो बभूवैव वृद्धस्य चिरजीविनः । प्रीतिरेषा कथं रामो राजा स्यान्मयि जीवति ।। ( वा० रा० २।१।३६ ) हों, क्यों राजा के मन में ऐसी प्रीति थी ? इत्यादि सब बातों का समाधान बिना उक्त श्लोकों के अधूरा ही ५८

४५८ रामायणमीमांसा चतुर्दश रहेगा। 'अथ राजः' यहीं से रामायण का आरम्भ है, यह कहना भी असङ्गत ही है। जब किसी सामान्य लेख का भी कोई उपोद्घात या भूमिका होती है तब बिना उपोद्घात के वाल्मीकिरामायण का आरम्भ मान लेना कैसे सङ्गत होगा ? पूर्वोक्त पंक्तियों में न तो शब्दतः और नहीं अर्थतः पुनरुक्ति है। शुक्लयजुः के ४० वें अध्याय में "अनेजदेकं मनसो जवीयो" (ईशा० उ० ३) "तदेजति तन्नैजति" (ईशा० उ० ५) इत्यादि समान शब्द और समान अर्थ का आवर्तन होने पर भी किसी को प्रक्षिप्त नहीं माना जाता है। गीता में दूसरे अध्याय के स्थितप्रज्ञ-लक्षणों तथा १२ वें अध्याय के भक्त-लक्षणों और १४ वें के गुणातीत-लक्षणों में बहुत कुछ समानता है। क्या उन्हें भी प्रक्षेप माना जाय ? ११ वे अध्याय के अन्त में 'मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः' (गी० ११।५४) जो कुछ कहा गया है वही १२ वें अध्याय में कहा गया है। विशेषतः भारतीय दृष्टिकोण से सिद्धों के जो स्वाभाविक लक्षण होते हैं वे ही साधकों के लिए साधन होते हैं। 'अमानित्वम्, अदम्भित्वम्' (गी० १२।७) आदि सिद्ध ज्ञानी के स्वाभाविक गुणों का इसलिए विस्तृत वर्णन किया जाता है कि वे सब धार्मिक तथा राजनीतिक साधकों के लिए परम अनुकरणीय एवं अनुष्ठेय हैं। विशेषतः उत्तरमीमांसा के अनुसार ईश्वर के गुणों का वर्णन उपासनार्थ अपेक्षित होता है जैसे सर्वगन्धत्व, सर्वरसत्व, भामनीत्व, वामनीत्व आदि गुणों से विशिष्ट परमेश्वर की उपासना करने से उपासकों को वे ही सब गुण फल के रूप में मिलते हैं। उसी तरह उपर्युक्त गुणों से विशिष्ट राम की उपासना करने से वे सब गुण उपासकों को फलरूप में मिलते हैं। अतः गुणों का वर्णन निरर्थक नहीं है। पर राम के द्वेषी बुल्के को रामोपासना से क्या लेना देना है। आवृत्ति तो है ही नहीं, साथ ही प्रशंसा भी नहीं है, क्योंकि अविद्यमान गुणों का वर्णन ही प्रशंसा है। भगवान् के तो विद्यमान गुणों का भी पूरा वर्णन सम्भव नहीं है, फिर अविद्यमान गुणों के वर्णन का तो प्रसङ्ग ही कहाँ है ? सर्वथापि अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग को प्रक्षिप्त कहना अत्यन्त निराधार एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। वस्तुतः इस सर्ग को प्रक्षिप्त कहने का बुल्के का उद्देश्य यह है कि इससे उनके अभिमत के विरुद्ध राम विष्णु के अवतार सिद्ध होते हैं। उसमें स्पष्ट कहा गया है दृप्त रावण के वध के लिए देवताओं की प्रार्थना से विष्णु राम के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। बुल्के अयोध्द्यादि पाँच ही काण्डों को प्रमाण मानते हैं। उनमें भी अवतारवाद सिद्ध होने से बुल्के का पक्ष निर्बल होता है। इसी लिए वे उसे प्रक्षिप्त कहने का वृथा साहस करते हैं। परन्तु उनके तर्क निःसार हैं। यदि उनके मन्तव्यानुसार बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण का है नहीं तो उसकी आवृत्ति कैसे कही जा सकती है ? डा० याकोबी का यह कथन भी निराधार है कि आदिरामायण में राम के प्रस्थान के अनन्तर उनकी चित्रकूट तक की यात्रा का वर्णन किया गया था, क्योंकि जिसका वनप्रस्थान से लेकर युद्धकाण्ड तक विस्तृत चरित्रवर्णन है उसके जन्म और जन्मस्थान तथा उसके गुण और स्वभाव का वर्णन न हो तो उस ग्रन्थ की बड़ी न्यूनता ही समझी जायगी। जिस सीता के वनगमन एवं हरण का वर्णन है, जिसके लिए समुद्र में सेतुबन्धन हुआ वह कौन थी, कहाँ की थी, उसका विवाह कब कैसे हुआ था ? इसका वर्णन न होना भी एक चरित्रचित्रण की त्रुटि ही मानी जायेगी। सर्ग ४१-४९ को प्रक्षिप्त कहना भी वैसा ही है। इसी तरह उनका यह कथन भी असङ्गत ही है कि प्रतीत होता है कि अन्ध मुनि के पुत्र के वध- प्रसङ्ग रामायण के पूर्व प्रचलित थे; बहुत संभव है सर्ग ६३ और ६४ की भी अधिकांश सामग्री प्रक्षिप्त हो । सर्ग ६६-९६ में भी पुनरावृत्तियाँ पायी जाती हैं। वाल्मीकिकृत रामायण में प्रसङ्ग इतना विस्तृत नहीं था। वस्तुतः वस्तुस्थिति अनुमान पर निर्भर नहीं होती। अनुमान लोग अपने-अपने संस्कारों के अनुसार कर लेते हैं। कई लोग यह भी अनुमान कर सकते हैं कि बाइबिल का इतना विस्तृत रूप प्रारम्भ में नहीं रहा होगा। बहुत कुछ विशेषतः चमत्कार की बातें मत-प्रचारक ईसाइयों ने जोड़ ली होंगी ? पुनरावृत्तियों की भ्रान्ति भी वैसे ही है। ऋक्संहिता, अथर्वसंहिता तथा यजुःसंहिता में पुरुषसूक्त हैं। सबमें बहुत कुछ समानता ही है, फिर भी शाखा- भेद से सभी प्रामाणिक पाठ माने जाते हैं। कभी प्रसङ्गानुसार भी वही बात दुबारा कहनी आवश्यक हो जाती है। १०० वें सर्ग के प्रक्षिप्त होने का कारण यह कहा गया है कि उसमें राम भरत से उनके राज्य के विषय में बहुत से