रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय बालकाण्ड ४४५ हरिवंश, पउमचरियं और आदिवाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता जनकजा है । यद्यपि प्रचलित रामायण से भिन्न आदिरामायण नाम की कोई वस्तु नहीं है। वह केवल पाश्चात्यों के मस्तिष्क का फितूर ही है। महाभारत रामो- पाख्यान में सीता को जनक की आत्मजा अवश्य कहा गया है । विदेहेराजो जनकः सीता तस्यात्मजा विभो ।” ( म० भा० ३।१५८।९ ) परन्तु यहाँ आत्मजा शब्द पुत्री का ही बोधक है जैसे अग्निजा द्रौपदी भी द्रुपदात्मजा या द्रौपदी हुई वैसे ही अयोनिजा सीता भी पुत्रीत्वेन जनक द्वारा स्वीकृत होने के कारण जनकात्मजा या जानकी हो ही जाती हैं। हरिवंश ( १।४१ ) का भी यही समाधान है । संक्षेप कथा के कारण ही उनमें सीताजन्म का विशेष विवरण न होना स्वाभाविक ही है। अनसूया-सीता-संवाद में, अशोकवाटिका में हनुमान् द्वारा तथा अग्निपरीक्षा प्रसंग में सीता को भूमिजा अयोनिजा कहा गया है और इन काण्डों को बुल्के प्रामाणिक भी कहते हैं फिर भी इन प्रसङ्गों को वे प्रक्षेप कहते हैं, जिसका कि मैंने अनेक प्रसङ्गों में खण्डन कर दिया है । प्रामाणिक टीकाकारों ने सातों काण्ड रामायण को प्रमाण मानकर उन सभी काण्डों और उक्त सर्गों पर भी टीकाएँ लिखी हैं। अयोध्याकाण्ड के ११८ वें सर्ग के अनुसार अत्रि-पत्नी अनसूया सीता से प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य वस्त्र, आभरण और महार्ह दिव्य अङ्गराग तथा मालाएँ प्रदान करती हैं और सीता से उनके स्वयंवर की कथा पूछती हैं। उसी प्रसङ्ग में सीता कहती हैं मेरे पिता मिथिलाधिपति हल से ( चयन-यज्ञप्रसङ्ग में ) यज्ञयोग्य क्षेत्रमण्डल का कर्षण कर रहे थे मैं पृथिवी-भेदन करके निकल पड़ी थी । गुण्ठित सर्वाङ्गवाली मुझे देख विस्मित होकर जनक ने अनपत्य होने के कारण स्नेह से अङ्क में मेरी पुत्री कह कर उठा लिया और मुझे अपनी ज्येष्ठ पत्नी को प्रदान किया । उसने मातृभाव से मेरा पालन किया । उसी प्रसङ्ग में सीता ने अपने को अयोनिजा भी कहा है— “तस्य लाङ्गलहस्तस्य कृषतः क्षेत्रमण्डलम् । अहं किलोत्थिता भित्त्वा जगतीं नृपतेः सुता । अनपत्येन च स्नेहादङ्कमारोप्य च स्वयम् । ममेयं तनयेत्युक्त्वा स्नेहो मयि निपातितः । अयोनिजां हि मां ज्ञात्वा नाध्यगच्छत् स चिन्तयन् ॥” (वा० रा० २।११८ २८-३७) यही बात वाल्मीकिरामायण ( ५।१६ ) में कही गयी है जो हलमुखक्षत क्षेत्रमण्डल में मेदनी-भेदन करके उत्पन्न हुई है वह धर्मशील जनकराज की पतिव्रता पुत्री है— “उत्थिता मेदिनीं भित्वा क्षेत्रे हलमुखक्षते । पद्मररेणुनिभैः कीर्णा शुभैः केदारपांसुभिः ॥” इसी तरह अग्निपरीक्षा के प्रसङ्ग में भी सीता ने साधारण स्त्रियों से अपनी विशेषता बतलाते हुए अपने को अयोनिजा या भूमिजा कहा है— “अपदेशो हि जनकान्नोत्पत्तिर्वसुधातलात् । मम वृत्तं च वृत्तज्ञ बहु ते न पुरस्कृतम् ॥” ( वा० रा० ६।११६।१५ ) नृपशार्दूल, आपने रोष का ही अनुवर्तन करते हुए सामान्य पुरुषों के समान स्त्रीत्वमात्र की दृष्टि से मेरे सम्बन्ध में शङ्काएँ व्यक्त की हैं। इसपर ध्यान नहीं दिया कि मेरा वैदेही ऐसा नाम और व्यवहार जनकयज्ञ भूमिमात्र के सम्बन्ध से ही है । जनक से मेरी उत्पत्ति नहीं हुई, किन्तु वसुधातल से ही मेरी अभिव्यक्ति हुई है । इस तरह मनुष्य-योनि से अनुत्पत्ति के कारण मुझे प्राकृत स्त्री नहीं कहा जा सकता और मेरे बहुमान चरित्र को भी आपने महत्त्व नहीं दिया ।