रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराम-प्रेम की असंख्य बार रामायण में चर्चा है तथापि भरत के अभिषेक की बात सुनकर राम ने कहा है कि पिता की आज्ञा से मैं भरत को अपना राज्य, सम्पत्ति, अपना जीवन तथा सीता को भी सहर्ष प्रदान कर सकता हूँ। “अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च। हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरताय प्रचोदितः ॥” ( वा० रा० २।१९।७ ) परन्तु इससे सीता-प्रेम में विरोध कैसे प्रतीत होता है ? यह तो वही जानें, पर वस्तुतः प्राण या जीवन से ही पत्नी का सम्बन्ध होता है, जो अपने प्राण एवं जीवन ही भरत को प्रदान करने को प्रस्तुत है तब उसके सीता के प्रदान में प्रेम की न्यूनता कहाँ आती है। इसी तरह घोर शरपाशबन्धन से मूच्छित लक्ष्मण को देखकर विलाप करते हुए राम कहते हैं, मैं युद्ध में मूच्छित लक्ष्मण को देख रहा हूँ। इस स्थिति में सीता के मिलने या जीवन से भी मुझे क्या करना है। ढूँढने पर मर्त्यलोक में सीता जैसी नारी मिल सकती है, पर लक्ष्मणसदृश साम्परायिक ( युद्ध का सच्चा साथी ) भ्राता नहीं मिल सकता ( वा० रा० ६।४७।५, ६ ) । इससे भी बुल्के को सीता-प्रेम में कमी दिखती है, परन्तु वस्तुतः यहाँ शोकसन्तप्त राम का तात्पर्य लक्ष्मण के महत्त्व-वर्णन में ही है, सीता के अपकर्ष-वर्णन में नहीं । “यत्परः शब्दः स शब्दार्थः” शब्द का जिसमें तात्पर्य होता है वही शब्दार्थ होता है। फिर भी बुल्के अनिश्चितता की ही स्थिति में रह जाते हैं और कहते हैं कि उपर्युक्त उद्धरणों का उत्तरदायित्व वाल्मीकि पर है या प्राचीन गायकों पर है, इसका निर्णय असंभव है। परन्तु आर्ष वाल्मीकिरामायण पर विश्वास करनेवाले आस्तिकों को तो पूर्वोक्त ढंग से समन्वित अर्थ ही प्रतीत होता है, विरोध का अवकाश ही नहीं। वाल्मीकिरामायण ( २।६४।४३ ) में वर्णित— ‘एकपत्नीव्रतस्य’ राम के एकपत्नीव्रत की महिमा ठीक ही है। सीता को भी राम के ‘स्वदारनिरतः’ ( वा० रा० ३।९।६ ) के अनुसार स्वदाररत होने का पूर्ण विश्वास है ही। वे उन्हें ‘स्थिरानुराग’ मानती हैं। कैकेयी भी यह स्पष्ट कहती है कि राम कभी परस्त्री को चक्षु से भी नहीं देखते । “न रामः परदारान् स चक्षुर्भ्यामपि पश्यति ।” ( वा० रा० २।७२।४८ ) आनन्दरामायण में तो राम स्वयं ही कहते हैं कि सीता को छोड़कर सभी नारियाँ उनके लिए कौशल्या के तुल्य हैं— अन्यत् सीतां विनाऽन्या स्त्री कौशल्यासदृशी मम । न क्रियते परा पत्नी मनसाऽपि न चिन्तये ॥ ( आ० रा० विलासकाण्ड सर्ग ७ ) जैनों ने राम की ८००० और लक्ष्मण की १६००० पत्नियां मानी हैं, जो आर्षरामायणविरुद्ध होने से अग्राह्य ही है। रसिकसम्प्रदाय की दृष्टि में राम परमेश्वर हैं। उनमें बहुतों की पतिभावना हो सकती है, परन्तु वह भावना की बात है, व्यावहारिक नहीं। इसी प्रकार राम और लक्ष्मण दोनों के सीता से विवाह करने की बात खोतानी रामायण, राम वानररूप धारण कर अञ्जना से हनुमान् को उत्पन्न करते हैं ( सेरीराम ), राम वाली की विधवा से विवाह कर अङ्गद के पिता बनते हैं ( अनु० ३२७ ) रामकथा, आदि सब को रामायण की विकृतियां ही समझना चाहिये । अयोनिजा सीता ४०५ वें अनु० में बुल्के सीता के जन्म के सम्बन्ध में कहते हैं “सीता के कुलपरम्परासम्बन्धी तथ्यों के अभाव के कारण अनेक प्रकार की कथाएँ प्रचलित हुई हैं। जनक, रावण और दशरथ तीनों ही सीता के पिता माने गये हैं।” परन्तु यह उनका भ्रम ही है। रामायण के अनुसार सीता अयोनिजा ही हैं। उनके अनुसार महाभारत,