रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभवानी ने भी प्रसन्नता से वरदान दिया, यह जानकर सीता प्रसन्न होती हैं— "जानि गौरि अुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।" (रा० मा० १।२३६) राघवोल्लास के अनुसार स्वप्न में सीता को राम का दर्शन होने से वे अनुरागवती होती हैं । भुशुण्डि- रामायण के अनुसार पक्षी के द्वारा रामप्रेषित राम का चित्र देखकर और बृहत्कोशलखण्ड में गुणश्रवण द्वारा सीता पूर्वानुरागवती होती हैं । तुलसीदास के अनुसार यह स्वाभाविक पुनीत प्रेम था और सीता के नयन निजनिधि पहचान कर ललक उठे । आर्ष रामायण के अविरुद्ध ऐसी स्थितियों का वर्णन भी असङ्गत नहीं है । राम एकपत्नीव्रत थे । वाल्मीकि के अनुसार राम सत्यपराक्रम, पितृभक्त एवं स्वदारनिरत थे । अन्य रामायणों में भी राम को एकपत्नीव्रत कहा गया है । परन्तु बुल्के इसे भी विकास मानते हैं । यहाँ बुल्के कहते हैं, "उच्चाशय मानव का चित्रण करते हुए भी वाल्मीकि का दृष्टिकोण यथार्थवादी ही था, अतः उनकी रचना में ऐसी उक्तियाँ भी मिलती हैं जो परवर्ती रामकथाओं के मर्यादावाद को आघात पहुँचाती हैं । जैसे— "हृष्टाः खलु भविष्यन्ति रामस्य परमाः स्त्रियः ।" (वा० रा० २।१८।१२) अर्थात् राम के अभिषेक के बाद राम की परम स्त्रियाँ प्रहृष्ट होंगी । ऐसे ही— "भुजैः परमनारीणामभिमृष्टमनेकधा ।" (वा० रा० ६।२१।३) । अनेकधा परम नारियों की भुजाओं से स्पृष्ट राम की बाँह का उल्लेख किया गया है ।" परन्तु बुल्के भारतीय शास्त्रीय समन्वय की पद्धति से अपरिचित हैं । इसी लिए उन्हें इस प्रकार का भ्रम हुआ है । ऐसे प्रसङ्गों में टीकाकारों ने एकपत्नीव्रत के अनुकूल ही अर्थ किया है । राम की सीता एवं सीता की सखियाँ प्रसन्न होंगी । स्त्री का अर्थ पत्नी ही नहीं होता है । रामसम्बन्धिनी परम उत्कृष्ट स्त्रियां प्रसन्न होंगी । यही उक्त वचन का अर्थ है । उपनिषद में आया है "ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके" (कठ उ० १।३।१) । यहाँ पिबन्तौ से यही प्रतीत होता है कि जीव और ईश्वर दोनों ऋत (कर्मफल) का पान करनेवाले हैं । परन्तु जीव और ईश्वर के स्वभाव भिन्न होने के कारण ईश्वर भोक्ता नहीं होता । "अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति" (मु० उ० ३।१।१) ईश्वर भोजन न करता हुआ केवल प्रकाशक रहता है । इस श्रुति के कारण पिबन्तौ का मीमांसासम्मत अर्थ यह होता है कि— 'जीवः पिबति ईश्वरः पाययति' अर्थात् जीव कर्म-फल का भोक्ता है ईश्वर जीव को कर्मफल भोगार्थ प्रेरित करता है । इसी तरह 'परमाः स्त्रियः' में राम की पत्नी सीता एवं उसकी सखियाँ ही गृहीत होती हैं । अतएव "बहुवचनेन सीतासख्यः" यही अर्थ रामाभिरामी टीका में किया गया है । इसी प्रकार दूसरे वचन का भी अर्थ यह है कि मणि, काञ्चन, मुक्तादि सर्वोत्तम भूषण युक्त परम नारियों (धात्रीजनों) के द्वारा स्नान, अलङ्करण आदि के समय राम की बाहें स्पृष्ट होती हैं । रामाभिरामी का स्पष्टतः कहना है— "परमनारीणामेकदारव्रतत्वेनेतरस्त्रीप्रसङ्गाभावादुत्तमधात्रीजनानां भुजैरनेकधा स्तनपनालङ्कर- णादिकाले स्पृष्टम् ।" अर्थात् राम एकदारव्रत हैं, अतः उनका अन्य नारी-स्पर्श का प्रसङ्ग न होने से धात्रीजनों की भुजाओं से स्नान, अलङ्करण आदि के समय राम की भुजा स्पृष्ट होती थी । वाल्मीकिरामायण में ही राम को एक- पत्नीव्रत कहा गया है और उसी के कारण यज्ञों में भी सुवर्णमयी सीता की प्रतिमा का प्रयोग हुआ । न सीतायाः परां भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ।। (वा० रा० ७।९९।७) अर्थात् राम ने सीता से भिन्न भार्या का वरण नहीं किया, इसलिए पत्नी के स्थान में यज्ञों में सीता की काञ्चनी प्रतिमा ही उपयुक्त होती थी । इसी प्रकार बुल्के यह भी कहते हैं कि यद्यपि सीता के प्रति