रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ रामायणमीमांसा त्रयोदश के अनुसार ही अयोध्याकाण्ड के वचन का अर्थ लगाना उचित है। "सप्त दश च वर्षाणि जातस्य तव राघव।" (वा० रा० २।२०।४५) का अर्थ रामाभिरामी के अनुसार यह है कि उपनयन संस्कार रूप द्वितीय जन्म से राम वनवास के समय १७ वर्ष के थे। इस तरह राम विश्वामित्र-यज्ञ के समय १५ वर्ष के थे। १२ वर्ष विवाह के बाद अयोध्या में रहे और वनगमन के समय २७ वर्ष के ही थे। दश वर्ष की अवस्था में उपनयन हुआ था। यद्यपि “मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः। अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते ।। (वा० रा० ३।४७।१०-११) इस वचन से वनगमन के समय में क्रमशः राम और सीता की आयु २५ और १८ वर्ष की प्रतीत होती है तथापि इस वचन का भी पूर्व वचनों के अनुसार ही अर्थ करना उचित है। अतएव टीकाकारों ने पञ्चविंशक का अतितरुण अर्थ किया है। अथवा २४ तत्त्वों से पृथक् पञ्चविंशक सांख्यीय चैतन्य पुरुष ही राम हैं। पञ्चतन्मात्राएँ, पञ्चमहाभूत, पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, अहङ्कार, बुद्धि, मनरूप १८ वर्ष पूर्व मेरे कार्य गिने जाते हैं। मैं मूलप्रकृति हूँ। ‘पतिसंयोगसुलभम्’ का भी अर्थ पाणिग्रहणयोग्यता ही विवक्षित है। यही रामाभिरामी टीका का मत है। पूर्वराग अनेक रामायणों के अनुसार सीता और राम का परस्पर प्रेम हो जाता है। आनन्दरामायण ( १।३।१११- १२०) स्वयंवर के समय रामाभिराम को देखकर सीता प्रेमविह्वल हो जाती हैं। वे देवताओं से प्रार्थना करती हैं कि धनुष को पुष्पवत् बना दें। कल्किपुराण (३।३।२९) के अनुसार जनकनन्दिनी सीता के कटाक्ष से अर्चित होकर राम धनुष चढ़ाते हैं—‘जनकजेक्षितैरचितः’। कम्बरामायण के अनुसार सीता कन्या-भवन पर खड़ी थी और राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ आ रहे थे। दोनों की दृष्टि दोनों पर पड़ी। दोनों प्रेमनिमग्न हो गये। रामचरितमानस के अनुसार पुष्पवाटिका में दोनों एक दूसरे को देखकर प्रभावित होते हैं— “सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत । चकित विलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत ।।” (रा० मा० १।२२९) “..................‘सियमुख ससि भय नयन चकोरा । भए बिलोचन चारु अचंचल । मनहुँ सकुचि निमि तजे दृगंचल ॥ देखि सीय सोभा सुखु पावा । हृदय सराहत बचनु न आवा।।” (रा० मा० १।२२९।२,३) “सियसोभा हिय बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि ।।” (रा० मा० १।२३०) सीताजी भी— “देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥ थके नयन रघुपतिछबि देखें । पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें ॥ अधिक सनेहु देह भै भोरी । सरदससिहि जनु चितव चकोरी ॥ लोचनमग रामहि उर आनी । दीन्हे पलक कपाट सयानी ।।” (रा० मा० १।२३१।२-४) और सीता राम-प्राप्ति के लिए गौरी से मूक प्रार्थना करती हैं— “मोर मनोरथ जानहु नीके । बसहु सदा उर पुर सबही के ॥” (रा० मा० १।२३५।२)