रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४६ रामायणमीमांसा त्रयोदश वाल्मीकिरामायण के उक्त सभी स्थलों में कतक, तीर्थ, तिलक, भूषण आदि टीकाएँ हैं, अतः इन्हें प्रक्षेप कह देना साहसमात्र है। अतएव यह कहना कि आदिरामायण के अनुसार सीता जनक की औरसी पुत्री थी, सर्वथा अशुद्ध है ( वा० रा० १।१।२७; ५।१३।४; २।२८।३ तथा ३।४७।३ ) के वचनों का भी यही अर्थ हैं कि विदेहकुल में सीता जनक द्वारा पुत्रीरूप से गृहीत हुई है। "जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता ।" ( वा० रा० १।१।२७ ) यहाँ नागेश रामाभिरामी में लिखते हैं-- "यद्यप्येषाऽयोनिजा तथापि सीरध्वजस्य देवयजनलाङ्गलपद्धतावाविर्भूतत्वादेवमुक्तिः ।" यद्यपि सीता अयोनिजा हैं फिर भी सीरध्वज जनक के देवयजनक्षेत्र की लाङ्गल पद्धति से उनका आविर्भाव हुआ है, अतः जनक के कुल में उद्भूत मानी गयी हैं। आश्चर्य है, स्वाभिमत विरुद्ध होने से स्वयं प्रमाणत्वेन स्वीकृत २-६ काण्डों में सीता के अयोनिजा कही जाने पर भी बुल्के उसे स्वीकार नहीं करते हैं और बालकाण्ड को प्रामाणिक न मानने पर भी उसके अनुसार सीता को जनक की औरसी पुत्री सिद्ध करने की निर्लज्ज चेष्टा करते हैं । "जनकस्य कुले जाता रामपत्नी सुमध्यमा ।" ( वा० रा० ५।१३।१४ ) इस प्रसङ्ग में भी पूर्वोक्त ही अभिप्राय है। विशेषतः जनककुल की कन्या और राम की पत्नी रावण के वश में कथमपि नहीं हो सकती । “सीते महाकुलीनासि धर्मे च निरता सदा ।" ( वा० रा० २।१८।३ ) यहाँ भी सीता जनक की औरसी पुत्री नहीं कही गयी हैं। इसी तरह अन्य उद्धरणों को भी उपक्रमन्याय से बालकाण्ड-कथा के अनुसार ही लगाना चाहिये । बालकाण्ड के ६६वें सर्ग में विवाह के समय स्वयं ही जनक ने सीता की उत्पत्ति का वर्णन किया था— "अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः । क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता ।। भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा । वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा ।।" ( वा० रा० १।६६।१३-१५ ) क्षेत्र-शोधनार्थ अग्निचयन के लिए देवयजन क्षेत्रमण्डल का कर्षण करते हुए मेरी लाङ्गलपद्धति से सीता का उत्थान हुआ था, इसी लिए उसका नाम सीता रखा गया है। भूतल से उत्थित अतएव अयोनिजा सीता मेरी पुत्री है । टीकाकारों ने भी ऐसी ही व्याख्या की है। पद्मपुराण में “अथ लोकेश्वरी लक्ष्मीर्जनकस्य पुरे स्वतः । शुभक्षेत्रे हलोत्खाते तारे चोत्तरफाल्गुने ।। अयोनिजा पद्मकरा बालार्कशतसन्निभा । सीतामुखे समुत्पन्ना बालभावेन सुन्दरी ।। सीतामुखोद्भवात्सीता इत्यस्यै नाम चाकरोत् ।” लोकेश्वरी लक्ष्मी जनकपुर में उत्तराफाल्गुनी शुभ नक्षत्र में हलोत्खात यज्ञीय शुभ क्षेत्र में अयोनिजा पद्मकरा बालार्कशतभास्वरा स्वतः आविर्भूत हुई । टीकाकारों ने भी यही सब बातें लिखी हैं । लङ्काकाण्ड के अनुसार अग्नि में प्रविष्ट होकर भी सीता ने अपने दिव्य रूप का अनुभव कराया और अन्त में उत्तरकाण्ड के अनुसार दिव्य-