भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 526

अध्याय बालकाण्ड ४४९ वैशाखसितनवम्यां पुराणपठनं तथा। लक्ष्मीसूक्तं पठंस्तत्र याति रामं सनातनम्॥ सौभाग्यं धनधान्यञ्च पुत्रसन्ततिविस्तृतम्। रामप्रसादालभते मुच्यते सर्वपातकात्॥” (वा० रा० ७।१७।३७ की टीका) अतएव देवीभागवत (९।१६) तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण (प्रकृतिखण्ड अ० १४) में इसी कथा का स्पष्टी- करण किया गया है। बुल्के का परिमार्जन शब्द असङ्गत है। उनकी दृष्टि में ये सभी ग्रन्थकार मिथ्याभाषी तथा मिथ्यालेखक हैं और उसी मिथ्या भाषण और लेखन द्वारा कथाओं में सुधार करते हैं। ईसाई-संख्या बढ़ाने की धुन में ही वे लोग हिन्दूशास्त्रों में इस प्रकार दुरभिसन्धिपूर्ण दुष्कल्पना करते हैं। वाल्मीकिरामायण के अनुसार स्पष्टरूप से कहा गया है कि कुशध्वज और उनकी पत्नी लक्ष्मी की उपासना से पुत्रीरूप में लक्ष्मी के प्रकट होने का वरदान प्राप्त करते हैं। जन्म-ग्रहण करते ही लक्ष्मी वैदिक मन्त्रों का गान करती हैं। इस कारण उन्हें वेदवती कहा गया है। कुछ समय बाद वह हरि को प्राप्त करने के लिए तप करती है। रावण से अपमानित होकर रावण को उसके नाश का शाप देकर योगबल से देह-त्याग कर सीता के रूप में उत्पन्न होती है। सीता तथा लक्ष्मी की अभिन्नता के विश्वास की प्रेरणा से वेदवती की कथा को यह नवीन रूप दिया गया है। बुल्के की इस धारणा का आधार बुल्के की दुर्भावना छोड़कर अन्य कुछ नहीं है। क्योंकि पूर्वोक्त व्याख्या के अनुसार वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड में ही उसको वाङ्मयी कहा गया है और युग युग में उसका पुनः पुनः प्रादुर्भाव कहा गया है। कृत्तिवासरामायण में भी उसी का विवरण दिया है। कुशध्वज वेदपाठ कर रहे थे उस समय उनके मुख से एक कन्या उत्पन्न हुई। उन्होंने उसका नाम वेदवती ही रखा। शुम्भदैत्य ने कुशध्वज को मार डाला एवं वेदवती तपस्या करने गयी। तप करते समय रावण से अपमानित होकर वेदवती ने अग्नि में प्रवेश किया (वा० रा० ७।१७)। वेदवती सागरतट पर तपस्या करती थी। बलरामदासरामायण में उस कथा में कुछ विकार जुड़ गया है। रावण के द्वारा अपमानित होने के पश्चात् वह उसे शाप देती है एवं अपने तपोबल से अग्नि उत्पन्न कर उसमें प्रवेश करती है। कुछ दिन बाद रावण वहाँ जाकर देखता है कि वेदवती का शरीर जला नहीं। वह उसे पुष्पक द्वारा लङ्का ले जाता है। मन्दोदरी को उसके मांस का भोजन निर्माण करने का आदेश देता है। नारद के परामर्श से मन्दोदरी दूसरा मांस तैयार कराती है तथा वेदवती का शरीर समुद्र में बहा देती है। वरुण उसे जम्बूद्वीप पहुँचा देता है। वहाँ जनक हल चलाते समय सीता के रूप में उसे प्राप्त करते हैं। देवीभागवत एवं ब्रह्मवैवर्त की कथा जो सर्वथा वाल्मीकिरामायण के अनुसार है उसे तो बुल्के परिमार्जन मानते हैं, परन्तु पउमचरियं की अत्यन्त विलक्षण कथा को वाल्मीकिरामायण का विस्तार- मात्र मान लेते हैं। यही है भ्रान्ति और दुराग्रह का नमूना। पउमचरियं के अनुसार सागरदत्त की पुत्री गुणवती की सगायी धनदत्त (भावी राम) के साथ होती है। उसकी माता रत्नप्रभा उसे धनी श्रीकान्त (भावी रावण) को देना चाहती है। फलतः धनदत्त के भाई वसुदत्त (भावी लक्ष्मण) तथा श्रीकान्त द्वन्द्व युद्ध में एक दूसरे का वध करते हैं। मरणोपरान्त दोनों हरिण बन जाते हैं। गुणवती भी मरकर हरिणी बनती है। उसी के कारण फिर दोनों हरिण लड़कर मर जाते हैं। अनेक जन्मों के बाद गुणवती पुरोहित श्रीभूति की वेदवती कन्या बनती है। स्वायम्भू राजकुमार वेदवती को चाहता है पर श्रीभूति उसे कन्या देना नहीं चाहता है। स्वायम्भू उसकी हत्या कर देता है। वेदवती के साथ बलात्कार करता है। वेदवती उसे शाप देकर श्राविका बन जाती है। बाद में स्वायम्भू और वेदवती