भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४४८ रामायणमीमांसा त्रयोदश नारायण को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया था— “नारायणो मम पतिर्न त्वन्यः पुरुषोत्तमात् । आश्रये नियमं घोरं नारायणपरीप्सया ॥” (वा० रा० ७।१७।१८ ) काममोहित रावण ने जब उसका केशग्रहण किया तब उसने क्रुद्ध होकर असिभूत हाथों से केशों को छिन्न कर दिया और धर्मी ( जनक ) की अयोनिजा पुत्री होकर मैं तेरे वध के लिए प्रकट होऊँगी यह कहकर वह अग्नि में प्रविष्ट हो गयी— “तस्मात्त्वयोनिजा साध्वी भवेयं धर्मिणः सुता ।” ( वा० रा० ७।१७।३२ ) । ऋषियों ने राम से कहा है कि आप विष्णु हैं और वेदवती जनकजा हैं। यहाँ भी सीता को अयोनिजा कहते हुए भी ऋषियों ने उसे जनक-कुल में उत्पन्न होने का उपचार किया है । “अयोनिजा धर्मिणः सुता”, “उत्पन्ना मैथिलकुले जनकस्य महात्मनः ।” ( वा० रा० ७।१७।३७ ), अतः पूर्वोक्त वचनों का भी यही अर्थ समझना चाहिये । वेदवती तप के बल से महालक्ष्मी के साथ सायुज्यभाव को प्राप्त हो गयी, अतः महालक्ष्मी के सीतारूप में जन्म लेने से ही उसका भी सीतारूप जन्म समझा गया । वस्तुतः वेदवती भी लक्ष्मी की अवतारभूता ही थी । उसने स्वयं कहा था कि ब्रह्मर्षि कुशध्वज से वाङ्मयी वेदमयी महालक्ष्मी ही वेदवती के रूप में प्रकट हुई थी । यहाँ भी वे अयोनिजा ही हैं । सीतोपनिषद् में सीता को वेदमयी भी कहा गया है । वही रावण को शाप देने और उसका वध करने के लिए आविर्भूत हुई थीं । “तस्याहं कुर्वतो नित्यं वेदाभ्यासं महात्मनः । संभूता वाङ्मयी कन्या नाम्ना वेदवती स्मृता ॥” ( वा० रा० ७।१७।९ ) यही बात रामाभिरामी टीका में स्पष्ट है— “भगवतः शक्तिर्महालक्ष्मीरेव रावणवधाय रावणं शप्तुमवतीर्णा अस्या वाङ्मयीत्वं सार्वात्म्यात् ।” अतएव इसी प्रसङ्ग में यह भी कहा गया है कि यह महाभागा वेदी में अग्निशिखा के समान अन्य युगों में भी हलोत्कृष्ट क्षेत्र से पुनः उत्पन्न होगी— “एवमेषा महाभागा मर्त्येषूत्पत्स्यते पुनः । क्षेत्रे हलमुखोत्कृष्टे वेद्यामग्निशिखोपमा ॥” ( वा० रा० ७।१७।३६ ) महासुन्दरीतन्त्र का वचन उद्धृत करके रामाभिरामी में कहा गया है कि वैशाख शुक्ल नवमी के दिन भूमिसुता सीता सीतामुख से उत्पन्न हुईं । जनक ने उसका पालन किया । वही महाभागा रामपत्नी हुई । उस दिन श्रद्धाभक्तियुक्त लोगों को वित्तशाठ्य छोड़कर सम्यक् महोत्सव मनाना चाहिये । गीत, वादित्र, नृत्य तथा पुराणपाठ, लक्ष्मीसूक्तपाठ आदि करना चाहिये । इससे धन, धान्य, सौभाग्य तथा पुत्रादि, सेनादि का विस्तार होता है । राम के प्रसाद से प्राणी ऐसा करने से सब बाधाओं से मुक्त हो जाता है और सनातन राम को प्राप्त कर लेता है— “वैशाखे शुक्लनवम्यामुत्पन्ना साऽवनीसुता । सीतामुखात् सा सञ्जाता पालिता जनकेन च ॥ रामपत्नी महाभागा सीता नामेति विश्रुता । तस्मिन् दिने रामभक्ताः श्रद्धाभक्तिसमन्विताः ॥ महोत्सवापराः सर्वे वित्तशाठ्यविवर्जिताः । गीतवादित्रनृत्याद्यै रामभक्तिपरायणाः ॥