रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रमशः सीता और दशमुख बनते हैं । वाल्मीकिरामायण के आदर्श में और उक्त कथा में महान् अन्तर है । वाल्मीकि- रामायण की वेदवती का रावण स्पर्श तक नहीं कर पाता, केशस्पर्श होने से भी वेदवती अपने हाथ को ही तलवार बनाकर केशों को छिन्नकर देती है, किन्तु पउमचरियं के अनुसार रावण उससे बलात्कार करता है । इसमें रावण और लक्ष्मण का पहले भी कई बार युद्ध होता है । इसमें जैसे मादा पशु के लिए दो पशु लड़ते हैं वैसे ही लक्ष्मण और रावण लड़ते हैं । इसपर भी दोनों ही ग्रन्थ समानरूप में रखे जाते हैं, यह भी कम आश्चर्य नहीं है । जैनों के अनुसार रावण एक धर्मभीरु जैनी ही है । असमिया बालकाण्ड के अनुसार भगवान् ने राम के रूप में अवतार लेने की प्रतिज्ञा की तो लक्ष्मी ने पूछा मैं क्या करूँ ? उन्होंने कहा तुम जनक के यहाँ जन्म लो । लक्ष्मी पृथ्वी पर उतर कर एक पर्वत के शिखर पर बैठ गयीं । रावण उन्हें देखकर मोहित हुआ । लक्ष्मी ने उसे डाँटा कि तुमको मारनेवाला जन्म ले चुका है । यह कहकर वह सागर में कूदकर अन्तर्धान हो जाती है । तब सागर में एक सौ योजन का द्वीप ऊपर आया और लक्ष्मी उसपर विराजमान रही । वसुमती ने आकर लक्ष्मी को आदरपूर्वक अपने गर्भ में धारण कर लिया । बाद में यज्ञ के लिए लोगों ने हल जोतते समय पृथ्वी में एक डिम्ब पाया तथा उसे मिथिलानगर में ले गये । राजा जनक ने डिम्ब को तोड़कर उसमें से एक कन्या निकाली ( अध्याय २३ ) । बुल्के कहते हैं, "रामायण की अलौकिक सीता-जन्मकथा का परिवर्धन किया जाना अत्यन्त स्वाभाविक था । भूमि में पड़ी हुई कन्या आयी कहाँ से ? और वह रावण-नाश का कारण क्यों सिद्ध हुई । वेदवती की कथा में इन प्रश्नों का उत्तर मिलता है । सीता-हरण के पूर्व ही सीता-रावण-सम्बन्ध का इस कथा में प्राचीनतम उल्लेख मिलता है । बाद की कथाओं में यह सम्बन्ध अधिक निकट का हो जाता है । जनक द्वारा प्राप्त होने के पूर्व सीता का किसी न किसी तरह लङ्का से सम्बन्ध स्थापित किया गया है", पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि रामायण की सीता की अलौकिक जन्मकथा निरपेक्ष ही है । भारतीय शास्त्रों की पद्धति से परिचित लोगों के लिए ईश्वर एवं उसकी शक्तियाँ प्रयोजन के अनुसार कहीं भी प्रकट हो सकती हैं— "हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम तें प्रकट होहिं मैं जाना ॥" ( रा० मा० १।१८४।३ ) पाषाणस्तम्भ से नृसिंह का प्राकट्य होता है । मत्स्य, कूर्म, वराह रूपधारी भगवान् के प्राकट्य भी कुछ ऐसे ही हैं । फिर भी कृषि की अधिष्ठात्री शक्तिविशिष्ट महालक्ष्मी का तो भूमि से प्रादुर्भूत होना अत्यन्त स्वाभाविक ही था । एक ब्रह्मज्योति ही सीता-राम, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण, कामेश्वरी-कामेश्वर आदि दो रूपों में प्रकट होती है । विष्णु और लक्ष्मी के समान ही राम और सीता का प्रादुर्भाव होना अनिवार्य है । राम के आविर्भाव का हेतु बालकाण्ड में निर्दिष्ट रावण-वधादि ही है । वेदवती की कथा को भी नवीन बतलाना उसे प्रक्षेप कहने का ही उपक्रम है । वाल्मीकिरामायण की दृष्टि से वह प्राचीन है । प्रसङ्गानुरूप ऋषियों ने उसे उत्तरकाण्ड में राम को सुनाया था । सीता तथा लङ्का के सम्बन्ध का पुराणों में भी अनेक शापों के रूप में वर्णन है । बुल्के कहते हैं—"अनेक ग्रन्थों में सीता को रावणात्मजा कहा गया है । भारत, तिब्बत, खोतान, हिन्दोनेशिया, श्याम और वसुदेवहिण्डि में यह कथा मिलती है । उसके अनुसार विद्याधर मय ने रावण के पास अपनी पुत्री मन्दोदरी के विवाह का प्रस्ताव रखा था, लक्षणज्ञों ने कहा कि इसकी प्रथम सन्तान अपने कुलनाश का हेतु बनेगी । पर रावण उसपर मोहित हो गया था, अतः प्रथम सन्तान के त्याग का निर्णय कर उसने उससे विवाह कर लिया । मन्दोदरी को जब प्रथम पुत्री उत्पन्न हुई तो नाना रत्नों के साथ एक मञ्जूषा में रखकर उसे कहीं छोड़ देने को कहा गया । मन्त्री ने उसे मिथिला में जनक के खेत में रख दिया । बाद में जनक से कहा गया कि यह बालिका हल की रेखा से उत्पन्न हुई है । जनक ने उसे ग्रहण कर अपनी रानी को सौंप दिया । गुणभद्र के उत्तरपुराण की