रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 528, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिम्न कथा में इसका और वेदवतीकथा का समन्वय किया गया है । अलकापुरी के राजा अमितवेग की पुत्री राजकुमारी मणिमती विन्ध्यगिरि पर विजयार्थ तप कर रही थी । रावण ने उसे प्राप्त करने का प्रयास किया । सिद्धि में विघ्न उत्पन्न होने के कारण मणिमती ने क्रुद्ध होकर संकल्प किया कि मैं रावण की पुत्री बन कर उसके नाश का कारण बनूँगी । फलस्वरूप वह मन्दोदरी के गर्भ से उत्पन्न हुई । उसका जन्म होते ही लङ्का में भूकम्प आदि अपशकुन हुए । यह देख ज्योतिषियों ने कहा यह कन्या रावण के नाश का कारण होगी । इसपर रावण ने मारीच को आदेश दिया कि वह उसे किसी दूर देश में छोड़ दे । मन्दोदरी ने कन्या को द्रव्य तथा परिचयात्मक पत्र के साथ एक मञ्जूषा में रख दिया, मारीच ने उसे मिथिला-भूमि में गाड़ दिया, जहाँ उसी दिन वह कृषकों द्वारा पायी गयी । वे उसे जनक के पास ले गये । जनक ने मञ्जूषा खोलकर उससे कन्या को निकाल कर उसे अपनी पत्नी वसुधा को सौंप दिया । यह वृत्तान्त वेदवती की कथा पर ही आधारित है । सीता की धर्ममाता वसुधा होना भी यह सूचित करता है कि रचयिता वाल्मीकि भी उस कथा से परिचित था जिसमें सीता को पृथ्वी की पुत्री कहा गया है । महाभागवत देवीपुराण के अनुसार भी सीता मन्दोदरी से उत्पन्न हुई थी । बाद में वह पृथ्वी से आविर्भूत हुई है ।'' वस्तुतः वसुदेवहिण्डि और उत्तरपुराण कोई आर्ष ग्रन्थ नहीं हैं । सीता और राम के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण तथा अन्य आर्ष पुराण ही प्रमाण हैं । महाभागवत, देवीपुराण अवश्य आर्ष ग्रन्थ हैं, परन्तु उनका वाल्मीकिरामायण से समन्वय करके यही अर्थ समझना चाहिये कि तयोक्त मन्दोदरी-कन्या भी महालक्ष्मी के साथ सायुज्य को प्राप्त हो गयी । अत- एव महालक्ष्मी की अवतारभूत सीता में उसका भी संनिवेश था । “सीता मन्दोदरीगर्भे संभूता चारुरूपिणी । क्षेत्रजा तनयाप्यस्य रावणस्य रघूत्तम ॥” ( महाभा० ४२।६२ ) मन्दोदरी के गर्भ से चारुरूपिणी कन्या आविर्भूत हुई । रावण की तो वह क्षेत्रजा ही कन्या थी, औरसी नहीं । इस दृष्टि से श्रीदशरथ के यज्ञलब्धचरु के अंश से सीता के जन्म की बात भी संगत होती है । अन्यथा यदि सीता मन्दोदरी की प्रथम सन्तान होती तो यह भी कहना होगा कि मेघनाद आदि सब उससे छोटे होंगे फिर इतनी कम उम्र में उनकी विशिष्ट तपस्या तथा इन्द्रादि पर विजय कैसे संभव होती है ? काश्मीरीरामायण की यह कथा कि ‘मन्दोदरी कन्या के गले में पत्थर बाँधकर उसे समुद्र में फेंक देती है’ तथा अन्य कथा के अनुसार रावण द्वारा कन्या को मञ्जूषा में बन्द कर समुद्र में फेंक देने की कथा में विकृति ही है । यह भी कथा वैसी ही है कि एक ब्राह्मण ने किसी बालिका के सम्बन्ध में रावण से कहा कि यह तुम्हारे निधन का कारण बनेगी । यह सुनकर रावण ने उसपर कड़ा पहरा लगा दिया । जब वह कन्या केवल छः मास की थी ऐसी भयङ्कर वर्षा हुई कि उसके पास के सभी व्यक्ति डूबकर मर गये । वह कन्या मञ्जूषा में होने के कारण जल- प्रवाह के द्वारा सिंहलद्वीप पहुँच गयी । इसी कन्या ने उन राम से विवाह कर लिया जिनके द्वारा रावण का वध हुआ । तिब्बती तथा खोतानी रामायणों में रावण की पुत्री जन्म-कुण्डली के अशुभ ग्रहों के कारण परित्यक्त की जाती हैं एवं उसे एक पेटिका में रखकर जल में फेंक दिया जाता है । तिब्बती रामायण के अनुसार पेटिका खोलने- वाला जनक के स्थान पर एक कृषक है । खोतानी रामायण के अनुसार एक ऋषि उसका भरण-पोषण करते हैं । सेरतकाण्ड में भी रावण-महिषी एक पुत्री को जन्म देती है, जो श्री का अवतार थी, पर उसे यह मालूम था कि यदि उसकी सन्तान पुत्री हो तो रावण को उसमें अनुरक्ति होगी । इसी लिए वह उसे पेटी में बन्द कर समुद्र में फेंकवा देती है । बाद में मंतिलीनिवासी कल नामक ऋषि उसको पाते और पालते हैं । उसका नाम सीता रखते हैं । बुल्के