भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 529

को मंतिली से मिथिला का स्मरण होता है और यह कथा भी वाल्मीकि की सीता-कथा से मिलती है । सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार मन्दोदरी की उस कन्या के मुख का तालू काला था, अतः लक्षणज्ञों ने उसे अशुभ कहा । वह समुद्र में फेंकी गयी । उसे मकर ने डूबने से बचाया । मकर की प्रार्थना से मरुतों ने उसे एक ऋषि की वाटिका में एक पद्म पर रख दिया । ऋषि ने उसका पुत्री की तरह पालन किया । इस कथा पर पद्मजा सीता का प्रभाव पड़ा है । कम्बोडिया के रामकेर्ति के अनुसार जनक यमुना के तीर पर यज्ञ के लिए हल चलाते हुए सीता को एक बेड़े पर देखते हैं। उसे जनक ने पुत्री बनाया । श्याम के रामकियेन के अनुसार दशरथ-यज्ञ के चरुसम्बन्धी अष्टमांश को खाकर मन्दोदरी ने एक कन्या उत्पन्न की, जो वास्तव में लक्ष्मी की अवतार थी । रावण विभीषण आदि ज्योतिषियों से उसे अपने वंश के नाश का कारण जानकर उसे विभीषण को देता है । वह उसे घड़े में रखकर नदी में डाल देता है । नदी में एक कमल उत्पन्न होता है जो उस घड़े का आधार बन जाता है । लक्ष्मी की दिव्य शक्ति से वह घड़ा जनक के पास पहुँचता है । जनक वन में उसी नदी पर तप कर रहे थे । वे घड़ा उठाकर वन में ले जाते हैं तथा एक पेड़ के नीचे खोदकर प्रार्थना करते हैं : यदि यह कन्या राजा के रूप में उत्पन्न नारायणावतार की रानी बननेवाली हो तो इस स्थान पर एक कमल उत्पन्न हो जाय, जो उस घड़े को धारण कर सके । उसी क्षण वहाँ कमल उत्पन्न हो जाता है । उसपर घड़ा रखकर उसे मिट्टी से ढँक कर जनक पुनः तपस्या करने लगते हैं । तपस्या से संतोष न पाकर १६ वर्ष बाद जनक अपनी राजधानी लौटने का निश्चय करते हैं । किन्तु ढूँढने पर भी वे उस घड़े को नहीं पाते । सेना बुलायी गयी । सैनिक भी खोज में असफल होते हैं । अन्त मे जनक हल चलाते हैं तब वह घड़ा अपने आप हल-पद्धति से प्रकट होता है । उसमें एक अत्यन्त सुन्दर कन्या पद्म पर बैठी प्राप्त होती है । सीता ( लाङ्गल-पद्धति ) से उत्पन्न होने के कारण उसका सीता नाम पड़ता है ( अ० रा० ) । वस्तुतः वाल्मीकिरामायण और पुराणों की कथा ही विभिन्न देशों से होती हुई वहाँ पहुँची है, अतः अनेक प्रकार की कल्प- नाएँ उसके साथ जुड़ गयीं । किन्तु राम विष्णु हैं, सीता लक्ष्मी हैं और जनक से सीता का पिता-पुत्री का सम्बन्ध है । वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों का यह अंश प्रायः सर्वत्र व्याप्त है । सीता लक्ष्मी हैं, इस दृष्टि से विविध कमलों तथा पद्द्मों का सम्बन्ध भी उनके साथ है । रामजातक तथा पालकपालाम के अनुसार रावण ने इन्द्र का रूप धारण कर इन्द्राणी को धोखा दिया था, अतः इन्द्राणी ही सीता बनकर रावण के नाश का हेतु बनती है। पालकपालाम के अनुसार—रावण इन्द्र से इन्द्रजाल सीखता था । कालान्तर में इन्द्राणी सीता के रूप में प्रकट होकर अपने पिता रावण पर छूरी का प्रहार करती है, इसपर बालिका बेड़े पर रखकर समुद्र में बहायी जाती है । किसी टापू में उसका ऋषि ने पुत्रीवत् पालन किया है, यह सब वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप हैं । पद्मजा सीता क्षेमेन्द्रकृत दशावतारचरित ( १०।१०४ ) के अनुसार रावण एक विशिष्ट स्थान पर बार-बार जाता है । वह आरम्भ में एक पर्वत देखता है, वहीं फिर नगर, फिर जङ्गल देखता हैं, पुनः वहीं विस्तृत गड्ढा और फिर कमलयुक्त सरोवर देखता है । वहाँ एक शिवलिङ्ग स्थापित कर कमलों से शिव की पूजा करता है । पुनः वह एक कनकपद्म पर एक दिव्य कन्या, जो लक्ष्मी है, देखता है । उसे पुत्री के रूप में ग्रहण कर लङ्का लाता है । नारद मन्दोदरी की गोद में उसे देखकर कहते हैं । यह कन्या चपलेन्द्रिय रावण की अभिलाषा की भूमि बनेगी— ‘‘कन्या भविष्यत्यभिलाषभूमिंश्चपलेन्द्रियस्य’’ यह सुनकर मन्दोदरी उसे स्वर्णपेटिका में बन्द कर किसी दूसरे देश में गाड़ देने का आदेश देती है । जनक यज्ञार्थ हल चलाते हुए उसे प्राप्त करते हैं । तोरवेरामायण ( १।१६ ) के अनुसार हल जोतते समय जनक ने पृथ्वी के नीचे एक कमलों का सरोवर पाया और वहाँ कमल पर विराजमान एक शिशु देखा । जनक अलौकिक दृश्य से भयभीत होकर लक्ष्मी के इस स्थान को छोड़ देने की बात सोच रहे थे कि नारद आ गये और कहा कि इसका