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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 530

अध्याय बालकाण्ड ४५३ नाम सीता रखो और इसका पालन करो। विष्णु भी अवतार लेनेवाले हैं। वे सीता को पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे। तुम इसका स्वयंवर करना, शिव-धनुष चढ़ानेवाले को ही इसे देना। वाल्मीकिरामायण की टीका में गोविन्दराज के अनुसार वेदवती एक पद्मपर पुनः उत्पन्न होती है। रावण उसे लङ्का ले जाता है और लक्षणज्ञों से उसे अपनी मृत्यु का कारण जानकर उसे समुद्र में फेंक देता है। वहीं कन्या जनक को मिलती है। वस्तुतः उक्त कथाओं का इतना ही तात्पर्य है कि सीता साक्षात् लक्ष्मी का अवतार थी। उसके वर्णन में कवियों की कल्पनाओं में भेद है। वस्तुतत्त्व एक ही है। रक्तजा सीता अद्भुतरामायण (सर्ग ८) के अनुसार रावण दिग्विजय के प्रसङ्ग में ऋषियों से राजकर लेता है। द्रव्य के अभाव में ऋषि लोग कुछ रक्त देते हैं। वह ऋषि गृत्समद के पात्र में एकत्रित किया जाता है। उस पात्र में कुश का किञ्चित् रस था जिसमें गृत्समद के मन्त्रों के फलस्वरूप लक्ष्मी विद्यमान थी। रावण उस पात्र को लङ्का ले जाता है। मन्दोदरी को यह कह कर देता है कि इसमें विष भरा है। कभी रावण की परस्त्री-अनुरक्ति से खिन्न मन्दोदरी आत्महत्या के विचार से उस रक्त का पान कर लेती है, गर्भवती हो जाती है एवं वह तीर्थयात्रा के लिए निकलती है। कुरुक्षेत्र में उस गर्भ को गाड़ देती है बाद में जनक के हल चलाने से वही कन्या भूमि से निकलती। जनक उसे पुत्रीवत् पालते हैं। सिंहलद्वीप की रामकथा में भी उक्त कथा का निर्देश है। एक अन्य कथा के अनुसार मन्दोदरी ने उस रक्त में से कुछ ही बूंदों का पान किया था। उसी से उससे कन्या उत्पन्न होती है। रावण-कोप की शङ्का से उसी घट में उसे रखकर समुद्र में छोड़ देती है। वही जनक के राज्य में पहुँच कर कृषकों द्वारा जनक के पास लायी जाती है। एक अन्य कथा के अनुसार महादेव के धनुष के प्रताप से जनक ने रावण को कई बार पराजित किया था। अद्भुतरामायण के अनुसार रावण राजस्व के स्थान में ऋषियों से रक्त लेता है। ऋषि यह शाप देते हैं कि इस रक्त से तुम्हारा नाश होगा। रावण शाप की अवज्ञा कर उसे लङ्का ले जाता है। उससे वहाँ अनावृष्टि आदि अनिष्ट घटित होते हैं। ज्योतिषियों ने कहा जब तक यह रक्त लङ्का में रहेगा विपत्तियों का अन्त नहीं होगा। यह सुनकर रावण जनक से हुई पराजय का बदला लेने के लिए उस घड़े को मिथिला में गड़वा देता है। वहाँ भी अनावृष्टि हुई। तब मन्त्रिगण राजा को रानी के साथ हल चलाने का परामर्श देते हैं। वैसा करने पर राजा ने उस घड़े को पाया। उसमें ऋषिरक्त से उत्पन्न सीता दिखायी पड़ी। उसके बाद सब अनर्थ शान्त हो गये। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३ एवं बिहौररामकथा में भी ऐसा ही उल्लेख है। इन कथाओं का भी तात्पर्य यही है कि सीता मोक्षलक्ष्मी, राज्यलक्ष्मी तथा ऐश्वर्यलक्ष्मी के साथ ही ऋषियों की तपोमयी लक्ष्मी-भी हैं। आनन्दरामायण के अनुसार राजा पद्माक्ष कठोर तपस्या के बाद लक्ष्मी को पुत्री के रूप में प्राप्त कर उसका पद्मा नाम रखता है। पद्मा के स्वयंवर में पद्माक्ष युद्ध के कारण मारा जाता है। यह देखकर पद्मा ने अग्नि में प्रवेश किया। एक दिन उसके अग्निकुण्ड से निकलने पर रावण ने उसे देख लिया। इस पर वह शीघ्र ही अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। रावण अग्नि बुझाकर उसकी राख में पाँच दिव्य रत्न देखकर एवं उन्हें एक पेटिका में बन्द कर लङ्का ले जाता है। लङ्का में कोई भी उस पेटिका को उठा नहीं सकता। उसे खोलने पर उसमें कन्या मिली। मन्दोदरी के परामर्श से पेटिका मिथिला में गड़वा दी जाती है। बाद में उसे एक शूद्र पाता है, जो ब्राह्मण के लिए खेती कर रहा था। वह ब्राह्मण पेटी जनक को प्रदान करता है। खोलकर जनक ने उसमें कन्या देखी और अपनी पुत्री बनाया। इससे भी हिरण्मयी लक्ष्मी का हिरण्यरेता अग्नि में निवास और उसी से आविर्भाव सूचित किया गया है।

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