भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 532

अध्याय बालकाण्ड ४५५ कन्या से ईश्वर द्वारा उत्पन्न होने की कथा गढ़ी गयी है। ईसाई फ़ादर बुल्के विचार करें यदि सीता की भूमि से उत्पत्ति असंभव है तो क्या उपर्युक्त बातें संभव हैं ? जैसे महाभारत में अग्निकुण्ड से द्रौपदी, धृष्टद्युम्न आदि की उत्पत्ति होने पर कुल-परम्परा के तथ्यों में कोई बाधा नहीं पड़ी। द्रुपद के आयोजित अग्निकुण्ड से आविर्भूत होने के कारण सब द्रुपद के पुत्र-पुत्री माने गये वैसे ही जनक के यज्ञक्षेत्र में जनक की हलपद्धति से उत्पन्न होने के कारण सीता भी जनकपुत्री कहलायीं । वेदवती की कथा भी वस्तुस्थिति से सम्बन्धित है । किसी की पूर्ति के लिए कल्पित नहीं है, क्योंकि बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड सहित सारा वाल्मीकिरामायण प्रमाण है । सीता नाम के आधार पर भूमिजावृत्तान्त नहीं उत्पन्न हुआ, किन्तु भूमिजा- वृत्तान्त के अनुसार सीता नाम ही हुआ । क्योंकि अर्थों के अनुसार अन्वर्थ चातुर्होत्र, इन्द्र, अग्नि आदि नामों की पद्धति वैदिक वाङ्मय में प्रचुरमात्रा में मिलती है । राम आदि नामों की भी उत्पत्ति अर्थानुसारी ही हुई । दशरथजातक के अनुसार सीता दशरथ की पुत्री और राम की बहन थी, यह बौद्धों के वेदादि शास्त्रों के विरोध का नमूना ही है, क्योंकि उनके यहां वेदादि शास्त्र मान्य न होने से भगिनी से विवाह में भी कोई बाधा नहीं होती । बुल्के ने भी ४१९वें अनु० में इसे निर्मूल माना है। उड़ीसा में सुभद्रा वहाँ की इष्ट देवी हैं, अतः उत्कल लोग सीता को सुभद्रा से अभिन्न ही मानते हैं । जावा के रामकेलिङ्ग, मलय के सेरीराम तथा हिकायत महाराज रावण के अनुसार दशरथ की पटरानी मन्दोदरी के सौन्दर्य का वर्णन सुनकर रावण दशरथ से उसकी माँग करता है । मन्दोदरी प्रदान के लिए पति को उद्यत देखकर जादू द्वारा एक दूसरी मन्दोदरी बना देती है जिसे रावण ले जाता है । बाद में दशरथ मन्दोदरी से सत्य वृत्तान्त सुनकर घबड़ाते हैं कि रावण अक्षतयोनि नयी मन्दोदरी का अनुभव करके धोखा समझ जायगा । दशरथ छिप कर लङ्का जाकर नयी मन्दोदरी से मिलते हैं । बाद में रावण मन्दोदरी का विवाह होता है और मन्दोदरी को एक पुत्री होती है । उसकी जन्मकुण्डली से विदित होता है कि उसका पति रावणहन्ता होगा । अतः वह रावण द्वारा पेटिका में बन्द कर समुद्र में फेंक दी जाती है । महर्षि कलि उसे पाकर पालते हैं । महर्षि कलि जावा के सेरतकाण्ड के ऋषि कल ही प्रतीत होते हैं, जिन्हें मिथिलानिवासी ( मंतिलीनिवासी ) माना है । दशरथ की पत्नी के रूप में मन्दोदरी का उल्लेख अन्यत्र कहीं नहीं है । बुल्के ही कहते हैं कि ऐसी कल्पना दशरथजातक के आधार पर हुई होगी । फिर भी रावण द्वारा पार्वती के स्थान पर मन्दोदरी को प्राप्त करने की कथा का यह विकृत रूप ही प्रतीत होता है । अयोध्याकाण्ड का विश्लेषण करते हुए बुल्के कहते हैं कि इस काण्ड में तीनों पाठों में अभिन्नता महत्वपूर्ण है । दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार कैकेयी की माता के अपने पति द्वारा त्यक्त किये जाने की कथा सर्ग ३५।४-२१ में है । वे प्रथम सर्ग के प्रारम्भिक श्लोकों (१-३५) को, बालकाण्ड के अन्तिम श्लोकों की पुनरावृत्तिमात्र होने के कारण प्रक्षिप्त मानते हैं । परन्तु यह सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि पहले तो बालकाण्ड के अन्त में केवल चार पाँच श्लोक ही राम के गुण और स्वभाव का वर्णन करनेवाले हैं, किन्तु अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग के ३५ श्लोकों में राम के गुण और स्वभाव का वर्णन है । इसके अतिरिक्त टीकाकारों ने विस्तृत टीकाएँ भी इन श्लोकों पर लिखी हैं । यदि वे पूर्व श्लोकों के ही आवृत्तिमात्र होते तो उनपर टीका करने की आवश्यकता क्यों होती ? अतः स्पष्ट है कि यहाँ शब्दतः तथा अर्थतः किसी प्रकार की आवृत्ति नहीं कही जा सकती । बालकाण्ड के श्लोकों का सार यह है : राम और लक्ष्मण अपने देवतुल्य पिता की सदा पूजा करते थे और पिता की आज्ञा के अनुसार सब पौर कार्य करते थे । राम सभी के प्रिय एवं हित कार्य करते थे । परम नियन्त्रित श्रुति तथा स्मृति की मर्यादा के अनुसार माताओं के लिए मातृकार्य करते थे । यथासमय गुरुओं के सुश्रूषादि गुरुकार्यों की भी देखभाल करते थे । इस तरह राजा दशरथ तथा ब्राह्मण, वैश्य और विषयवासी सभी नागरिक राम के शील एवं सदाचार से प्रसन्न थे । चारों ही पुत्रों में सत्यपराक्रम राम भूतों में स्वयम्भू के समान अतियशस्वी एवं गुणवत्तर हुए थे ।