रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 533, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दश अध्याय अयोध्याकाण्ड अयोध्याकाण्ड में कहा गया है कि रामादि चारों भ्राता राजा दशरथ को अपने शरीर से आविर्भूत चार भुजाओं के तुल्य प्रिय थे। उनमें भी महातेजा राम पिता के लिए अत्यन्त रतिकर थे। प्राणियों में चतुर्मुख के समान राम उन सबमें गुणवत्तर थे, क्योंकि वे साक्षात् सनातन विष्णु थे । उदीर्ण रावण का वध चाहनेवाले देवताओं की प्रार्थना से विष्णु ही राम के रूप में प्रकट हुए थे— “स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥” (वा० रा० २।१।७) उन अमिततेजा राम से कौशल्या वैसे ही शोभित हुईं जैसे वज्रपाणि इन्द्र से अदिति देवी शोभित हुई थी । श्रीराम दिव्य लावण्य और सौन्दर्यपूर्ण दिव्य रूप से सम्पन्न, वीर्यवान् एवं असूयारहित थे। वे गुणों में दशरथ के तुल्य तथा भूमि भर में अनुपम पुत्र थे । वे नित्य शान्तात्मा, मृदुभाषी एवं पहले ही बोलते थे । दूसरे के परुष वचन बोलने पर भी वे परुष उत्तर नहीं देते थे। वे किसी के द्वारा किये गये एक उपकार से ही सन्तुष्ट हो जाते थे और आत्मवान् होने के कारण उसके सैकड़ों अपराधों का भी स्मरण नहीं करते थे— “स च नित्यं प्रशान्तात्मा मृदु पूर्वं प्रभाषते । उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥ कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । विस्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥” (वा० रा० २।१।१०, ११) वे शीलवृद्ध, ज्ञानवृद्ध एवं सज्जनों से अस्त्र-शस्त्रादि श्रम के भी मध्य में सदा ही वेद-वेदान्त-नीति सम्बन्धी चर्चा करते रहते थे । अन्य समय में सुतरां सज्जनों से शास्त्ररहस्य की चर्चा ही करते थे । राम परम बुद्धिमान् तथा आये हुए लोगों से पहले ही बोलते थे । शब्दतः मधुराभिभाषी एवं अर्थतः प्रियंवद थे । वीर्यवान् होने पर भी अपने महान् वीर्य से विस्मित नहीं होते थे। अनृत कथा कभी नहीं करते थे। वे विद्वान् थे और वृद्धों के पूजक थे । प्रजा सदा राम का अनुरञ्जन करती थी और राम सदा ही प्रजा का अनुरञ्जन करते थे । प्रजा का रञ्जन करने से ही राजा होता है, “रञ्जनाद्राजा” इस उक्ति को वे चरितार्थ करते थे । राम सानुक्रोश अर्थात् दुखियों के प्रति दयालु थे । जितक्रोध एवं विशेषतः ब्राह्मणों के प्रतिपूजक थे । दीनों पर अनुकम्पा करनेवाले, धर्मज्ञ एवं नित्य ही दुष्टनिग्रह एवं इन्द्रियनिग्रह में तत्पर तथा पवित्र थे । कुलोचित बुद्धि अर्थात् अपने कुल के अनुसार दया, दाक्षिण्य, शरणागतरक्षण आदि धर्मों में उनकी बुद्धि सदा प्रवण रहती थी, अतएव वे क्षात्र धर्म प्रजापालनादि का बहुत आदर करते थे और उसके द्वारा महान् स्वर्ग की प्राप्ति समझते थे । श्रेय के विपरीत कर्म में उनको कभी रति नहीं होती थी एवं उनकी धर्मविरुद्ध कथा में कभी रुचि नहीं होती थी । राम कभी भी अश्रेयस्कर निषिद्ध कर्म में प्रवृत्त नहीं होते थे तथा धर्मविरुद्ध कथा में रुचि नहीं रखते थे । वाद, जल्प आदि कथाओं में वे बृहस्पति के समान स्वसिद्धान्तनिर्वाहक युक्तियों के वक्ता थे। वे अरोग अर्थात् सत्कर्मा- नुष्ठानसमर्थ, तरुण, विपुलांशत्व आदि उत्तम लक्षणवाले वपु से युक्त, तत्तत्कर्मयोग्य देश तथा काल के ज्ञाता थे एवं निग्रह और अनुग्रह के लिए पुरुषों की अधर्मिष्ठता आदि जानते थे । ऐसा प्रतीत होता था कि मानों ब्रह्मा द्वारा वे संसार में