रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय अयोध्याकाण्ड ४५७ एकमात्र सर्वगुणयुक्त साधु पुरुष निर्मित हुए हैं। राम गुणों के कारण श्रेष्ठ गुणों से युक्त प्रजाजनों के बहिश्चर प्राणों के तुल्य परम प्रिय थे। वे यथावत् साङ्गोपाङ्ग वेदों के ज्ञाता थे और तत्तद् विद्याओं के लिए अपेक्षित व्रतों का अनुष्ठान कर व्रतस्नात हुए थे। मन्त्रहीन शस्त्रों एवं मन्त्रयुक्त अस्त्रों में भरताग्रज राम अपने पिता से भी श्रेष्ठ थे। विविध कल्याणों की वे जन्मभूमि थे। वे साधु तथा क्षोभ के हेतु उपस्थित होने पर भी अक्षुब्ध अन्तःकरणवाले, सत्यवाक् एवं धर्मार्थदर्शी वृद्ध ब्राह्मणों द्वारा शिक्षित तथा सौम्य थे। वे धर्म, अर्थ और काम के याथात्म्य को जानने- वाले और स्मृतिमान् तथा प्रतिभासंपन्न थे। वे लौकिक कार्यों के करने में सामर्थ्यसम्पन्न तथा समयाचार धर्म में कुशल थे। वे विनीत, गूढ़ अभिप्रायवाले तथा फल-निष्पत्ति-पर्यन्त मन्त्रणा को गुप्त रखनेवाले थे और मित्रत्वेन सब लोगों द्वारा अज्ञात मित्रों से सुरक्षित थे एवं उन्हीं के द्वारा परराष्ट्र-भेद आदि में पूर्ण साहाय्य प्राप्त करते थे। राम के क्रोध और हर्ष दोनों अमोघ थे जिसपर प्रसन्न होते उसे निहाल कर देते थे। सत्पात्र में वित्तदान एवं न्यायपूर्वक धनसंग्रह के वे कालज्ञ थे। वे गुरु आदि में दृढ़ भक्तिवाले तथा स्थिरप्रज्ञ अर्थात् विस्मृतिरहित थे। वे असद्ग्राही दुर्वचन बोलने- वाले नहीं थे, आलस्यरहित, सावधान एवं स्वदोष तथा परदोष को जाननेवाले थे। वे शास्त्रज्ञ, कृतज्ञ तथा परकृत अल्प उपकारों को भी जानते थे और वे पुरुषों के अन्तर (तारतम्य) को जाननेवाले थे अथवा पुरुषों के अन्तर अर्थात् अभिप्राय को जाननेवाले थे। न्याय के अनुसार प्रग्रह, निग्रह एवं अनुग्रह करने में दक्ष थे। वे सत्पुरुषों के संग्रह और सपरिवार सत्पुरुषों के पालन तथा दुष्टों के निग्रह का देश और काल जानते थे और वे आय कर्म के उपायों को जानते थे। जैसे मधुकर पुष्पों से रस का संग्रह करता है वैसे ही प्रजा से यथोचित धन ग्रहण करने में वे चतुर थे एवं शास्त्रदृष्ट व्यय कर्म के भी अच्छे जानकार थे। आय के अर्धभाग, चतुर्भाग या त्रिभाग के व्यय की व्यवस्था जानते थे। शास्त्रसमूहों तथा प्राकृतादि भाषामिश्रित नाटकादि में वे निपुण थे। निरालस्य होकर अर्थ और धर्म का संग्रह कर अर्थ और धर्म के अविरुद्ध काम का भी आदर करते थे। क्रीड़ा प्रयोजनवाले गीत, वाद्य, चित्रकर्म आदि के विज्ञाता थे तथा अर्थ के 'धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च ।' पञ्चधा विभाग के ज्ञाता एवं अनुष्ठाता थे। अश्व, हस्ती आदि के आरोहण, नियन्त्रण, गत्यादि-शिक्षण में वे सावधान थे। धनुर्वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ और अतिरथों से आदृत थे। वे परसेना के संमुख अभियान करनेवाले एवं शत्रुओं पर प्रहार करनेवाले थे। सेनाओं के नयन तथा व्यूहनिर्माण आदि में विशारद थे। संग्राम में क्रुद्ध हुए देवताओं तथा दानवों के द्वारा भी सर्वदा अप्रधृष्य थे। असूया, क्रोध, घमण्ड तथा मत्सर से रहित थे। कोई प्राणी उनकी अवज्ञा नहीं कर सकता था। प्राकृत पुरुषों के समान वे कालपराधीन न होकर स्वायत्त परिकर थे। सर्वश्रेष्ठ गुणों से युक्त राजकुमार राम प्रजाजनों के सम्मत सर्वश्रेष्ठ गुणों से युक्त हैं यह तीन बार कहकर राम में श्रेष्ठ गुणों की दृढ़ता कही गयी। वे अपने क्षमाप्रधान गुणों के कारण वसुधा के तुल्य, बुद्धि से बृहस्पति के तुल्य तथा वीर्य में इन्द्र के तुल्य थे। पिता को प्रसन्नता देनेवाले तथा सभी प्रजाजनों के अभीष्ट उत्तम गुणों से राम इस प्रकार प्रदीप्त हुए जैसे अंशुजालों के द्वारा सूर्य दीप्त होता है। एवंगुणसम्पन्न तथा अप्रधृष्य पराक्रम- वाले राम लोकनाथ विष्णु के तुल्य हैं। उन राम को मेदिनी ने अपना पति बनाना चाहा (वा० रा० २।१।३-३४)। यह दोनों अंशों की संक्षिप्त व्याख्या है। इसमें बालकाण्ड के अंश की आवृत्तिमात्र है' यह कहना अज्ञजनप्रतारण छोड़कर कुछ तथ्य नहीं है। वस्तुतः यह भी "वदतो व्याघातः" है जब बुल्के की दृष्टि में बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड वाल्मीकि की कृति में थे ही नहीं तब अयोध्याकाण्ड के इस अंश को पूर्व की आवृत्ति कैसे कहा जा सकता है ? वस्तुतः यह बुल्के की भी अज्ञता का स्पष्ट नमूना है। यदि यह प्रक्षिप्त है तब राम कौन हैं, क्यों वे राजा “अथ राज्ञो बभूवैव वृद्धस्य चिरजीविनः । प्रीतिरेषा कथं रामो राजा स्यान्मयि जीवति ।। ( वा० रा० २।१।३६ ) हों, क्यों राजा के मन में ऐसी प्रीति थी ? इत्यादि सब बातों का समाधान बिना उक्त श्लोकों के अधूरा ही ५८