भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 536

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४५९ प्रश्न पूछते हैं । मानो भरत दीर्घकाल तक शासन कर चुके हों । १०१ वें सर्ग के प्रारम्भिक श्लोक में कहा गया है 'प्रष्टुं समुपचक्रमे' । वास्तव में १०० वें सर्ग की सामग्री महाभारत के सभापर्व अध्याय ५ से उद्धृत की गयी है, पर यह सब असङ्गत है । इन प्रश्नों के लिए यह आवश्यक नहीं है कि अधिक काल तक शासन करनेवाले से ये प्रश्न होने चाहिए । एक उत्तमाभिजनसम्पन्न धार्मिक राज्य के शासक से आरम्भ में ही पूछना उचित है, जिससे कि वह सावधान होकर उन नीतियों तथा आचारों को ध्यान में रखकर सदा व्यवहार करे । इसी लिए किसी भी भारतीय विद्वान् टीकाकार ने इन श्लोकों के प्रक्षिप्त होने का सन्देह नहीं किया । दण्डवत् प्रणाम करते हुए भरत को जटिल और चीरवसनधारी देखकर राम को ऐसा लगा जैसे दुर्दर्श भास्कर ही युगान्त में गिर पड़े हों । राम ने किसी तरह विवर्णवदन तथा कृशगात्र भ्राता भरत को पहचान कर हाथ से उठाया और मूर्धा का आघ्राण कर आलिङ्गन किया एवं अङ्क में बैठा कर सादर पूछा; तात, तुम्हारे पिता कहाँ हैं जो तुम वन में आये हो । उनके रहते उनकी सेवा छोड़कर तुम्हें वन में नहीं आना चाहिये । बहुत दिनों पर दूर से आये हुए तुम्हें देख रहा हूँ । वैवर्ण्य एवं कृशता से पहचानने में कठिनाई हो गयी है । पिताजी क्या जीवित हैं ? सौम्य, कहीं ऐसा तो नहीं कि बालक होने के कारण तुम्हारा राज्य नष्ट हो गया हो ? सत्यसंगर, राजसूय, अश्वमेध आदि यज्ञों के अनुष्ठाता धर्मनिष्ठ राजा जीवित तो हैं ? तात, क्या धर्मनिष्ठ महाद्युति विद्वान् ब्राह्मण इक्ष्वाकुओं के पुरोहित वसिष्ठ का तुम यथावत् पूजन करते हो ? तात, क्या कौशल्या, सुमित्रा तथा प्रजावती सुखिनी आर्या कैकेयी देवी प्रसन्न तो है ? क्या तुमने विनयसम्पन्न, बहुश्रुत, अनिन्दक, महाकुलप्रसूत, सकल हित के निर्वाहक पुरोहित को सत्कृत तो किया है ? क्या तुम्हारे आहवनीय आदि अग्नियों के सम्बन्ध में सावधान मतिमान् विधिज्ञ अध्वर्युगण अवसर के अनुसार अतीत-अनागत होम के अधिकरण अग्नि का ध्यान तो रखते हैं और तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुओं तथा पितृतुल्य वृद्ध वैदिक ब्राह्मणों का बहुमान तो करते हो ? क्या अस्त्र-शस्त्रविद्यासम्पन्न, अर्थशास्त्र-निष्णात तथा धनुर्वेद के आचार्य सुधन्वा का तुम सम्मान तो करते हो ? तात, क्या तुमने अपने समान शूर तथा श्रुतसम्पन्न, जितेन्द्रिय, कुलीन, इङ्गितज्ञ लोगों को मन्त्री बनाया है ? क्योंकि शास्त्रकोविद श्रेष्ठ मन्त्री अमात्यों द्वारा सुसंवृत मन्त्र ही राजाओं के विजय का मूल होता हैं । तुम निद्रा के पराधीन तो नहीं होते हो ? ठीक समय पर जाग तो जाते हो ? और अपररात्र में जाग कर अर्थ-प्राप्ति का उपाय सोचते हो ? अकेले तो मन्त्रणा नहीं करते और बहुतों के साथ तो मन्त्रणा नहीं करते ? तुम्हारा मन्त्रित मन्त्र कहीं राष्ट्र में तो नहीं फैल जाता ? इस तरह किसी राजा या राजपुत्र के लिए जो आवश्यक कर्तव्य हैं उन्हीं विषयों के सम्बन्ध में राम ने भरत से प्रश्न कर उसी व्याज से उन्हें प्रासङ्गिक कर्तव्य तत्त्व का उपदेश किया हैं । इस प्रकार प्रश्न करने के अनन्तर भी अपने को राजा न समझ कर भरत ने जब कुछ उत्तर नहीं दिया तब राम ने पुनः उनके आगमन का प्रयोजन पूछा । महाभारत सभापर्व अध्याय ५ के श्लोक १७ वें से ११० तक नारद के धर्मसम्बन्धित प्रश्नव्याज से उपदेश हैं, १११ वें श्लोक से युधिष्ठिर का प्रश्न है । उसके बाद पुनः नारद के उपदेशात्मक प्रश्न हैं । वाल्मीकिरामायण में प्रथम प्रश्न ही हैं, अन्त में कुछ प्रश्नव्याज से उपदेश भी हैं । प्रायः यह माना जाता है कि पूर्ववर्ती लेख अधिक सुन्दर और स्पष्ट होता है, क्योंकि वह पूर्ववर्ती की सहायता लेकर अधिक परिष्कृत होता है । इस दृष्टि से भी वाल्मीकिरामायण का प्रश्न ही प्राचीन प्रतीत होता है । वाल्मीकिरामायण में ६५ श्लोक हैं, महाभारत में १२८ श्लोक हैं । महाभारत के श्लोक वाल्मीकिरामायण के छायामात्र हैं । यदि १०० वें सर्ग को प्रक्षिप्त कहा जाय तो यह भी मानना पड़ेगा कि राम भरत की दशा को बिना देखे, बिना पूछे और दशरथ का हाल बिना पूछे ही भरत से बातें करने लगे । परन्तु यह सर्वथा अस्वाभाविक ही