रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 537, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें४६० रामायणमीमांसा चतुर्दश है। 'प्रष्टुं समुपचक्रमे' की संगति पूर्व में बतलायी जा चुकी है। १०० वें सर्ग के बिना १०१ वाँ सर्ग सर्वथा अपूर्ण और असङ्गत ही ठहरता है। महाभारत सभापर्व वाल्मीकिरामायण के बाद का ग्रन्थ है, अतः वाल्मीकिरामायण से ही वहाँ कुछ श्लोकों का उद्धृत होना अधिक सङ्गत है। इसी प्रकार कहा जाता है कि जाबालि का वृत्तान्त प्रक्षिप्त है। राम के अयोध्या न लौटने का दृढ़ सङ्कल्प "प्रवेक्ष्ये दण्डकारण्यमहमप्यविलम्बयन् । आभ्यां तु सहितो वीर वैदेह्या लक्ष्मणेन च ।।" (वा० रा० २।१०७।१६) अर्थात् मैं शीघ्र ही सीता और लक्ष्मण के साथ दण्डकारण्य में प्रवेश करनेवाला हूँ। के पश्चात् भरत के प्रत्युपवेशन का प्रसङ्ग आना चाहिये— “एवमुक्तेन रामेण भरतः प्रत्यनन्तरम् । उवाच विपुलोरस्कः सूतं परमदुर्मनाः ॥ इह तु स्थण्डिले शीघ्रं कुशानास्तर सारथे । आर्यं प्रत्युपवेक्ष्यामि यावन्मे सम्प्रसीदति ।।" (वा० रा० २।१११।१२,१३) पिता ने जो मुझे वनवास की आज्ञा दी है वह मिथ्या नहीं हो सकती, राम के ऐसा कहने पर विशाल वक्षस्थलवाले भरत ने बहुत दुःखी होकर सूत को आज्ञा दी कि सारथे, स्थण्डिल पर कुश बिछा दो। जब तक आर्य (राम) प्रसन्न नहीं होते तब तक मैं उनके प्रति प्रायोपवेशनव्रत करूँगा। प्रचलित पाठ के अनुसार राम के सङ्कल्प के पश्चात् जाबालि लोकायत दर्शन का प्रतिपादन करने लगते हैं (सर्ग १०८)। राम जाबालि को उत्तर देकर अपना संकल्प पुनः प्रकट करते हैं (सर्ग १०९।१–२९)। इसके अनन्तर राम के प्रत्युत्तर का सार उपजाति छन्दों में दोहराया जाता है (सर्ग १०९।३०-३९)। इस अंश में जो दाक्षिणात्य पाठ में मिलता है कि राम बुद्ध को चोर और नास्तिक कहते हैं वह सर्ग १०९ पश्चिमोत्तरीय पाठ में नहीं मिलता है। इसके अनन्तर वसिष्ठ रामवंशावली सुनाकर राज्यभार स्वीकार करने के लिए राम से अनुरोध करते हैं (सर्ग ११०), परन्तु उपर्युक्त तर्क निःसार ही है। संसार की सभी घटनाएँ पुरुषविशेषों के अटकलों के आधार पर नहीं घटती हैं। पुरुषों के अनुमानों के विपरीत भी घटनाएँ घटती ही हैं। चित्रकूट के घटनास्थलपर राम और भरत केवल दो ही होते तब कदाचित् यह कहा भी जा सकता था, परन्तु जब वहाँ पर वसिष्ठ तथा जाबालि जैसे विद्वान् भी बैठे ही थे तो वे सर्वथा मौन कैसे रहते ? राम के वनगेमन से न लौटने की बात सुनकर भरत के कुछ कहने से पहले ही जाबालि का प्रतिज्ञा के विरुद्ध कुछ कहना असङ्गत नहीं है। सबका एक ही उद्देश्य था कि राम को अयोध्या लौटा ले जाना, अतः जाबालि ने लोकायत तथा बौद्ध मत लेकर वेदादि शास्त्रों एवं तदुक्त सदाचारपरम्पराओं को खण्डित कर राम को पिता की आज्ञा की परवाह न करने की सलाह देते हुए लौटने का अनुरोध किया। वैदिक सदाचार का प्रतिपादन कर राम ने जाबालिमत के खण्डन-प्रसङ्ग में बुद्धमतानुयायियों को नास्तिक और चोरवत् दण्डनीय कहा। वेदप्रामाण्य का अपहर्ता होने के कारण यहाँ नास्तिक को चोरवत् दण्डनीय कहा गया। प्रजाहित के लिए जैसे चोर दण्ड्य है वैसे ही नास्तिक भी दण्ड्य है। संक्षेप में जाबालि ने कहा—राघव, प्राकृत मनुष्यों की जैसी तुम्हारी प्राकृत बुद्धि नहीं होनी चाहिये। संसार में कौन किसका बन्धु है ? जन्तु अकेला ही उत्पन्न होता है और अकेला ही मरता है। माता-पिता आदि बुद्धि में जो आसक्त होता है वह उन्मत्त ही है। जैसे कोई मनुष्य एक ग्राम छोड़कर दूसरे ग्राम में जाता हुआ मार्ग में कहीं आवास करता है। दूसरे दिन आवास छोड़कर