भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 538

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६१ अन्यत्र चला जाता है। इसी तरह मनुष्यों के पिता, माता, गृह, वन आदि हैं। कहीं भी आसक्ति उचित नहीं । अपना राज्य छोड़कर बहुकण्टकाकीर्ण पथ में जाना उचित नहीं । अयोध्यानगरी एकवेणीधरा प्रोषितभर्तृका पत्नी के समान तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है । दशरथ अन्य थे, तुम अन्य हो । क्षणभङ्गवाद के अनुसार कोई स्थिर नहीं है। शोणित और बीज ही माता-पिता हैं, माता-पिता और कोई नहीं । जहाँ जाना था राजा गये । यह सभी भूतों की गति है । निरर्थक तुम क्यों राज्य से वञ्चित होते हो ? मैं तो धर्मपरायणों के लिए सोचता हूँ । जो इस लोक में दुःख पाकर विनाश को प्राप्त होते हैं । पितृदैवत्य श्राद्ध आदि का प्रपञ्च केवल अन्न का उपद्रवमात्र ( अपव्यय ) है । भला जो मर गया वह परलोक में भी क्या भोगेगा ? यदि यहाँ अन्य के भोजन से अन्य की तृप्ति होती तब तो परलोकगत पितरों का श्राद्ध आदि मिलने की कल्पना हो भी सकती थी, और यदि ऐसा ही है तब घर में किसी को भोजन करा देने से प्रवासी बन्धुओं को भी भोजन मिल जाना चाहिये । फिर तो किसी प्रवासी को घर से भोजनादि सामग्री ढोने का प्रयास क्यों करना चाहिये ? दान, यज्ञ, तप आदि की महिमा का वर्णन करनेवाले ग्रन्थ स्वार्थियों ने ही गढ़ रखे हैं, अतः परोक्ष परलोकबुद्धि का त्याग कर प्रत्यक्ष का आश्रयण करो । जाबालि का वचन सुनकर जाबालि द्वारा उक्त अर्थ के विपरीत प्रतिपत्तियुक्त बुद्धि एवं वेदोक्ति रूप सूक्ति का आलम्बन कर सत्यपराक्रम राम बोले- आपने मेरे प्रिय लाभ के लिए जो कुछ कहा है वह परमार्थतः अकार्य है जो कार्यसदृश प्रतीत होता है, वह पथ्याभास अपथ्य ही है । निर्मर्याद पापाचारसमन्वित प्राणी कहीं भी सम्मान पाने योग्य नहीं है, क्योंकि वह साधुसम्मत चरित्र प्रतिपादक वेदादि शास्त्रों से विपरीत है, 'लोकायतादि' शास्त्रप्रसक्त है । वस्तुतः कुलीन अकुलीन पुरुषमानी वीर की पवित्रता या अपवित्रता का स्पष्ट प्रतिपादन वेदसम्मत आचार ही करता है । वेदसम्मत आचारवाला ही कुलीन एवं शुचि है, तद्भिन्न अशुचि आदि ही हैं। आपके सम्मत पथ का आलम्बन करने से सर्वथा अनर्थ ही सम्भावित है । वैसा करने पर मैं अनार्य के तुल्य आर्य, शौचहीन होकर शुचि, अलक्षण होने पर भी लक्षणवान् तथा दुःशील होकर भी शीलवान् सा बनकर धर्मवेष से अधर्म का आचरण कर लोकसंकरकारक मार्ग का अनुसरण कर श्रुतिविधिविवजित क्रिया का आलम्बन कर अशुभ गति को ही प्राप्त होऊँगा । उस स्थिति में भला कौन समझदार कार्याकार्यविचक्षण पुरुष लोकदूषण और दुर्वृत्त व्यक्ति का सम्मान करेगा । यदि मैं तुम्हारे उपदेश का आदर करूँ, सत्य परिपालनरूप पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करूँ तो हीनप्रतिज्ञवृत्ति से कैसे स्वर्ग पा सकूँगा और किसके वृत्त का अनुसरण करूँगा ? शास्त्रों में तो पितादि परम्परा का अनुसरण करना कहा है— “येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः । तेन यायात् .................................................. ॥” ( मनु० ४।१७८ ) जिस रास्ते से पिता, पितामह आदि चले हैं उसी रास्ते से चलना उचित है। सामान्य तथा सर्वसाधारण लोक कामवृत्त ही होता है। जैसे आचारवाले राजा होते हैं वैसी ही प्रजा होती है। अनृशंस ( सब प्राणियों पर दयाप्रधान ) अनादिशास्त्रसिद्ध सत्य ही सनातन राजवृत्त है । इसी लिए राज्य भी सत्यात्मक होता है। सत्य ही में लोक प्रतिष्ठित है। ऋषियों एवं देवों ने भी सत्यलोकान्त सब लोकों की प्राप्ति का हेतु सत्य ही माना है। सत्यवादी ही अक्षय उत्कृष्ट लोक प्राप्त करता है । सर्पवत् अनृतवादी से सभी उद्विग्न होते हैं। सत्य ही सबका मूल है, सत्य ही ईश्वर है, धर्म भी सत्य ही में प्रतिष्ठित है । सत्य से पर कुछ भी नहीं। दत्त, इष्ट, हुत, तप तथा जगत् का उत्पादक सर्वाधिष्ठान ब्रह्म भी अत्यन्त अबाध्यरूप सत्य ही है। एतावता चेतन से अनधिष्ठित परमाणु, प्रकृति आदि ही जगत् के उपादान कारण हैं, यह मत खण्डित हो जाता है, क्योंकि वे परिणामी तथा मिथ्या होने से चेतन जीव आदि के अधिष्ठान नहीं हो सकते । साथ ही व्रत, यज्ञ, दान, तप आदि धर्म का प्रतिपादन करनेवाले वेद भी सत्य ईश्वर से श्वास-प्रश्वासवत् आविर्भूत होते हैं । अतः वक्तृगत भ्रम, प्रमाद आदि दोषों की शङ्का से रहित होने एवं