रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनके द्वारा प्रतिपादित दान आदि के फल का संवाद देखने से अप्रामाण्यशङ्काशून्य होने के कारण वेद स्वतःप्रमाण हैं, अतः सत्य ही ईश्वररूप है, इसलिए सत्यपालन में तत्पर होना ही युक्त है । “दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च । वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥” ( वा० रा० २।१०७।१४ ) अतः मैं पिता की आज्ञा का क्यों न पालन करूँ । पिता सत्यप्रतिज्ञ तथा समयी ( सदाचारवान् ) थे, अतः सत्य के कारण ही उन्होंने सत्यपालन द्वारा मुझे सत्यनिष्ठ बनाया है । लोभ से या मोह से किसी तरह मैं सत्य- सन्ध पिता के सेतु का अतिक्रमण न करूँगा । असत्यसन्ध अस्थिरचेता चपल मनुष्य के हव्य्, कव्य आदि को देवता और पितर ग्रहण नहीं करते, यह धर्म सभी प्राणियों के हितार्थ ध्रुव है । सत्पुरुषों ने उसका आचरण और अभिनन्दन किया है । पिता की आज्ञा का पालन आदि छोड़कर राज्य-पालन आदि धर्माभास अधर्म ही हैं। यह नृशंस एवं पाप कर्म क्षुद्र लोगों द्वारा ही सेवित है । प्राणी मन से निश्चय कर जिह्वा से अनृत भाषण करके शरीर से पाप करता है । भूमि, कीर्ति, यश तथा लक्ष्मी सभी सत्यनिष्ठ पुरुष का अनुवर्तन करते हैं, अतः सत्य का आश्रयण ही ठीक है। आपने जिन युक्त्याभासों से मुझसे राज्य करने के लिए कहा है वे अनार्य—अश्रेष्ठ ही हैं। मैंने पिता के सामने वनवास की प्रतिज्ञा की है, कैकेयी भी उससे प्रसन्न हुई थीं, अतः उसके विपरीत भरत की बातें कैसे मैं मानूं ? पवित्रतापूर्वक वनवास करते हुए नियत भोजन करते हुए पुण्य मूल, पुष्प और फलों से पितरों तथा देवताओं का तर्पण करते हुए उसी से पञ्चेन्द्रियवर्ग को पुष्ट कर पितृवचन पालनरूप लोक ( यात्रा ) व्यवहार को निष्कपट तथा श्रद्धा के साथ कार्याकार्यविचक्षण होकर चलाऊँगा । इस कर्मभूमि को प्राप्त करके जो शुभ कर्म है वही कर्तव्य है । अग्नि, वायु और सोम सभी कर्म के ही प्रभाव से उच्च फल के भागी हुए हैं। सौ अश्वमेध करके ही शतक्रतु इन्द्र त्रिदिवाधिपति हुए हैं। उग्र तप करके ही महर्षि लोग द्युलोकभागी हुए हैं । पुनश्च उग्रेतेजा राम उक्त नास्तिक्यपूर्ण 'यदि भुक्तमिहान्येन' इत्यादि शुष्क तर्क युक्त वाक्य की विगर्हणा करते हुए बोले, सत्य एवं धर्मयुक्त पराक्रम, भूतानुकम्पा, प्रियवादिता, द्विजाति, देवता तथा अतिथि के पूजन को सन्त लोग त्रिदिव-प्राप्ति का साधन कहते हैं । इस तरह सत्पुरुष फलवान् निश्चित कर्मों को जानकर श्रुति के अनुकूल तर्कों से निर्णय करके सावधान होकर लोकप्राप्ति की आकाङ्क्षा करते हैं । अन्य की भुक्ति से अन्य की तृप्ति आदि तो युक्ति और प्रमाण से हीन ही है। मैं पिता के उस कर्म की निन्दा करता हूँ जिसमें उन्होंने वेदविमुख तथा अवैदिक दुर्मार्ग में प्रतिष्ठित बुद्धिवाले चार्वाकानुसारिणी बुद्धि से धर्मपथ से अपेत नास्तिकमत का अनुसरण करनेवाले आपको आर्त्विज्य प्रदान किया है। जैसे चोर दण्ड्य होता है वैसे ही बुद्धादि नास्तिक मतानुसारी भी दण्ड्य हैं, क्योंकि वह वेद-प्रामाण्य का हरण करता है । नास्तिक को चोर सदृश ही दण्ड्य समझना चाहिये, जहाँ दण्ड देना सम्भव न हो वहाँ ब्राह्मण को नास्तिक के अभिमुख संभाषणदि नहीं करना चाहिये । वेदोक्त धर्म में शिष्टाचार दिखलाते हुए राम फिर कहते हैं, आपसे पूर्व और पूर्वत्तर ब्राह्मणों ने बहुत से शुभ कर्म किये हैं । लोक और परलोक की कामना छोड़कर भी कर्तव्य बुद्धि से वे कल्याणमय अहिंसा, तप, भिक्षादि कर्म करते रहे हैं । वेदप्रामाण्य से ही तेजस्वी लोग दानगुणप्रधान, अहिंसक, वीतमल, प्रधान मुनि लोकपूज्य हुए हैं। जाबालि ने भी अन्त में कहा, मैं नास्तिक नहीं हूँ । आर्य ! आपको अयोध्या लौटाने के लिए ही मैंने नास्तिक-वाक् का प्रयोग किया था । इस तरह इस संवादमयी घटना को अकस्मात् प्रक्षिप्त कहना साहसमात्र है । केवल पश्चिमोत्तर पाठ में यह नहीं है, एतावता भी इसे प्रक्षिप्त नहीं कहा जा सकता । ऐसे कई अंश हैं जो पश्चिमोत्तरीय पाठ में होने पर भी पाश्चात्यों को मान्य नहीं हैं जैसे अवतारवाद सभी पाठों में स्पष्टरूप से है, फिर भी बुल्के आदि उसे नहीं मानते ।