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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६५ सीताहरण का समाचार सुनकर राम और लक्ष्मण की माताओं के मर जाने की सेरीराम की बात वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध होने के कारण श्रद्धेय नहीं है। दशरथ के लिए राम के द्वारा इङ्गुदी की खली का पिण्डदान-वर्णन अन्यत्र किञ्चित् भिन्न हो सकता है। ब्रह्मपुराण (अध्याय १२३) के अनुसार दशरथ अपने पुत्रों को दर्शन देकर ब्रह्महत्या के कारण अपनी नरकयातना का वर्णन करते हैं और उनसे गौतमी-तट पर पिण्डप्रदान करने का अनुरोध करते हैं। अनन्तर राम के पिण्डदान द्वारा दशरथ नरक से मुक्ति पाते हैं तथा स्कन्दपुराण (प्रभासक्षेत्र- माहात्म्य अ० १११) के अनुसार दशरथ राम को स्वप्न में दिखाई देते हैं। राम ब्राह्मणों से परामर्श कर पिण्ड- दानादि धार्मिक क्रिया करते हैं। पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड अ० २८।४८-९०) के अनुसार वनवास के समय इसी स्वप्नदर्शनाध्याय के फलस्वरूप श्राद्ध के आयोजन का वर्णन मिलता है। गरुड़पुराण (अध्याय १४३) के अनुसार राम अयोध्या लौटने पर पितृकर्म के लिए गयाशिर (गया) जाते हैं। प्रतिमानाटक में भी इसका उल्लेख है। शिवपुराण (ज्ञानखण्ड अध्याय ३०) के अनुसार राम और लक्ष्मण श्राद्धसामग्री लेने गये थे आने में विलम्ब होने पर सीता श्राद्ध-काल की किञ्चित् अवधि शेष जानकर स्वयं श्राद्ध करती है। दशरथ प्रकट होकर कहते हैं मैं दशरथ हूँ। तुम्हारे सफल श्राद्ध से मैं तृप्त हुआ हूँ। बाद में राम के अर्पण करने पर दशरथ उनसे कहते हैं कि पुत्र, अब क्यों प्रदान कर रहे हो, सीता के द्वारा मैं तृप्त हो गया हूँ- “किमर्थं हूयते पुत्र त्वनया तर्पिता वयम् ।” आनन्दरामायण में भी सीता फल्गुस्नान करने जाती हैं। माहेश्वरी-पूजा के लिए १०२ बालू के पिण्ड तैयार करती हैं। वहाँ धरती से दशरथ का हाथ प्रकट होता है और सीता एक-एक कर १०२ पिण्ड दशरथ के हाथ पर रख देती हैं। सीता भयभीत होकर यह वृत्तान्त छिपाकर रखती हैं। बाद में जब राम पिण्ड चढ़ाने आते हैं तब दशरथ का हाथ नहीं प्रकट होता है, जिससे सबको आश्चर्य होता है। सीता अपना रहस्य प्रकट करती हैं कि दशरथ मुझसे पिण्ड-ग्रहण कर चुके हैं। राम साक्षी चाहते हैं। सीता आम वृक्ष, फल्गु नदी, ब्राह्मण, बिडाल, गौ और अश्वत्थ को साक्ष्य देने को कहती हैं। सब अस्वीकार कर सीता से शम होते हैं। अन्त में स्मरण कर सीता का समर्थन करते हैं। दशरथ स्वयं विमान द्वारा आते हैं और कहते हैं कि राम, मैथिली के पिण्डदान से दुस्तर नरक से मैं तर गया और मेरी पूर्ण तृप्ति हुई। सारलादास के अनुसार वनवास के समय राम अनेक तीर्थयात्राएँ करते हैं। किसी दिन राम गया पहुँचे। पितृ-कर्म के लिए गैंडा आवश्यक समझकर लक्ष्मण के साथ राम उसकी खोज में शिकार के लिए गये। सीता ब्रह्मा के पुत्र फल्गु नदी के संरक्षण में रामगया में ही रह गयीं। राम को समय पर न आते देख सीता ने पूर्वजों को सात बालू के पिण्ड समर्पित किये। दशरथ का हाथ प्रकट हुआ जिससे सीता को मालूम हुआ कि दशरथ का देहान्त हो चुका। सीता ने फल्गु से निवेदन किया कि वह इस घटना को राम से छिपा रखे। फल्गु ने सीता से अनुचित प्रस्ताव किया, उसके ठुकराये जाने पर ब्राह्मणों से कह दिया कि सीता ने पिण्डदान किया है। ब्राह्मण दक्षिणा के लिए अनुरोध करने लगे तथा राम के प्रत्यागमन तक प्रतीक्षा करना उन्होंने अस्वीकार कर दिया। इसपर सीता ने अपने कपड़े दे दिये और पद्मपत्रों से अपना अङ्ग ढक लिया। वापस आकर सब वृत्तान्त जानकर राम ने फल्गु तथा ब्राह्मणों को शाप दिया। कृत्तिवासरामायण के अनुसार दशरथ की मृत्यु के पश्चात् उनका श्राद्ध उचित रीति से करने के लिए राम और लक्ष्मण अंगूठी बेचने जाते हैं। इतने में सीता फल्गु के किनारे खेलती हैं। दशरथ देखकर कहते हैं, भूख की पीड़ा असह्य हो उठी है। रेत का पिण्ड देकर भूख शान्त कर दो। बाद में ब्राह्मण, तुलसी और फल्गु सीता के पक्ष में साक्ष्य नहीं देते हैं। उनको सीता शाप देती हैं। वट वृक्ष सीता का समर्थन करता है तथा राम और सीता दोनों से आशीर्वाद प्राप्त करता है। ५९